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वड़वानल – 73

लेखक: राजगुरू द. आगरकर

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

 

 

आत्मसमर्पण के बाद के दस घण्टे शान्ति से गुज़रे। किसी को भी गिरफ़्तार नहीं किया गया था। छह बजे के करीब ब्रिटिश सैनिक जहाज़ों और तलों पर गए।

‘Clear lower decks’ क्वार्टर मास्टर ने घोषणा की। सारे सैनिक बैरेक से मेस डेक से बाहर निकले और फॉलिन हो गए। हाज़िरी ली गई।

”You, No-5 From the First Line, Come out…” सैनिकों को चुनचुन कर निकाला गया और देखते–देखते सैनिकों से भरे ट्रक्स नज़रों से ओझल हो गए।

‘‘कहाँ ले गए होंगे उन्हें?’’ मदन ने खान से पूछा।

‘‘क्या पता! मेरा ख़याल था कि सबसे पहले हमें उठाएँगे,  मगर हमें पकड़ा ही नहीं!’’  खान ने आश्चर्य से कहा।

‘‘अरे, आज छोड़ा है,  मगर कल तो पकड़ेंगे ही। बकरे की माँ कब तक ख़ैर मनाएगी?’’  मदन ने हँसकर पूछा।

‘‘अरे, अब सूली पर चढ़ने की पूरी तैयारी है अपनी!’’  खान ने जवाब दिया।

‘तलवार’ के और अन्य जहाज़ों के नेताओं के ध्यान में यह बात शीघ्र ही आ गई कि जैसे काँटे पर आमिष लटकाया जाता है, उसी तरह उन्हें जहाज़ों पर रखा गया था। यदि किसी सैनिक को उनसे बात करते देखा जाता तो एक–दो घण्टों में वह सैनिक जहाज़ से हटा दिया जाता।

 

 

 

25 तारीख को सुबह दस बजे सेन्ट्रल कमेटी के सभी सदस्यों को गिरफ्तार करके ‘कैसल बैरेक्स’ लाया गया। बैरेक्स में चारों ओर से कनात लगा ट्रक तैयार ही था। इस ट्रक में जानवरों की तरह सबको ठूँसा गया और ट्रक पूरे वेग से चल पड़ा। कोई भी समझ नहीं पा रहा था कि ट्रक कहाँ जा रहा है। करीब दो–ढाई घण्टे बाद ट्रक रुका। गेट खोलने की आवाज़ आई। ट्रक गेट के भीतर घुसा। सभी गिरफ्तार सैनिकों को नीचे उतारा गया।

‘‘कहाँ आए हैं हम?’’  कुट्टी ने पूछा।

“Don’t talk, Keep Silence.” एक गोरा अधिकारी चिल्लाया। सब शान्त हो गए। कैदियों की पावती दी गई…और जिस तरह जानवरों को हाँका जाता है उसी तरह हाँकते हुए उन्हें उस कैम्प में लाया गया। नौसेना के विद्रोही सैनिकों को रखने के लिए ही वह कैम्प बनाया गया था। किट बैग सिर पर रखकर भगाते हुए उन्हें बैरेक में ले जाया गया।

‘‘स्वतन्त्रता के लिए लड़ रहे थे क्या?   अब सड़ो इस नरक में!’’   गुरु अपने आप से बुदबुदाया।

