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सिर्योझा – 2

लेखक: वेरा पनोवा

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

 

 

ज़िन्दगी की मुश्किलें

 

ये उसने अच्छा किया जो पूछ लिया. वर्ना क्या हर चीज़ पे ध्यान दे सकते हो? सिर्योझा को अच्छा ही लगता, मगर ध्यान ही तो बस नहीं होता ना. चारों ओर इतनी सारी चीज़ें हैं. दुनिया ठसाठस भरी है चीज़ों से. दीजिए हर चीज़ पर ध्यान!

क़रीब-क़रीब सारी चीज़ें बहुत बड़ी हैं: दरवाज़े, ऊफ़, कितने ऊँचे-ऊँचे, लोग (बच्चों को छोड़कर) लगभग उतने ही ऊँचे हैं, जितने दरवाज़े. लॉरी की तो बात ही मत करो; कम्बाईन की भी; इंजिन की भी, जो ऐसी सीटी बजाता है कि बस उसकी सीटी को छोड़कर कुछ और सुनाई ही नहीं देता.

आम तौर से – ये सब इतना ख़तरनाक नहीं है: लोग सिर्योझा से अच्छी तरह पेश आते हैं, अगर ज़रूरत पड़े तो उसके लिए झुक जाते हैं, और कभी भी अपने भारी-भरकम पैरों से उसके पैर नहीं कुचलते. लॉरी और कम्बाईन भी ख़तरनाक नहीं हैं, अगर उनका रास्ता न काटो तो. इंजिन तो दूर है, स्टेशन पर, जहाँ सिर्योझा दो बार तिमोखिन के साथ गया था. मगर आँगन में एक जंगली जानवर घूमता रहता है. उसकी गोल-गोल, शक भरी, निशाना साधती आँख, तेज़-तेज़ साँस लेता थैली जैसा भारी-भरकम गला, पहिए जैसा सीना और फ़ौलादी चोंच है. वह जानवर रुक जाता है और अपने कँटीले पैर से ज़मीन कुरेदता है. जब वह गर्दन तान लेता है तो सिर्योझा जितना ऊँचा हो जाता है. और वह सिर्योझा को भी उसी तरह चोंच मार सकता है, जैसे पड़ोस के जवान मुर्गे को मारी थी, जो बेवकूफ़ी से उड़कर आँगन में आ गया  था. सिर्योझा इस खून के प्यासे जानवर की बगल से निकल जाता है, ऐसा दिखाते हुए कि उसे देख ही नहीं रहा है – मगर जानवर, अपनी लाल कलगी को तिरछा करते हुए गले से कुछ धमकी भरी बात कहता है, उसकी सतर्क, दुष्ट नज़र सिर्योझा का पीछा करती है…

मुर्गे चोंच मारते हैं, बिल्लियाँ खरोंचती हैं, बिच्छू-बूटी से खुजली और जलन होती है; लड़के लड़ते हैं, जब गिरते हो तो ज़मीन घुटने की खाल खींच लेती है – और सिर्योझा का बदन ढँक जाता है खँरोचों से, चोटों से, ज़ख़्मों से. हर रोज़ कहीं न कहीं से खून निकलता ही है. हमेशा कुछ न कुछ होता ही रहता है. वास्का फ़ेंसिंग पर चढ़ गया, मगर जब सिर्योझा चढ़ने लगा तो उसका हाथ छूट गया और चोट लग गई. लीदा के गार्डन में गड्ढा खोदा था, सारे बच्चे कूद-कूद कर गड्ढा फाँदने लगे, और किसी को भी कुछ भी नहीं हुआ, मगर जब सिर्योझा कूदने लगा तो गड्ढे में गिर गया. पैर फूल गया और दर्द करने लगा, सिर्योझा को पलंग पर लेटना पड़ा. मुश्किल से वह उठने के क़ाबिल हुआ ही था कि गेंद खेलने के लिए आँगन में पहुँचा, मगर गेंद ही उड़कर छत पर चली गई और वहाँ पाईप के पीछे तब तक पड़ी रही जब तक वास्का ने आकर उसे ढूँढ नहीं निकाला. एक बार तो सिर्योझा डूब ही गया था. लुक्यानिच अपनी नाव में उन्हें नदी पर घुमाने ले गया था – सिर्योझा को, वास्का को, फ़ीमा को और एक जान-पहचान वाली लड़की नाद्या को. लुक्यानिच की नाव बकवास ही निकली : जैसे ही बच्चे ज़रा-सा हिले डुले, वह गोता खा गई और वे सब के सब, लुक्यानिच को छोड़कर, पानी में गिर पड़े. पानी भयानक ठण्डा था. वह फ़ौरन सिर्योझा की नाक में, मुँह में, कानों में घुस गया – वह चिल्ला भी नहीं सका; पेट में भी घुस गया. सिर्योझा पूरा गीला हो गया, भारी हो गया , जैसे कोई उसे कोई नीचे नीचे पानी में खींच रहा हो. उसे इतना डर लगा जितना पहले कभी नहीं लगा था. और अंधेरा था, और ये काफ़ी देर तक चलता रहा. अचानक उसे ऊपर खींच लिया गया. उसने आँखें खोलीं – चेहरे के बिल्कुल पास नदी बह रही थी, किनारा दिखाई दे रहा था, और धूप में सब कुछ चमक रहा था. सिर्योझा के भीतर जो पानी भरा था वह बाहर निकल रहा था, वह हवा भीतर खींच रहा था, किनारा नज़दीक आता गया, और सिर्योझा हाथों-पैरों पर सख़्त बालू में ख़ड़ा था, ठण्ड और डर से कँपकँपाते हुए. ये वास्या के दिमाग में आया कि उसे बालों से पकड़कर खींच ले. और अगर सिर्योझा के बाल लम्बे न होते तो क्या होता?

