Sign Up    /    Login

सिर्योझा – 7

लेखिका: वेरा पनोवा

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

झेन्का

 

झेन्का – अनाथ है, अपनी मौसी और बहन के साथ रहता है. बहन – उसकी सगी बहन नहीं है – मौसी की बेटी है. दिन में वह काम पर जाती है, और शाम को इस्त्री करती है. वह अपने ड्रेस इस्त्री करती है. आँगन में बड़ी भारी इस्त्री लिए आती है, जो कोयले से गरम होती है. कभी वह इस्त्री पर फूँक मारती है, कभी उस पर थूकती है, कभी उस पर समोवार की नली रखती है. और उसके बाल छोटी-छोटी लोहे की पिनों में गोल गोल बंधे रहते हैं.

अपनी ड्रेस को इस्त्री करने के बाद वह तैयार होती है, बाल खुले छोड़ती है और हाउस ऑफ़ कल्चर में डांस करने के लिए जाती है. दूसरे दिन शाम को फिर इस्त्री के साथ आँगन में कुछ कुछ करती रहती है.

मौसी भी नौकरी करती है. वह हमेशा शिकायत करती है कि वह सफ़ाई मर्मचारी भी है और डाकिया भी है, मगर तनख़्वाह उसे सिर्फ सफ़ाई कर्मचारी की दी जाती है; जबकि स्टाफ़-लिस्ट में डाकिए का ख़ास तौर से उल्लेख किया गया है. वह बड़ी देर तक बाल्टियाँ लिए नुक्कड़ के नल पर खड़ी रहती है, और औरतों को सुनाती रहती है कि उसने कैसे अपने मैनेजर को खरी खरी सुनाई और कैसे उसके ख़िलाफ़ शिकायत लिखी.

झेन्का पर मौसी हमेशा गुस्सा करती है, कि वह ख़ूब खाता है और घर में कुछ काम नहीं करता.

मगर उसका तो काम करने का मन ही नहीं होता. वह सुबह उठता है, उसके लिए जो रखा है वह खाता है और बच्चों के पास निकल जाता है.

पूरा दिन या तो वह सड़क पर होता है या पड़ोसियों के यहाँ. जब वह आता है तो पाशा बुआ उसे खाना खिलाती है. मौसी के काम से लौटने से पहले झेन्का घर जाता है और पढ़ने बैठ जाता है. गर्मियों की छुट्टियों के लिए उसे ख़ूब सारा होम वर्क दिया गया है, क्योंकि वह बहुत पिछड़ गया है: दूसरी कक्षा में वह दो साल पढ़ा, तीसरी में दो साल और चौथी क्लास में भी यह उसका दूसरा साल है. जब वह स्कूल में दाख़िल हुआ था तब वास्का अभी छोटा ही था, मगर अब वास्का उसके बराबर आ गया है, बावजूद इसके कि वह भी तीसरी क्लास में दो साल बैठा रहा.

और ऊँचाई और ताक़त में भी वास्का ने झेन्का को पीछे छोड़ दिया था…

शुरू शुरू में तो टीचर्स झेन्का के बारे में परेशान रहते थे, उसकी मौसी को स्कूल में बुलाते, ख़ुद उसके पास जाते, मगर वह उनसे कहती:

“मेरे सिर का बोझ है वो, उसके साथ आप जो चाहे कर लीजिए, मगर मेरे लिए तो कुछ भी संभव नहीं है, वह मुझे खा गया है – पूरी तरह – अगर सुनना है तो सुनिए.”

और औरतों से शिकायत करती:

“कहते हैं उसे पढ़ाई के लिए एक अलग कोना दो. उसे कोना नहीं, चाबुक चाहिए – बढ़िया चाबुक, दया सिर्फ इसलिए आती है कि वह मेरी स्वर्गवासी बहन की निशानी है.”

फिर टीचर्स ने उसके पास आना बन्द कर दिया. बल्कि वे झेन्का की तारीफ़ भी करने लगे: कहने लगे, बड़ा अनुशासन वाला लड़का है; दूसरे लड़के क्लास में शोर मचाते हैं, मगर वह ख़ामोश बैठा रहता है – बड़े अफ़सोस की बात है कि वह स्कूल में कभी-कभार ही आता है, और उसे कुछ आता भी नहीं है.