‘‘ये कहाँ की बैरेक्स हैं! ये तो पशुशाला है!’’ मदन ने बैरक में घुसते ही कहा। आठ–आठ फुट ऊँचे बारह बैरेक्स,  तीन ओर कच्ची दीवारें,  चौथी बाजू खुली ही थी,  ‘आओ–जाओ घर तुम्हारा’। ऊपर टीन की छत। नीचे नमी,  कहीं–कहीं घासवाली ज़मीन। बैरक्स में दरवाजे़ नहीं,  खिड़कियाँ नहीं। बैरेक्स में न तो आलमारियाँ थीं,  न खूँटियाँ,  सिर्फ पत्थर और उनमें जानवरों के समान ठूँसे गए सैनिक। सण्डास नहीं,  प्रातर्विधि,  स्नान…  सब कुछ खुले में। चार–पाँच किलोमीटर के परिसर में फैली छावनी के चारों ओर कँटीले तार की बागड़ और बागड़ के बाहर आठ–दस फुट तक फैली थीं सूखी, कँटीली डालें। चारों ओर ऊँचे–ऊँचे मचान, उन पर लाइट मशीनगनधारी सैनिकों का खड़ा पहरा। घास में गिरी सुई भी स्पष्ट नज़र आए ऐसी तेज़ रोशनी वाले सर्च लाइट। कैम्प में कैदियों की संख्या थी चार सौ और पहरे पर तैनात सैनिक थे एक सौ। कैम्प के आसपास कोई मानव बस्ती ही नहीं थी। चारों ओर था घना जंगल और साथ था इस जंगल के जानवरों का…। रात के समय मच्छरों के संगीत का साथ देती सियारों की कुई–कुई, और फिर सैनिक पूरी रात जागकर बिताते।

‘‘जर्मनी के यातना–शिविर और ये कैम्प,  इनमें कोई फ़र्क नहीं है!’’  गुरु को जर्मनी के यातना–शिविरों के बारे में पढ़ा हुआ वर्णन याद आया।

‘‘यहाँ बस गैस चेम्बर और ब्रेन वाशिंग की कमी है!’’ दास ने इस कमी की ओर इशारा किया।

‘‘गैस चेम्बर न भी हो, मगर इसके बदले कुछ और होगा। धीरे–धीरे सब पता चलेगा।’’ इनसे पहले पहुँचे जी. सिंह ने कहा।

‘‘यहाँ कितने लोग हैं?’’  मदन ने पूछा।

‘‘आज आए तुम पचास लोगों को मिलाकर चार सौ,  यह मेरा अनुमान है, क्योंकि रोज़ यहाँ से सैनिकों को हटाया जाता है और यहाँ नये सैनिक लाए जाते हैं। चार दिन पहले सारे मुस्लिम सैनिकों को यहाँ से हटाया गया था।’’ जी.सिंह जानकारी दे रहा था।

‘‘अरे,  मतलब इन्होंने गिरफ़्तार कितने सैनिकों को किया है?’’  मदन ने पूछा।

“मेरा ख़याल है कि दो से ढाई हज़ार तक सैनिकों को पकड़ा होगा,” जी. सिंह ने अपना अनुमान व्यक्त किया।

‘‘ए, चलो अपनी–अपनी जगह पर चलो…बात नईं करने का।’’ बैरेक के बाहर खड़ा एक कठोर चेहरे वाला भूदल सैनिक चिल्ला रहा था। इकट्ठा खड़े सैनिक अपनी–अपनी जगह चले गए।

उस बेस कैम्प में मेस थी ही नहीं। खाना कहीं और से ट्रक में लाया जाता, पानी टैंकर से आता। सभी अपर्याप्त। दोपहर के भोजन की घण्टी बजी और सब प्लेटें लेकर भागे।

‘‘अरे, मैंने कहा था न, यहाँ गैस चेम्बर नहीं है, मगर स्टोन चेम्बर तो है।’’ जी.  सिंह दाँत के नीचे आया कंकड़ निकालते हुए बोला,  ‘‘साला,  यहाँ के और जो बेस में मिलता था उस खाने में कोई फर्क नहीं है।’’ मदन कुड़कुड़ाया।

‘‘और खाना भी पूरा नहीं।’’ कुट्टी ने चावल का आख़िरी निवाला ठूँसते हुए कहा। ‘‘खाना कौन से कोने में जाकर छुप जाता है, पता ही नहीं चलता।’’

‘‘इसी अधूरे खाने से रात को मच्छरों को खून की सप्लाई करनी पड़ती है। अंग्रेज़ों और मच्छरों में कोई फर्क ही नहीं है। मच्छर रात में,  तो अंग्रेज़ दिन में खून चूसते हैं।’’ जी. सिंह ने हँसते हुए कहा।

