Sign Up    /    Login

सिर्योझा – 15

लेखिका: वेरा पनोवा

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

खल्मागोरी

 

खल्मागोरी. मम्मा से करस्तिल्योव  की बातचीत में यह शब्द सिर्योझा अक्सर सुनता है.

“ तुमने खल्मागोरी में ख़त लिखा?”

“शायद खल्मागोरी में इतना व्यस्त नहीं रहूँगा, तब मैं राजनीतिक-अर्थशास्त्र की परीक्षा पास कर लूँगा.”

“मुझे खल्मागोरी से जवाब आया है. लड़कियों के स्कूल में नौकरी दे रहे हैं.”

“कर्मचारी विभाग से फोन आया था. खल्मागोरी के बारे में अंतिम निर्णय ले लिया गया है.”

“इसे कहाँ खल्मागोरी घसीट कर ले जाएँगे. इसे तो दीमक खा गई है.” (अलमारी के बारे में.)

बस, सिर्फ खल्मागोरी, खल्मागोरी.

खल्मागोरी. ये कोई ऊँची चीज़ है. टीले और पहाड़, जैसा तस्वीरों में होता है. लोग एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ पर चढ़ रहे हैं. लड़कियों का स्कूल पहाड़ पर है. बच्चे स्लेज में पहाड़ों से फिसल रहे हैं.

सिर्योझा लाल पेन्सिल से यह सब कागज़ पर बनाता है और इस मौके पर दिमाग में आई एक धुन पर हौले-हौले गाता है:

“खल्मागोरी, खल्मागोरी”

जब अलमारी के बारे में बात हो रही है, तो ज़ाहिर है कि हम वहाँ जा रहे हैं.

बहुत बढ़िया. इससे अच्छी तो और किसी बात की कल्पना ही नहीं की जा सकती. झेन्का चला गया. वास्का चला गया, और हम भी जा रहे हैं. इससे हमारा महत्व ख़ूब बढ़ जाता है, कि हम भी कहीं जा रहे हैं, बस एक ही जगह पर नहीं बैठे हैं.

“क्या खल्मागोरी दूर है?” सिर्योझा ने पाशा बुआ से पूछा.

“दूर है,” पाशा बुआ ने जवाब दिया और आह भर कर बोली, “बहुत दूर है.”

“क्या हम वहाँ जाएँगे?”

“ओह, मुझे मालूम नहीं हैं, सिर्योझेन्का, तुम्हारी बातें.”

“वहाँ क्या रेल से जाते हैं?”

“रेल से.”

“क्या हम खल्मागोरी जा रहे हैं?” सिर्योझा मम्मा और करस्तिल्योव  से पूछता है. उन्हें ख़ुद ही उसे इस बारे में बताना चाहिए था, मगर बताना भूल गए.

वे एक दूसरे की ओर देखते हैं, और फिर दूसरी ओर नज़र फेर लेते हैं, सिर्योझा निरर्थक कोशिश करता है उनकी आँखों में देखने की.

“हम जा रहे हैं? हम सचमुच वहाँ जा रहे हैं?” वह घबरा जाता है: वे जवाब क्यों नहीं देते?

मम्मा सावधानी से कहती है:

“पापा का वहाँ तबादला कर दिया गया है.”

“और हम भी उनके साथ जाएँगे?”

वह सीधे सीधे पूछता है और उसे सीधा सीधा जवाब चाहिए. मगर मम्मा, हमेशा की तरह, पहले ढेर सारी इधर उधर की बातें कहती है:

“उसे कैसे अकेले छोड़ सकते हैं. उसे अकेले तो अच्छा नहीं लगेगा: काम से घर लौटेगा, और घर में कोई नहीं…घर साफ़ सुथरा नहीं है…खाना खिलाने वाला कोई नहीं…बातें करने के लिए कोई नहीं…बेचारे

पापा का मन दुखी – ख़ूब दुखी हो जाएगा…”

और इसके बाद वह कहती है:

“मैं उसके साथ जाऊँगी.”