फ़ीमा ख़ुद तैर कर बाहर आ गई, उसे तैरना आता है. नाद्या भी क़रीब-क़रीब डूब ही गई थी, उसे लुक्यानिच ने बचाया. और जब लुक्यानिच नाद्या को बचाने में लगा था, तब तक नाव बह गई. सोवियत-फ़ार्म की औरतों ने नाव पकड़ी और लुक्यानिच को ऑफ़िस में फोन पर बताय कि वह उसे ले जाए. मगर अब लुक्यानिच कभी भी बच्चों को नाव पर नहीं ले जाता. वह कहता है, “मुझ पर लानत लगे जो मैं फिर कभी तुम लोगों के साथ जाऊँ.”

दिन भर में जो कुछ भी देखना पड़ता है, बर्दाश्त करना पड़ता है, उससे सिर्योझा बेहद थक जाता है. शाम होते-होते वह पस्त हो जाता है : उसकी ज़ुबान मुश्किल से घूमती है, आँखें घूमने लगती हैं , पंछियों की आँखों के समान. उसके हाथ-पैर धुलाए जाते हैं, कमीज़ बदली जाती है – वह ख़ुद कुछ भी नहीं करता; उसकी चाभी ख़त्म हो चुकी है, जैसे घड़ी की चाभी ख़त्म होती है.

वह सो जाता है, भूरे बालों वाला सिर आराम से तकिये में डाले, दुबले-पतले हाथ फैलाए; एक पैर लम्बा खींचे, दूसरा घुटने पर मोड़े, जैसे किसी गोल सीढ़ी पर चढ़ रहा हो. हल्के, पतले बाल, दो लहरों में बंटे दोनों भँवों की कमानों के ऊपर उभरे उसके माथे को खोल रहे हैं. बड़ी-बड़ी पलकें, घनी बरौनियों की झालर डाले, कस कर बन्द हैं. मुँह बीच में कुछ खुला हुआ, किनारों पर नींद के कारण चिपका हुआ. और वह हौले-हौले साँस लेता है, बे आवाज़, फूल की तरह.

वह सो रहा है – और चाहे ढोल भी बजाओ, तोप के गोले भी दागो – सिर्योझा नहीं उठेगा, वह ताक़त बटोर रहा है, आगे जीने के लिए.

 

Courtesy: storymirror.com

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Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.
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Navneet Bakshi
4 months ago

बहुत सुन्दर ! आज कल जो बहुत कुछ बिखरा पड़ा है उसे समटने का विचार मन में आता है और उस में सब से आगे हैं, बचपन की यादें | कुछ लिखी भी हैं और अभी बहुत कुछ लिखने वाली बाकी हैं, लेकिन कई बार ऐसी सुन्दर रचनाएं पढ़ कर विचार आता है कि यदि वे सब एक बच्चे के संस्मरण बच्चे की लेखनी से ही पेश किये जाएँ तो कहीं अधिक रोचक बन जाते हैं |   

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