‘‘इस पर उपाय क्या है?’’   मदन ने पूछा।

‘‘यहाँ हम चार सौ हैं। यहाँ भी…’’   गुरु ने कहा।

‘‘मैं नहीं समझता,  कि हम सबको इकट्ठा करके एक बार फिर आवाज़ उठा सकेंगे। एक बार लड़ाई हार जाने के बाद इतनी जल्दी फिर लड़ाई के लिए कोई तैयार नहीं होगा और हम पर तो विश्वास बिलकुल ही नहीं करेंगे।’’ खान ने भयानक सच सामने रखा।

‘‘अरे,  और सैनिक तैयार नहीं होंगे, ठीक है,  मगर हम तो हैं ना। या फिर हमने भी चूड़ियाँ पहन रखी हैं? हम संघर्ष करेंगे।’’   चट्टोपाध्याय ने आह्वान दिया।

‘‘ठीक है। मगर पहले हम शिकायत दर्ज करवाएँगे। देखेंगे क्या कार्रवाई होती है उस पर।’’ मदन ने सुझाव दिया। ‘‘आज तक एक बार नहीं, कई बार शिकायतें कीं। मगर कोई ध्यान ही नहीं देता। मैंने खुद दो बार शिकायत की, मगर एक ही जवाब मिलता है, कि चुपचाप खाना हो तो खाओ, वरना भूखे मरो!’’ जी. सिंह ने अपना अनुभव सुनाया।

‘‘ठीक है। मैं जाकर दर्ज करता हूँ शिकायत। देखूँ तो कैसे ध्यान नहीं देते।’’  चट्टोपाध्याय ने ज़िम्मेदारी ली।

 

 

 

उस बैरेक में दिनभर जाँच कमेटियों का काम होता था। ‘जाँच–कमेटी’  तो बस आँखों में धूल फेंक रही थी। विभिन्न जहाज़ों के कमांडिंग ऑफिसर्स ही जाँच कर रहे थे। नर्मदा के असलम  की गवाही ली जा रही थी।

‘‘तुम अपने संघर्ष के बारे में विस्तार से बताओ, ’’ जाँच करने वाले ले. कमाण्डर मिल ने गुर्राकर पूछा।

‘‘मैंने एक हिन्दुस्तानी होने के कारण इस संघर्ष में भाग लिया था, ’’  असलम ने मिल की नज़रों से नजरें मिलाते हुए जवाब दिया।

‘‘मुझे विस्तारपूर्वक जवाब चाहिए।’’  ले. कमाण्डर मिल गुर्राया।

‘‘ठीक है,  मेरा खुलासेवार जवाब नोट करो। मैं अन्य सैनिकों की ही तरह इस संघर्ष में शामिल हुआ। पूरी हिन्दुस्तानी जनता को यह मालूम है कि हिन्दुस्तानी नौसैनिकों ने उन पर होने वाले अन्याय दूर होने तक,  काले-गोरे का भेद ख़त्म होने तक और आज़ादी मिलने तक संघर्ष करते रहने का निश्चय किया है। हमारे दिल में लगी शत्रुत्व की और द्वेष की आग कितनी तीव्र है यह तुम गोरों को वक्त आने पर पता चलेगा। और कोई खुलासा चाहिए?’’ असलम ने हँसते हुए पूछा।

यहाँ पर कुछ भी हाथ नहीं लगने वाला यह मिल समझ गया और उसने मन में निश्चय कर लिया कि ‘यह कोशिश करूँगा कि असलम को ज़्यादा से ज़्यादा सज़ा मिले।’

दूसरे दिन से असलम उस कैम्प में नज़र ही नहीं आया।

 

 

 