वे बर्ताव के लिए झेन्का को ‘अति उत्तम’ ग्रेड देते. गाने में भी ‘अच्छा’ ग्रेड मिलता. मगर बाकी के विषयों में उसे ‘बुरा’ और ‘बहुत बुरा’ ग्रेड मिलता.

मौसी के सामने झेन्का ऐसे दिखाता है जैसे पढ़ रहा हो, जिससे कि वह उस पर कम चिल्लाए. वह घर आती है, तब वह किचन की मेज़ के पास बैठा मिलता है, जहाँ गन्दे बर्तन पड़े रहते हैं और गन्दे कपड़े इधर-उधर बिखरे रहते हैं – वह बैठा रहता है और गणित के सवाल हल करता रहता है.

“तू क्या रे, गिरगिट,” मौसी शुरू हो जाती है, “फिर से पानी नहीं लाया, केरोसिन लाने भी नहीं गया, कुछ भी नहीं किया? मैं क्या पूरी उम्र तेरे साथ सड़ती रहूँगी, सूखे के मरीज़?”

“मैं पढ़ रहा था,” झेन्का जवाब देता है.

मौसी चिल्लाती है – वह हिकारत से गहरी साँस लेकर पेन रख देता है और केरोसिन के लिए डिब्बा उठा लेता है.

“तू क्या मेरा मज़ाक उड़ा रहा है क्या?!” मौसी अजीब आवाज़ में चीख़ती है. “तुझे मालूम है, शैतान, कि दुकान बन्द हो चुकी है!!”

“हाँ , बन्द हो गई है,” झेन्का उसकी बात से सहमत होते हुए कहता है, “तू चिल्ला क्यों रही है?”

“ जा, लकड़ियाँ तोड़ कर ला!!!” मौसी इस तरह गला फ़ाड़ती है कि लगता है वह अभी फट जाएगा. “जा, बगैर लकड़ियों के घर में पैर न रखना!!!”

वह बेंच से बाल्टियाँ उठाती है और आक्रामकता से उन्हें हिलाते हुए, चीख़ते हुए पानी लाने जाती है, और झेन्का आराम से लकड़ियाँ तोड़ने के लिए शेड में जाता है.

मौसी झूठ बोलती है कि वह आलसी है. ऐसी कोई बात नहीं है. अगर पाशा बुआ उससे किसी काम के लिए कहती है, या बच्चे कुछ करने को कहते हैं, तो वह ख़ुशी ख़ुशी करता है. जब उसकी तारीफ़ करते हैं, तो वह बड़ा ख़ुश हो जाता है और काम को यथासंभव करने की कोशिश करता है. एक बार तो उसने वास्का के साथ मिलकर एक मीटर लम्बा पेड़ का ठूंठ काट काट कर लकड़ियाँ जमा दी थीं.

और यह भी झूठ है कि वह मोटी अक्ल वाला है. सिर्योझा को किसी ने लोहे का मेकैनो सेट भेंट में दिया था, तब झेन्का और शूरिक ने मिलकर ऐसा बढ़िया सिग्नल-पोस्ट बनाया था कि कालीनिन स्ट्रीट से बच्चे उसे देखने आते थे: लाल-हरी बत्ती वाला था सिग्नल पोस्ट. इस काम में शूरिक ने खूब मदद की थी, उसे मशीनों के बारे में काफ़ी कुछ जानकारी है, क्योंकि उसके पापा – तिमोखिन – ड्राइवर हैं, मगर शूरिक के दिमाग में यह बात नहीं आई कि सिर्योझा की क्रिसमस ट्री पर सजाए गए रंगीन बल्ब लेकर सिग्नल-पोस्ट पर लगा दिए जाएँ, मगर झेन्का यह बात समझ गया.

सिर्योझा के प्लास्टीसिन के साँचे से झेन्का आदमी और जानवर बनाता है – ठीक ठाक ही होते हैं, बुरे भी नहीं होते. सिर्योझा की मम्मा ने जब यह देखा तो उसके लिए भी प्लास्टीसिन ख़रीदा. मगर मौसी चिल्ला चोट मचाने लगी कि झेन्का को वह ऐसी बेवकूफ़ियाँ नहीं करने देगी, और उसने प्लास्टीसिन को कचरे के डिब्बे में फेंक दिया.