“और मैं?”

करस्तिल्योव  छत की ओर क्यों देख रहा है? मम्मा फिर से क्यों चुप हो गई और सिर्योझा को क्यों सहला रही है?

“और मैं!!” सिर्योझा भय से पैर पटकते हुए दुहराता है.

“पहले तो, पैर मत पटको,” मम्मा कहती है और उसे सहलाना बन्द करती है. “ये और कहाँ से सीख लिया है – पैर पटकना?! मैं दुबारा ये न देखूँ! और दूसरी बात – आओ इस बारे में सोचते हैं: तुम अभी कैसे जा सकते हो? अभी अभी तुम बीमारी से उठे हो. तुम पूरी तरह ठीक नहीं हुए हो. ज़रा सा कुछ होता है – बुख़ार आ जाता है. हमें भी अभी पता नहीं है कि वहाँ कैसे इंतज़ाम करेंगे. और वहाँ की आबोहवा भी तुम्हारे लिए ठीक नहीं है. तुम वहाँ बीमार ही पड़ते रहोगे, और कभी भी अच्छे नहीं हो पाओगे. और मैं तुम्हें, बीमार बच्चे को किसके सहारे छोडूँगी? डॉक्टर ने कहा है कि अभी तुम्हें वहाँ नहीं ले जाना चाहिए.”

इससे काफ़ी पहले कि वह अपनी बात पूरी करे, वह आँसू बहाते हुए सिसकियाँ लेकर रोने लगा. उसे नहीं ले जा रहे हैं! ख़ुद चले जा रहे हैं, उसके बगैर! सिसकियाँ लेते हुए उसने मुश्किल से सुना कि वह आगे क्या कह रही थी:

“पाशा बुआ और लुक्यानिच तुम्हारे साथ रहेंगे. तुम उनके साथ रहोगे, जैसे हमेशा रहते आए हो.”

मगर वह हमेशा की तरह नहीं रहना चाहता! उसे मम्मा और करस्तिल्योव  के साथ रहना है!

“मुझे खल्मागोरी जाना है!” वह चीख़ा.

“ओह, मेरे बच्चे, ओह, चुप हो जा!” मम्मा ने कहा. “तुझे इतना क्या है उस खल्मागोरी का? वहाँ कोई ख़ास बात नहीं है…”

“झूठ!”

“तुम मम्मा से इस तरह क्यों बात कर रहे हो? मम्मा हमेशा सच बोलती है…और फिर तुम कोई हमेशा के लिए तो नहीं ना रहोगे यहाँ, बुद्धू है मेरा बच्चा, ओह, बस भी करो…सर्दियों में यहाँ रहोगे, अच्छे हो जाओगे और फिर बसंत में या, हो सकता है, गर्मियों में पापा तुझे लेने के लिए आएँगे, या मैं आऊँगी, और तुझे ले जाएँगे – जैसे ही ठीक हो जाओगे, फ़ौरन ले जाएँगे – और फिर से हम सब एक साथ रहेंगे. सोचो, क्या हम ख़ूब दिनों तक तुम्हें छोड़ सकते हैं?”

हाँ, और अगर वह गर्मियों तक अच्छा नहीं हुआ तो? हाँ, क्या ये आसान बात है – सर्दियाँ यहाँ बिताना? सर्दियाँ – इतनी लंबी, इतनी अंतहीन…और इस बात को कैसे बर्दाश्त करे कि वे जा रहे हैं, और वह – नहीं? उसके बगैर रहेंगे, दूर, और उन्हें कोई फ़रक नहीं पड़ता, नहीं पड़ता! और रेल में जाएँगे, और वह एक भी बार रेल से नहीं गया है – और उसे नहीं ले जा रहे हैं! सब कुछ एक ही साथ महसूस हो रहा था – भयानक अपमान और दुख. मगर वह अपना दुख सिर्फ सीधे साधे शब्दों में ही व्यक्त कर सकता था:

“मुझे खल्मागोरी जाना है! मुझे खल्मागोरी जाना है!”