‘‘देख, तू चुपचाप सारे गुनाह कुबूल करके दत्त, खान, मदन और जिसका हम नाम लें, उसके ख़िलाफ गवाही देने के लिए तैयार है, तो हम तुझे छोड़ देंगे, वरना…’’ ले. कमाण्डर सालभर पहले भर्ती हुए पाटिल को धमका रहा था। ‘‘तेरे बाप के नाम की ज़मीन ज़ब्त कर लेंगे और तेरे बाप को भी तुझे शह देने के इलज़ाम में जेल में डाल देंगे। तेरे छोटे–छोटे भाई–बहन फिर भूखे मरेंगे। बोल, क्या मंज़ूर है?  यदि यह सब टालना है तो हमारी शरण में आ।’’

डरा हुआ पाटिल ज़ोर–ज़ोर से रोने लगा और उसने स्नो के पैर पकड़ लिये। ‘‘मुझे माफ़ करो,  सर, मुझे माफ़ करो!’’

स्नो के चेहरे पर वहशी हँसी थी,  ‘‘ठीक है। अब उठ। गार्ड रूम में जो काग़ज़ हैं उन पर ‘साइन’ कर और वहीं ठहर। तेरा जहाज़ कौन–सा है?  ‘पंजाब’ ना ?  तुझे वहाँ भेज दिया जाएगा। मगर याद रख,  अगर ज़ुबान से फिरा तो!’’ स्नो ने धमकाया।

‘‘नहीं सर, जैसी आप कहोगे वैसी ही गवाही दूँगा,’’  पाटिल ने कहा और वह गार्ड रूम की ओर भागा। अब उसे वहाँ मौजूद सैनिकों से डर लग रहा था।

 

 

 

‘‘सर, हमें यहाँ जो खाना मिल रहा है वह अपर्याप्त तो है ही,  मगर वह बेहद गन्दा भी है।’’   चट्टोपाध्याय अपने हाथ की प्लेट लेफ्टिनेंट ए.सिंह के सामने नचाते हुए शिकायत कर रहा था।

ले.  ए.  सिंह उसकी ओर ध्यान न देते हुए ड्यूटी पेट्टी ऑफ़िसर जेम्स से बात करने लगा। चट्टोपाध्याय ने पलभर राह देखी और एक–दो बार उसे पुकारा। सिंह ध्यान देने को तैयार नहीं है, यह देखते ही उसका गुस्सा बेकाबू हो गया। ”Look, Duty officer,” चट्टोपाध्याय ने सिंह की कमीज़ की आस्तीन पकड़ के खींची।

एक विद्रोही कैदी इस तरह की बदतमीज़ी करे,  यह सिंह से बर्दाश्त नहीं हुआ। उसने चट्टोपाध्याय का गिरेबान पकड़कर उसे दूर धकेल दिया। चट्टोपाध्याय मुँह के बल गिर गया। खाना चारों ओर बिखर गया।

‘‘ साले भडुए, चुपचाप जो मिलता है खा ले, वरना गाँ*** पर लात पड़ेंगी!’’  सिंह चिल्लाया।

दूर खड़े खान, दास, मदन, गुरु वगैरह पन्द्रह–बीस लोग भागकर आए और उन्होंने चट्टोपाध्याय को उठाया।

‘‘दोस्तों! हमने संघर्ष वापस लिया है इसका मतलब यह नहीं है कि अपना आत्मसम्मान गिरवी रख दिया है। आत्मसमर्पण करते समय ही हमने सरकार को और वरिष्ठ नौदल अधिकारियों को चेतावनी दी थी कि यदि हममें से एक पर भी बदले की कार्रवाई की गई तो हम फिर से विद्रोह कर देंगे। मेरा ख़याल है कि वह वक्त आ गया है। विद्रोह के एक कार्यक्रम के रूप में मैं आमरण अनशन शुरू कर रहा हूँ।’’  खान ने अपना निर्णय सुनाया और पालथी मारकर नीचे बैठ गया। ‘‘वन्दे मातरम्!’’