वास्का से झेन्का ने सिगरेट पीना भी सीख लिया. सिगरेट ख़रीदने के लिए तो उसके पास पैसे थे नहीं, तो वह वास्का की सिगरेट पीता है; और जब सड़क पर कोई सिगरेट का टुकड़ा मिलता है, तो वह उसे उठा लेता है और पीता है. सिर्योझा, झेन्का पर दया करके, ज़मीन पर पड़े हुए सिगरेट के टुकड़े उठा उठा कर उसे देता रहता है.

छोटे बच्चों के सामने, वास्का की तरह, झेन्का कभी अकड़ता नहीं है – वह उनके साथ कोई भी खेल खेलता है: अगर वे युद्ध का खेल खेलना चाहते हैं – तो युद्ध खेलता है, पुलिस का खेल चाहते हैं – तो पुलिस का खेल; लोटो खेलना चाहें – तो लोटो. मगर बड़ा होने के कारण वह जनरल या पुलिस अफ़सर बनना चाहता है. और जब लोटो खेल रहे होते हैं, तस्वीरों के साथ, और वह जीतता है, तो उसे बड़ी ख़ुशी होती है; मगर जब नहीं जीतता तो वह बुरा मान जाता है.

उसका चेहरा ख़ूब दयालु है, मोटे मोटे होंठ; लम्बे लम्बे बाहर को निकले कान; और गर्दन पर, पीछे, चोटियाँ, क्योंकि बाल वह कभी-कभार ही कटवाता है.

एक बार वास्का और झेन्का बगिया की ओर गए और सिर्योझा को भी अपने साथ ले गए. बगिया में उन्होंने आग जलाई, जिससे आलू भून सकें. आलू, नमक और हरी प्याज़ वे अपने साथ लाए थे. आग बड़े  धीरे धीरे सुलग रही थी, ख़ूब घना धुँआ निकल रहा था. वास्का ने झेन्का से कहा, “चलो, तुम्हारे भविष्य के बारे में बात करते हैं.”

झेन्का घुटनों को ऊपर उठाए बैठा था, घुटनों के चारों ओर हाथों का घेरा, ठोढ़ी घुटनों पर टिकी हुई थी, उसकी तंग पतलून ऊपर उठ गई थी और पतले पतले पैर दिखाई दे रहे थे. वह एकटक गहरे, भूरे और पीले धुएँ के ग़ुबार की ओर देखे जा रहा था, जो आग में से निकल रहा था.

“स्कूल तो हर हाल में पूरा करना ही होगा,” वास्का ने इस अंदाज़ में कहा जैसे वह हर विषय में प्रवीण हो और झेन्का से कम से कम पाँच क्लास आगे हो. “बिना शिक्षा के – तुम्हारी किसे ज़रूरत है?”

“ये तो सही है,” झेन्का ने सहमति दिखाई. “बिना शिक्षा के मैं किसी काम का नहीं.”

उसने एक टहनी उठाई और आग को कुरेदा, जिससे कि वह अच्छी तरह जलने लगे. गीली टहनियाँ फुफकार रही थीं, उनमें से थूक बाहर निकल रहा था, और धीरे धीरे सुलग रहा था. उस खुली जगह के चारों ओर, जहाँ बच्चे बैठे थे, बर्च के ऍस्पेन के और ऍल्डर के घने पेड़ थे. अपने खेलों में बच्चे इन पेड़ों को ‘ऊँघता हुआ जंगल’ कहते थे. बसंत में वहाँ काफ़ी सारे लिली के फूल होते थे और गर्मियों में ख़ूब सारे मच्छर. इस समय धुएँ से परेशान मच्छर दूर हट गए थे; मगर कुछ कुछ बहादुर धुएँ के बीच भी उड़कर आ रहे थे और काट रहे थे, और तब बच्चे ज़ोर ज़ोर से अपने पैरों और गालों पर थप्पड़ मारते.

“तू अपनी मौसी को उसकी जगह दिखा दे, और बस…” वास्का ने सलाह दी.

“कोशिश तो करके देख!” झेन्का ने प्रतिवाद किया. “कोशिश तो कर उसे उसकी जगह दिखाने की.”

