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Hindi Poetry

निर्मला

By Navneet Bakshi / May 22, 2021

Forty years ago (I was a young bachelor then) once roaming around in the back street of Ballard Pier (Bombay then, now Mumbai) at six in the evening, I saw one young woman running to get in the bus. She was wearing a maroon saree and was around 25~30 years old. When I came back…

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******आना इस बार ज़रूर होली पर************ 

By Navneet Bakshi / March 24, 2021

******आना इस बार ज़रूर होली पर************                                                                                                                             ( Picture from internet) सोचा करती थी मैं कि जब हम एक संग होंगे कितने सुन्दर तब होली के रंग होंगे   यूँ तो बरसाए हैं बहुतेरों ने रंग हर होली पर लेकिन कैसा कर दिया जादू तुमने दिल पर कि मुझे अब और कोई रंग नहीं भाता रंगे मेरे मन से…

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*************मेरी प्रेरणा************

By Navneet Bakshi / March 14, 2021

*************मेरी प्रेरणा************ मेरी कल्पना की परी तुम कि मेरी कल्पना के पर लुप्त हो जाती हो मुझ में ही कहीं तुम मेरी कविता को देकर स्वर प्रिय तुम उभरती हो दिल में फिर श्वासों में घुल-मिल जाती हो बनती हो तुम गीत मेरा फिर स्वयं ही उसको गाती हो मैं केवल माध्यम बन तुम्हारे अनूठे…

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यह आँसू मेरे, तुम्हारे

By Navneet Bakshi / March 2, 2021

यह आँसू मेरे, तुम्हारे कितना खुशनसीब हूँ मैं, तुम्हें यह बता नहीं सकता मैं तुम्हारी ज़िंदगी में लौट कर तो आ नहीं सकता लेकिन मैं उसे खूबसूरत बना सकता हूँ और यही मैं करना चाहता हूँ   इसलिये जाने-अनजाने परछाईं बन बगल में कभी और कभी एहसास बन तुम्हारे सिरहाने रात के अंधेरों में कभी…

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उंगली से शीशे पर लिखती हूँ नाम तुम्हारा

By Navneet Bakshi / February 28, 2021

  उंगली से शीशे पर लिखती हूँ नाम तुम्हारा और घबरा कर मिटा देती हूँ तुम क्या जानो मैं अपने दिल को तसल्ली किस किस तरह देती हूँ   एक तुम हो कि मेरा ख्याल भुलाए बैठे हो आँखों से दूर हो गए हो मगर दिल में समाये बैठे हो   चाहती हूँ मेरी गोदी…

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रक्षाबंधन

By Alka Kansra / August 16, 2020

रक्षाबंधन बाल्कनी से देख रही थी बारिश की बूँदों की झड़ी बसंत गया, गर्मी गई और सावन भी आ गया संक्रमण से बेख़ौफ़ मौसम बदलते जा रहे त्योहार निकलते जा रहे होली गई , बैसाखी गई और आ गया रक्षाबंधन भीगे से मौसम में भीगी सी पलकों में तैर गई रेशम की डोरी कहाँ गया…

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मुलाक़ात ख़ुद से

By Alka Kansra / July 29, 2020

This poem got the first position in a poetry competition conducted by Sukhan, a literary group. मुलाक़ात ख़ुद से चुपचाप बैठे बैठे आज यूँ ही खुल गई ज़िन्दगी की किताब और मैं पढ़ती चली गई एक के बाद एक पन्ना पलटती गई ज़िन्दगी की किताब आईना बन गई मुझे मेरा ही अक्स दिखलाती गई मुझ से मेरी ही मुलाक़ात करवाती गई क्या सोचती हूँ क्या चाहती हूँ चुपके से कान में बतलाती चली गई Alka Kansra

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रिश्तों का सफ़र

By Alka Kansra / July 20, 2020

रिश्तों का सफ़र ज़िन्दगी के रिश्तों का पुरपेच घुमावदार सफ़र पहाड़ के घुमावदार रास्तों से कुछ कम तो नहीं पहाड़ की ख़ूबसूरत ऊँचाइयों पर पहुँचने के लिए यह दुर्गम सफ़र तय करना ही पड़ता है ज़िंदगी में भी रिश्तों का सफ़र तय करना ही होगा कभी चीड़ की ख़ुशबू लिए ठण्डी बयार की तरह रिश्ते…

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