“मीत्या, थोड़ा पानी दो, प्लीज़,” मम्मा ने कहा. “थोड़ा पानी पी, सिर्योझेन्का. ऐसी ज़िद कोई करता है, भला. तुम चाहे कितना ही चिल्लाओ, इससे कुछ होने वाला नहीं है. एक बार जब डॉक्टर ने बोल दिया कि नहीं, मतलब – नहीं. ओह, शांत हो जा, तू तो समझदार बच्चा है, शांत हो जा…सिर्योझेन्का, मैं तो पहले भी कितनी ही बार तुम्हें छोड़ कर गई  हूँ, जब मैं पढ़ती थी, तुम भूल गए? जाती थी और वापस आ जाती थी, है ना? और तुम मेरे बगैर मज़े से रहते थे. और, जब मैं तुम्हें छोड़कर जाती थी, तो कभी रोते भी नहीं थे, क्योंकि मेरे बिना भी तुम्हें अच्छा ही लगता था. याद करो. अभी तुम यह सब हंगामा क्यों कर रहे हो? क्या तुम, अपनी ही भलाई के लिए, कुछ दिनों तक हमारे बगैर नहीं रह सकते?”

कैसे समझाऊँ उसे? तब बात और थी. वह छोटा था और बेवकूफ़ था. वह जाया करती थी – उसकी आदत छूट जाती थी, और जब वह वापस लौट कर आती, फिर से उसकी आदत पड़ जाती. और तब वह अकेली जाती थी; मगर अब वह करस्तिल्योव  को उससे दूर ले जा रही है…एक नया ख़याल, नई पीड़ा: ‘ल्योन्या को, शायद, वह ले जाएगी.’ यक़ीन करने के लिए, अपने सूजे हुए होठों को दबाते हुए उसने पूछा,
“और ल्योन्या?…”

“अरे, वह तो बिल्कुल छोटा है!” उलाहने से मम्मा ने कहा और वह लाल हो गई. “वह मेरे बिना नहीं रह सकता, समझते हो? वह मेरे बिना मर जाएगा! और वह तन्दुरुस्त है, उसे बुख़ार नहीं आता और उसके गले की गाँठें सूजती नहीं हैं.”

सिर्योझा ने सिर झुका लिया और फिर से रोने लगा. मगर अब, ख़ामोशी से, बिना किसी आशा के.

वह किसी तरह समझौता कर लेता, अगर ल्योन्या भी रुक जाता. मगर वे तो सिर्फ़ उस अकेले को फेंक कर जा रहे हैं. सिर्फ वह अकेला ही उन्हें नहीं चाहिए!

‘किस्मत के भरोसे,’ उसने कहानी के लकड़ी वाले लड़के के बारे में कटुता से सोचा.

और मम्मा ने उसे जो चोट पहुँचाई थी – ऐसी चोट जो ज़िन्द्गी भर उसके दिल पर अपना निशान छोड़ेगी – उसमें अपने दोषी होने की भावना भी मिल गई : वह दोषी है, दोषी! बेशक, वह ल्योन्या से बुरा है, उसकी गाँठें जो फूल जाती हैं, इसीलिए ल्योन्या को ले जा रहे हैं और उसे नहीं ले जाएँगे!

“आ S S ह !” करस्तिल्योव  ने आह भरी और कमरे से निकल गया…मगर फ़ौरन लौट आया और बोला, “सिर्योझ्का, चलो घूमने चलते हैं. बगिया में.”

“ऐसी नम हवा में! वह फिर पड़ जाएगा!” मम्मा ने कहा.

करस्तिल्योव  ने हाथ झटके.