“या फिर उसकी ओर ध्यान ही मत दे.”

“मैं यही करता हूँ, ध्यान ही नहीं देता. मैं उससे बेज़ार हो गया हूँ. बस, तू देख रहा है न – मेरा जीना दूभर कर दिया है उसने.”

“और ल्यूस्का?”

“ल्यूस्का का ठीक ठाक है – ल्यूस्का का क्या, वह शादी करने की सोच रही है.”

“किससे?”

“किसी से भी. उसका प्लान है – फ़ौजी अफ़सर से शादी करने का, मगर यहाँ तो अफ़सर हैं ही नहीं. शायद वह कहीं चली जाएगी, जहाँ फ़ौजी अफ़सर हों.”

आग जल उठी थी: आग ने नमी को भगाकर पत्तों और टहनियों को अपनी लपेट में ले लिया था, उसकी चमकीली लपटें फुदक रही थीं. अचानक पिस्तौल की गोली छूटने जैसी आवाज़ हुई. धुँआ अब बिल्कुल नहीं था.

“जा, भाग,” वास्का ने सिर्योझा को हुक्म दिया, “सूखी चीज़ें ले आ आग में डालने के लिए.”

सिर्योझा दिए गए काम को करने के लिए भागा. जब वह वापस आया तो झेन्का बोल रहा था, और वास्का बड़े ध्यान से और व्यस्तता के भाव से सुन रहा था.

“मैं तो ठाठ से रहूँगा!” झेन्का कह रहा था. “तुम ज़रा सोचो: शाम को होस्टल में वापस आओगे – तुम्हारे पास अपना बिस्तर है, एक अलमारी है…लेट जाओ और रेडियो सुनो, या फिर ड्राफ्ट्स खेलो, कोई तुम्हारे कान के पास आकर नहीं चिल्लाएगा…तुम्हारे लिए लेक्चर्स आयोजित किए जाते हैं, कॉन्सर्ट्स होती हैं…और रात को खाना – आठ बजे.”

“हाँ,” वास्का ने कहा, “सभ्य समाज में जैसे होता है. मगर तुम्हें वहाँ ले लेंगे?”

“मैं अर्ज़ी दूँगा. क्यों नहीं लेंगे. शायद ले लें.”

“तू कब हुआ था?”

“मैं सन् तैंतीस में. मुझे पिछले हफ़्ते चौदह पूरे हो गए.”

“अगर मौसी ने मना कर दिया तो?”

“वह मना नहीं करेगी, उसे बस इसी बात का डर है कि अगर मैं चला गया तो फिर उसकी कोई मदद नहीं करूँगा.”

“जाने दे उसे,” वास्का ने कहा और कुछ बुरे शब्द भी कहे.

“हाँ, मैं, चाहे जो भी हो, शायद, चला जाऊँगा,” झेन्का ने कहा.

“तू, सबसे ज़रूरी बात, कोई निर्णय ले और उस तरह से काम कर,” वास्का ने कहा. “वर्ना यह ‘शायद’, ‘शायद’ करता रहेगा और स्कूल का नया साल शुरू हो जाएगा, और तेरी मुसीबतें फिर से शुरू हो जाएँगी.”

“हाँ, मैं शायद निर्णय ले ही लूँगा,” झेन्का ने कहा, “मैं उसके अनुसार काम करूँगा. मैं, वास्या, मालूम है, अक्सर इस बारे में सपने देखता हूँ. जैसे ही याद आता है कि जल्दी से एक सितम्बर आने वाला है – मुझे इतना बुरा लगता है, इतना बुरा लगता है…”

“हाँ, देख ना!” वास्का ने कहा.