‘‘महात्मा गाँधी की जय…’’  नारे शुरू हो गए।

नारे सुनकर बेस कैप्टन,  कैप्टन नॉट भागकर आया।

‘‘क्या गड़बड़ है?  क्या कहना चाहते हो तुम लोग?’’ उसने आगे आते हुए पूछा।

‘‘हमारी माँगें पूरी हुए बिना हम अनशन नहीं तोड़ेंगे।’’ खान ने कहा।

नॉट देखता ही रह गया। चार दिन पहले ही जिन सैनिकों ने बिना शर्त आत्मसमर्पण किया था, वही आज फिर शक्तिशाली ब्रिटिश हुकूमत के सामने डंड ठोकते हुए अपने पुराने जोश से खड़े थे।

‘अभी इनकी मस्ती ख़त्म नहीं हुई है,’  नॉट अपने आप से बुदबुदाया।

‘‘क्या चाहते हो तुम लोग?’’ उसने सैनिकों से पूछा।

‘‘लेफ्टिनेंट ए. सिंह सैनिकों से माफ़ी माँगे, खाने की क्वालिटी सुधरनी चाहिए और ज़्यादा खाना मिलना चाहिए।’’

‘‘अख़बारों से और राष्ट्रीय नेताओं से सम्पर्क स्थापित करने की इजाज़त मिलनी चाहिए। हमें कानूनी सलाह मुहैया कराई जाए, और जाँच कमेटी पक्षपाती नहीं होनी चाहिए।’’ खान ने अपनी माँगें पेश कीं।

‘‘वेल,  तुम्हारी माँगें पूरी करना मेरे अधिकार में नहीं है। मैं वरिष्ठ अधिकारियों के पास भेज देता हूँ। तब तक तुम लोग शान्त रहो,  वरना…’’  नॉट ने धमकी दी ।

‘‘हमारी माँगें पूरी होने तक हमारा सत्याग्रह जारी रहेगा।’’  खान ने शान्ति से कहा।

‘सैनिकों का विद्रोह निर्ममता से कुचल देना चाहिए। कुछ और ट्रूप्स मँगवा लेता हूँ,’ उसने सोचा और अपने ऑफिस की ओर चला। उसने मेसेज पैड सामने खींचा और रॉटरे के लिए सन्देश घसीटा:

=सुपर फास्ट – प्रेषक – मुलुंड कैम्प – प्रति – फ्लैग ऑफिसर बॉम्बे = सैनिकों का अन्न सत्याग्रह। अतिरिक्त भूदल सैनिक चाहिए =

सत्याग्रह पर बैठे सैनिकों की संख्या अब पचास हो गई थी। मराठा रेजिमेंट के सैनिक उनके चारों ओर घेरा डाले हुए थे। गुरु को उनके चेहरे जाने–पहचाने प्रतीत हुए। उसकी नज़र एक चेहरे पर जम गई।

‘‘क्या हाल हैं, साळवी! हमारा–तुम्हारा साथ छूटता नहीं है!’’ ‘तलवार’ को जिन सैनिकों ने घेरा था उनमें साळवी भी था और उस समय उसकी गुरु, दत्त, मदन तथा अन्य अनेक सैनिकों से दोस्ती हो गई थी।

‘‘तुम नेवीवाले बड़े भारी पड़ रहे हो, रावजी! इतनी सारी रामायण हो गई फिर भी तुम्हारा डंक तना ही है। मान   गए तुमको!’’  साळवी की आँखों में प्रशंसा थी।

‘‘कदम सा’ब आपको बहुत याद करते हैं, ’’  साळवी ने कहा।

‘‘हमारा राम–राम कहना उनसे।’’ गुरु ने कहा।

दास,   मदन,   खान और गुरु ने बैरेक में जाने का निश्चय किया और वे सब बैरेक में आ गए।

‘‘यहाँ के हालात के बारे में हमें अपने बाहर के दोस्तों को सूचित करना चाहिए।’’ खान ने कहा।

‘‘आज हम उसे तैयार करेंगे,  भेजने का इन्तज़ाम मैं करता हूँ।’’  गुरु ने आश्वासन दिया।

 

 

 

Courtesy : storymirror.com

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Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.
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