“वह वैसे भी लेटा रहता है. चलो, सेर्गेई.”

सिर्योझा सिसकियाँ लेते हुए उसके पीछे चल पड़ा. करस्तिल्योव  ने ख़ुद उसे गरम कपड़े पहनाए. सिर्फ स्कार्फ़ बांधने के लिए मम्मा से कहा. और उसका हाथ पकड़ कर वे बगिया में पहुँचे.

“एक शब्द होता है : ‘ज़रूरी’, करस्तिल्योव  कह रहा था.  “तुम क्या सोचते हो, मैं खल्मागोरी जाना चाहता हूँ? या मम्मा जाना चाहती है? इसका एकदम उल्टा है. हमारी कितनी सारी योजनाएँ थीं, सब गड्ड मड्ड हो गईं. मगर ज़रूरी है – इसलिए जा रहे हैं. और मेरी ज़िन्दगी में तो ऐसा कितनी बार हुआ है.”

“क्यों?” सिर्योझा ने पूछा.

“ऐसी ही है, दोस्त, ज़िन्दगी.”

करस्तिल्योव  बड़ी गंभीरता से और दुख से बोल रहा था, और इस बात से थोड़ी सी राहत मिली कि उसे भी दुख हो रहा है.

“वहाँ जाएँगे मम्मा के साथ. जैसे ही पहुँचेंगे, नया काम शुरू करना पड़ेगा. और फिर ये ल्योन्या है. उसे फ़ौरन शिशु-गृह में भेजना होगा. और अगर, अचानक, शिशु-गृह दूर हुआ तो? एक नर्स ढूँढ़नी पड़ेगी. ये भी बड़ा झंझट भरा काम है. और मुझे परीक्षा देनी होगी, पास होना होगा, चाहे तुम्हारी जान ही क्यों न निकल जाए. चाहे कहीं भी जाओ, हर जगह ‘ज़रूरी है’ . और तुझे तो सिर्फ एक ही बात ‘ज़रूरी है’ : कुछ दिनों के लिए यहाँ इंतज़ार कर लो. तुम्हें हमारे साथ मुसीबतें उठाने को मजबूर क्यों किया जाए? बेकार ही में और ज़्यादा बीमार पड़ जाओगे….”

मजबूर करने की ज़रूरत नहीं है. वह राज़ी है, तैयार है, वह तड़प रहा है उनके साथ मुसीबतें उठाने के लिए. जो उनके साथ हो रहा है, वही उसके साथ भी हो जाए. इस आवाज़ की तमाम आश्वासात्मकता के बावजूद सिर्योझा इस ख़याल को अपने दिल से न निकाल सका कि वे उसे इसलिए नहीं छोड़कर जा रहे हैं कि वह वहाँ बीमार पड़ जाएगा, बल्कि इसलिए कि वह, बीमार, उन पर बोझ बन जाएगा. मगर उसका दिल अब यह भी समझने लगा था कि कोई भी प्यारी चीज़ कभी बोझ नहीं होती. और उनके प्यार के प्रति शक इस दिल को पैनेपन से चीरता जा रहा था, जो अब काफ़ी कुछ समझने लगा था.

वे बगिया में आए. वहाँ सूना सूना और उदास था. पत्ते पूरे गिर चुके थे, नंगे पेड़ों पर घोंसले काले हो रहे थे, नीचे से देखने पर वे काले ऊन के उलझे हुए गोले जैसे नज़र आ रहे थे. भूरी पड़ गई पत्तियों की गीली सतह पर बूटों से मच् मच् करते सिर्योझा पेड़ों के नीचे से करस्तिल्योव  का हाथ पकड़े चल रहा था और सोच रहा था. अचानक उसने बगैर किसी भावना के कहा, “सब एक ही है.”

“क्या सब एक ही है?” करस्तिल्योव  ने उसकी ओर झुकते हुए पूछा.

सिर्योझा ने जवाब नहीं दिया.