जब तक आलू भुन रहे थे वे झेन्का के प्लान्स के बारे में बातें करते रहे. फिर उन्होंने आलू खाए, उँगलियाँ जल रही थीं, मोटी हरी प्याज़ मुँह में कर्र कर्र आवाज़ कर रही थी; और फिर वे लेट गए. सूरज डूब रहा था; बर्च के तने गुलाबी हो गए; छोटी सी खुली जगह में, जहाँ सफ़ेद सफ़ेद राख में अभी भी कुछ चिंगारियाँ छिपी थीं, छाँव पड़ रही थी. साथियों ने सिर्योझा से मच्छर भगाने के लिए कहा. वह बैठा रहा और ईमानदारी से सोने वालों के ऊपर एक टहनी हिलाता रहा, और सोचता रहा: क्या वाक़ई में जब झेन्का काम करने लगेगा तो मौसी को पैसे देगा, जो उस पर सिर्फ चिल्लाती ही रहती है – ये तो बड़े अन्याय की बात है! मगर फिर जल्दी ही वास्का और झेन्का के बीच में लेटते ही उसे भी नींद आ गई. उसके सपनों में फ़ौजी अफ़सर आते रहे और उनके साथ थी ल्यूस्का, झेन्का की बहन.

झेन्का कोई पक्का निर्णय लेने वाला इंसान नहीं था, उसे काम करने के बजाय सपने देखना ज़्यादा अच्छा लगता था, मगर पहली सितम्बर निकट आ रही थी, स्कूल में मरम्मत का काम पूरा हो गया, स्कूली बच्चे वहाँ कॉपियों और किताबों के लिए जाने लगे. लीदा अपनी नई यूनिफॉर्म की शान बघार रही थी, अपनी तमाम अप्रियताओं के साथ स्कूल का नया साल देहलीज़ पर खड़ा था, और झेन्का ने निर्णय ले लिया. उसने कहा कि उसे ट्रेड स्कूल या फैक्ट्री स्कूल में, शायद, ले लेंगे. मतलब, उसने जाने का निर्णय ले लिया.

काफ़ी लोगों ने उसकी प्रशंसा की और उसकी मदद करने की कोशिश भी की. स्कूल ने चरित्र-प्रमाणपत्र दिया. करस्तिल्योव  और मम्मा ने झेन्का को पैसे दिए, और मौसी ने भी उसे रास्ते में खाने के लिए केक बना दिया.

उसके जाने के दिन मौसी ने बिना चिल्ला चोट मचाए उससे बिदा ली और कहा कि वह ये न भूले कि उसने उसके लिए कितना कुछ किया है. उसने कहा, “अच्छा, मौसी,” और आगे कहा, “धन्यवाद.” इसके बाद वह अपने दफ़्तर चली गई और वह जाने की तैयारी करने लगा.

मौसी ने उसे  हरे रंग का लकड़ी का सन्दूक दिया. वह काफ़ी देर तक सोचती रही, सन्दूक के जाने का दुख हो रहा था, मगर फिर भी उसने दे ही दिया, यह कहते हुए कि “अपने कलेजे का टुकड़ा दे रही हूँ तुझे. इस सन्दूक में झेन्का ने कमीज़ रखी, फटे मोजों का एक जोड रखा, धुला हुआ तौलिया और केक भी रखा. बच्चे देख रहे थे कि वह किस तरह सामान रखता है. सिर्योझा अचानक अपनी जगह से उठ कर भागा. वह हाँफ़ते हुए वापस आया, उसके हाथों में सिग्नल-पोस्ट था, लाल-हरी बत्तियों वाला. वह सबको इतना अच्छा लगता था, सिग्नल-पोस्ट, कि उन्होंने अब तक उसे तोड़ा नहीं था, वह छोटी सी मेज़ पर रखा रहता था, और उसे मेहमानों को दिखाया जाता था.

“ले लो!” सिर्योझा ने झेन्का से कहा. “अपने साथ ले जाओ, मुझे नहीं चाहिए, वह यूँ ही तो रखा है!”

“मगर मैं इसका करूँगा क्या,” झेन्का ने सिग्नल पोस्ट की ओर देखकर कहा. “वैसे भी पन्द्रह किलो वज़न ले जाना है.”

तब सिर्योझा फिर भाग कर गया और डिब्बा लेकर आया.

“तो, ये ले लो!” उसने उत्तेजित स्वर में कहा, “तू वहाँ बनाया करना. ये तो हल्का है.

झेन्का ने डिब्बा ले लिया और उसे खोला. उसमें प्लास्टीसिन के टुकड़े थे. झेन्का के चेहरे पर ख़ुशी की लहर दौड़ गई.

“ठीक है,” उसने कहा, “ले लेता हूँ,” और उसने डिब्बा सन्दूक में रख लिया.

तिमोखिन ने वादा किया था कि झेन्का को स्टॆशन पर ले जाएगा: स्टेशन तीस किलोमीटर दूर था. अभी तक उनके शहर तक रेल मार्ग बना नहीं था – मगर अचानक शाम को उसकी गाड़ी ने हड़ताल कर दी, इंजिन चल ही नहीं रहा था, उसे दुरुस्त कर रहे हैं, और तिमोखिन सो रहा है, शूरिक ने बताया.

“भूल जा,” वास्का ने कहा, “पहुँच जाएगा.”

“बस में जा सकता है,” सिर्योझा ने कहा.

“बड़ा होशियार है तू!” शूरिक ने विरोध जताया, “बस में पैसे देना पडेंगे.”

“हाई वे पर जाकर लिफ्ट मांग लूँगा,” झेन्का ने कहा. “कोई न कोई तो, शायद, ले ही जाएगा.

वास्का ने उसे सिगरेट का पैकेट भेंट में दिया. मगर माचिस उसके पास नहीं थी, झेन्का ने मौसी की माचिस ले ली. सब लोग मौसी के घर से निकले. झेन्का ने दरवाज़े पर ताला लगाया और चाबी पोर्च के नीचे रख दी. वे चल पड़े. सन्दूक बेहद भारी था – उसमें रखे सामान के कारण नहीं, बल्कि वह वज़नदार ही था; झेन्का उसे कभी एक हाथ में लेता तो कभी दूसरे में. वास्का झेन्का का ओवरकोट लिए था, और लीदा – नन्हें विक्टर को लेकर चल रही थी. उसने पेट बाहर की ओर निकालकर उसे उठाया हुआ था, और बार बार उसे हिलाते हुए कह रही थी, “ओह, तू! बैठ! क्या चाहिए तुझे!”

तेज़ हवा चल रही थी. शहर से बाहर हाई वे पर आए – वहाँ धूल गोल गोल ऊपर की ओर उड़ रही थी, आँखों में धूल के कण उड़ कर जा रहे थे. हवा के कारण भूरी घास और बदरंग हो चुके घास के फूल, जो हाई वे के किनारे पर लगे थे, थरथराते हुए ज़मीन पर गिर रहे थे. बिल्कुल साफ़ बादल, गोल गोल और सफ़ेद, चमकीले नीले आकाश में तैर रहे थे; उनसे कोई ख़तरा नहीं था; मगर नीचे एक काला बादल अपने बालों वाले पंजे फैलाए नज़दीक आ रहा था, और ऐसा लग रहा था कि हवा इसी से आ रही है और रह रह कर धूल से गुज़रते हुए कुछ तीक्ष्ण सा, ताज़ा सा अपने साथ ला रही है, और सीने में राहत महसूस हो रही है. ..बच्चे रुक गए, उन्होंने संदूक नीचे रख दिया और गाड़ियों की राह देखने लगे.

गाड़ियाँ मानो उन्हें चिढ़ाने के लिए स्टेशन से शहर की ओर ही आ रही थीं. आख़िरकार दूसरी दिशा से एक ट्रक आता हुआ दिखाई दिया. वह ऊपर तक बक्सों से लदा था, मगर ड्राईवर की बगल में कोई भी नहीं था. बच्चों ने हाथ ऊपर उठाए. ड्राईवर ने देखा और आगे निकल गया. इसके बाद धूल के बवंडर में एक काली ‘गाज़िक’ दिखाई दी, क़रीब क़रीब ख़ाली थी – ड्राईवर के अलावा उसमें बस एक और आदमी था; मगर वह भी आगे बढ़ गया, बिना रुके.

“शैतान!” शूरिक ने गुस्से से कहा.

“और तुम लोग क्यों हाथ उठा रहे हो!” वास्का ने कहा. “मैं तुम्हारी ख़बर लूँगा! वे सोचते हैं कि पूरी टीम को ले जाना है! बस, अकेला झेन्का ही लिफ्ट मांगेगा! देखो, वो पुराना खटारा आ रहा है.”