“ सही में, दोस्त, सिर्फ़ गर्मियों तक!” कुछ देर की ख़ामोशी के बाद परेशानी से करस्तिल्योव  ने कहा.

सिर्योझा यह कहना चाहता था: सोचो या न सोचो, रोओ या न रोओ – इसका कोई मतलब नहीं है : तुम, बड़े लोग, सब कुछ कर सकते हो; तुम मना कर सकते हो, तुम इजाज़त दे सकते हो, गिफ्ट दे सकते हो और सज़ा दे सकते हो; और अगर तुमने कह दिया कि मुझे यहाँ रहना पड़ेगा, तो तुम मुझे कैसे भी छोड़ ही दोगे, चाहे मैं कुछ भी क्यों न करूँ. ऐसा जवाब वह देता, अगर दे सकता तो. बड़े लोगों की महान, असीमित सत्ता के सामने असहायता का एहसास उसके दिल को घेरने लगा….

… इस दिन से वह एकदम ख़ामोश हो गया. क़रीब क़रीब पूछता ही नहीं था: “ऐसा क्यों?” अक्सर अकेला रहता, पाशा बुआ के दीवान पर पैर ऊपर करके बैठ जाता और कुछ कुछ फुसफुसाता रहता. पहले ही की तरह उसे कभी कभार ही घूमने के लिए बाहर छोड़ते : शरद ऋतु लंबी खिंच रही थी – नम, चिपचिपी – और शरद ऋतु के साथ बीमारी भी खिंचती गई.

करस्तिल्योव  अक्सर उनके पास नहीं होता था. सुबह से वह अपना काम दूसरों को देने के लिए निकल जाता (जैसे कि अभी उसने कहा: ‘मैं चला अवेर्कियेव को काम सौंपने’) मगर वह सिर्योझा को भूला नहीं था: एक बार, उठने के बाद, सिर्योझा को अपने पलंग के पास नए क्यूब्स मिले, दूसरी बार – कत्थई रंग की बंदरिया. सिर्योझा को बंदरिया बहुत अच्छी लगी. वह उसकी बेटी बन गई. वह बड़ी ख़ूबसूरत थी, उस राजकुमारी की तरह. वह उससे कहता, ‘तू, दोस्त’. वह खल्मागोरी जाता और उसे अपने साथ ले जाता. उससे फुसफुसाकर बातें करते हुए, उसके ठंडे प्लास्टिक के मुँह को चूमते हुए, वह उसे सुलाता.

Share with:


0 0 votes
Article Rating

Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments

Random Posts

Placeholder Image 90

Thewriterfriends.com is an experiment to bring the creative people together on one platform. It is a free platform for creativity. While there are hundreds, perhaps thousands of platforms that provide space for expression around the world, the feeling of being a part of fraternity is often lacking. If you have a creative urge, then this is the right place for you. You are welcome here to be one of us.

Random Posts

Hinduism is a Way of Life

By Subramanian Thalayur Ratnam | August 9, 2020 | 3 Comments

  Very Interesting facts! Christianity ….One Christ, One Bible Religion… But the Latin Catholic will not enter Syrian Catholic Church. These two will not enter Marthoma Church . These three will not enter Pentecost Church . These four will not enter Salvation Army Church. These five will no enter Seventh Day Adventist Church . These…

Share with:


Read More

रक्षाबंधन

By Alka Kansra | August 16, 2020 | 4 Comments

रक्षाबंधन बाल्कनी से देख रही थी बारिश की बूँदों की झड़ी बसंत गया, गर्मी गई और सावन भी आ गया संक्रमण से बेख़ौफ़ मौसम बदलते जा रहे त्योहार निकलते जा रहे होली गई , बैसाखी गई और आ गया रक्षाबंधन भीगे से मौसम में भीगी सी पलकों में तैर गई रेशम की डोरी कहाँ गया…

Share with:


Read More

MARCHING AHEAD…ON LONELY ROADS

By Navneet Bakshi | June 15, 2020 | 0 Comments

MARCHING AHEAD…ON LONELY ROADS From My Childhood Stories In Shimla Choosing Cart-Road over others In the evening after the school, we could either take a cold, dark, desolate and scary Cart Road or bright, sunny and populous Ridge/Mall Road. You might think, why should one choose a circuitous, lonely road over a bright and sunny…

Share with:


Read More

Baba Ka Dhabha…Part 1

By Navneet Bakshi | November 22, 2020 | 5 Comments

Baba Ka Dhabha Last fortnight a video depicting the plight of an elderly couple who used to scrape a living by running a wayside Dhabha at Malviya Nagar had gone viral on Whatsapp. It showed how badly the lockdown had effected their business. The poor couple had run out of all their savings in the…

Share with:


Read More

A REVIEW ON THE BOOK – A CHEQUERED BRILLIANCE: THE MANY LIVES OF V.K. KRISHNA MENON by Shri. Jairam Ramesh, M.P

By Unnikrishnan | July 24, 2020 | 3 Comments

A REVIEW ON THE BOOK – A CHEQUERED BRILLIANCE: THE MANY LIVES OF V.K. KRISHNA MENON by Shri. Jairam Ramesh, M.P : “Some cannot be pinned to any particular stage ; their stage is the world at large”. VK Krishna Menon was one such personality, who could not be confined to one place, community or…

Share with:


Read More

Surprised that educated people fall prey to financial fraudsters!

By Suresh Rao | January 4, 2021 | 4 Comments

Representative Image. Most victims of VFSSL fraud were senior citizens of Bangalore & Chennai In yet another case of suspected financial fraud in Bengaluru, several people have registered complaints against Chennai-headquartered Vishwapriya Financial Services Securities Limited (VFSSL), alleging that it has cheated them of lakhs of rupees. Four FIRs have been registered at Siddapura and…

Share with:


Read More

Synthetic Drugs and Ganja seized in Manipal, Karnataka

By Suresh Rao | November 2, 2020 | 2 Comments

(pic) representative image of packets of synthetic drugs and ganja seized. Police have seized Rs 3.89 lakh worth synthetic drugs comprising 25 MDMA, banned ecstasy tablets, 32 gram foreign hydro weed ganja and nine grams of brown sugar, in Manipal on Saturday, Nov 1, 2020. The police raided Aditi Sourabh apartment and took Aditya Prabhu, a…

Share with:


Read More

True Picture of the British Raj

By Navneet Bakshi | August 27, 2020 | 2 Comments

True Picture of the British Raj The only history of India that I have read is what was taught to is in the school history books. Recently, I saw a beautiful Whatsapp video where the presenter shows how the history that has been taught to us in the school was not the history of India…

Share with:


Read More

वड़वानल – 57

By Charumati Ramdas | August 27, 2020 | 0 Comments

लेखक: राजगुरू द. आगरकर अनुवाद: आ. चारुमति रानदास खान के साथ गए साथियों को गॉडफ्रे से मिलने के लिए इन्तज़ार नहीं करना पड़ा। गॉडफ्रे उनकी राह ही देख रहा था। उसे उनका आगमन अपेक्षित था। उसने प्रतिनिधियों को भीतर बुलाया। ‘‘आपकी शर्त के मुताबिक सभी सैनिक अपने–अपने जहाज़ों और नाविक तलों को वापस लौट गए…

Share with:


Read More

Indian National Congress & its revival

By Gopalakrishnan Narasimhan | September 3, 2020 | 7 Comments

Of late, the biggest and oldest Indian political Indian National Congress is facing several crises. Be it Rajasthan or Maharashtra, or even at the Centre, this party is now facing difficulties in handling the crises it faces from time and again. At the outset, let us all agree that the Congress post 1969 is totally…

Share with:


Read More
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x