बच्चे मान गए, और जब वह खटारा उनके नज़दीक आया, तो किसी ने भी हाथ ऊपर नहीं उठाय, सिवाय झेन्का और वास्का के: वास्का ने अपनी ही आज्ञा भंग कर दी – बड़े बच्चे हमेशा वही करते हैं, जिसे करने से वे छोटों को रोकते हैं…

पुराना खटारा थोड़ा आगे निकला और रुक गया. झेन्का उसके पास सन्दूक लेकर भागा और वास्का कोट लेकर. दरवाज़ा खट् की आवाज़ से खुल गया, झेन्का गाड़ी के भीतर ग़ायब हो गया, और झेन्का के पीछे पीछे वास्का भी गायब हो गया. फिर गैस और धूल के बादल ने सब कुछ ढाँक दिया; जब वह बादल छटा तो हाई वे पर न तो वास्का था, न ही झेन्का, और पुराना खटारा काफ़ी दूर पर जाते हुए दिखाई दे रहा था. चालाक वास्का, उसने किसी को भनक तक नहीं लगने दी, ज़रा सा इशारा भी नहीं किया कि वह झेन्का को स्टेशन पर छोड़ने जा रहा है.

बाकी के बच्चे घर लौटने लगे. पीठ में हवा मारे जा रही थी, आगे धकेल रही थी और सिर्योझा के लम्बे बालों से उसके चेहरे पर वार कर रही थी.

“उसने कभी भी उसके लिए कोई कपड़ा नहीं सिया,” लीदा ने कहा. “वह पुराने, उधेड़े हुए कपड़े पहने  था.”

“उसका बॉस बदमाश है,” शूरिक ने कहा, “वह उसे डाकिए की तनख़्वाह नहीं देना चाहता. और उसका तो हक है वो.”

और सिर्योझा हवा से धकेले जाते हुए चल रहा था, और सोच रहा था – कितना ख़ुशनसीब है झेन्का जो रेल में जाएगा, सिर्योझा आज तक कभी भी रेल में नहीं बैठा था..

दिन गहराने लगा और अचानक पल भर को एक तैश भरी चमक से जगमगा गया, सिरों के ऊपर ऐसी गड़गड़ाहट होने लगी जैसे तोप से गोले छूट रहे हों, और फ़ौरन बारिश ने उन पर तैश से चाबुक बरसाना शुरू कर दिया…बच्चे भागने लगे. पल भर में बन गए कीचड़ पर फिसलते हुए, बारिश उन्हें मारे जा रही थी और नीचे झुकाए जा रही थी, पूरे आकाश में बिजलियाँ उछल रही थीं; तूफ़ान की गड़गड़ाहट और बिजली की कड़कड़ाहट के बीच नन्हे विक्टर का रोना सुनाई दे रह था…

इस तरह झेन्का चला गया. कुछ समय के बाद उसके दो ख़त आए: एक वास्का के नाम, दूसरा मौसी के नाम. वास्का ने किसी को कुछ भी नहीं बताया, ऐसे दिखाया जैसे ख़त में कुछ ख़ास मर्दों की बातें लिखी हैं. मौसी ने कुछ भी नहीं छिपाया और सबको बताया कि झेन्का को, भगवान की दया से ट्रेड स्कूल में ले लिया गया है. वह होस्टल में रहता है. उसे सरकारी यूनिफॉर्म दिया गया है. “उसे लाईन पे लगा दिया,” मौसी ने कहा, “अब अपनी ज़िन्दगी शुरू करेगा, और यह सब किसने किया, मैंने.”

झेन्का न तो उनका लीडर था, न ही उनका दिल बहलाता था; बच्चों को जल्दी ही उसके न होने की आदत हो गई. उसके बारे में याद करके वे ख़ुश होते थे, कि वह अच्छी तरह है, कि उसके पास एक अलमारी है और उसके पास कलाकार आते हैं. और यदि वे युद्ध का खेल खेलते, तो अब शूरिक और सिर्योझा बारी बारी से जनरल बनते थे.

 

 

Share with:


Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.

Random Posts

Placeholder Image 90

Thewriterfriends.com is an experiment to bring the creative people together on one platform. It is a free platform for creativity. While there are hundreds, perhaps thousands of platforms that provide space for expression around the world, the feeling of being a part of fraternity is often lacking. If you have a creative urge, then this is the right place for you. You are welcome here to be one of us.

Random Posts

Meri taal, meri awaaz (My rhythm, my voice)

By Prasad Ganti | February 12, 2022

I spoke to Usha on the New year’s day. She asked me to post some of my songs. Recently, Gopalji requested the same. I normally dont record any of my songs unless there is some need. I have been singing in the bathroom for decades now.  And just beyond the bathroom with some classical lessons.…

Share with:


Read More

Indian Army to Patrol lake Pangong Tso in boats from coming summer!

By Suresh Rao | January 2, 2021

A copy/paste article from www.Deccan Herald.com ITBP personnel on the banks of Pangong Tso, in Ladakh. Representative image/Credit: PTI File Photo With no signs of troop de-escalation on the Ladakh front, the Indian Army on Friday decided to purchase 12 fast patrol boats from Goa Shipyard, presumably for improving surveillance in Pangong Tso through which…

Share with:


Read More

Hey Ram… I too have shed my tears, not blood!

By Suresh Rao | August 12, 2020

I was a six year old when he was shot dead by an assassin at point blank range in Delhi. I did not know anything about the Mahatma or the reason for his brutal murder… because, I was just a carefree kid then who had just started attending school, played ‘gilly danda’ with friends inside…

Share with:


Read More

Bill Gates Blog: 2021 will be better than 2020 to address the COVID challenge

By Suresh Rao | December 28, 2020

Richest countries of the world have been financially and physically challenged in 2020 to stop the spread of the Corona pandemic. Pharma companies of Germany, US, Russia, UK and India have put their resources at risk to produce the 3 vaccine candidates readied in record time and quantities to stop the menacing pandemic. New mutants…

Share with:


Read More

Bill introduced in US Congress to terminate PAKISTAN as major non-NATO ally

By Suresh Rao | January 4, 2021

(pic) Members of the House of Representatives take their oath of office during the first session of the 117th Congress in Washington. Credit: Reuters Photo On the first day of the 117th Congress, a lawmaker has introduced a bill in the US House of Representatives to terminate the designation of Pakistan as a Major non-NATO…

Share with:


Read More

चीचिकोव के कारनामे

By Charumati Ramdas | February 5, 2022

चीचिकोव के कारनामे लेखक: मि. बुल्गाकोव अनुवाद: ए. चारुमति रामदास (कविता: दस बिन्दुओं में, प्रस्तावना एवम् उपसंहार सहित) “संभल के, संभल के, बेवकूफ़ !” – चीचिकोव सेलिफान पर चिल्लाया. “तुझे तो मूसल से !” – सामने से सरपट दौड़ता हुआ एक एक गज की मूँछों वाला सरकारी डाकिया चीखा. “दिखाई नहीं देती, पिशाच तुझे ले…

Share with:


Read More

Karnataka Passes Anti-Cow-Slaugter Bill, Assures Action On ‘Vigilanti-Goondaism’

By Suresh Rao | January 14, 2021

(pic) Image download from Net is for representational purposes only. Karnataka State (ruled by BJP party) is one of very few States in India to pass ‘Anti-Cow-slaughter Bill’ in the ‘State Assembly’ on grounds that ‘Cow slaughter’ is against Constitution of India.  Opposition parties have argued in the ‘State Assembly’ that in the name of…

Share with:


Read More

Those Bakery Products- Aha!

By Navneet Bakshi | May 16, 2020

Those Bakery Products- Aha! A great discussion is already going on since yesterday on Bakery Products that were available in 1960s when we were little children, but since freshness was the key to those products, I thought of writing a fresh piece while taking a stroll down the memory lanes. I have never had such…

Share with:


Read More

बुदम and His Quest to Find Mentors

By Vipin Kaushik | January 31, 2021

बुदम always wanted to find answers from family members. He used to look at his big brother Hemant Bhai for some magic wand to put something in him. He got some help from an illiterate Mom (Shakuntla) who told him one thing to be successful, “you got to enjoy whatever you do”. बुदम enjoyed everything…

Share with:


Read More

Website Defects/Suggestions

By Navneet Bakshi | May 3, 2020

17-07-2020 1. Can we add a Button or a Prompt at the right side of the Comment Window against the Message- “You must be Logged in for Posting A Comment” 2. Can we make a provision of sending a mail from Admin for asking people to Post the Blogs or Appreciating them for getting good…

Share with:


Read More