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वड़वानल – 65

लेखक: राजगुरू द. आगरकर

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

 

“मैंने जो हवाईदल की सहायता माँगी थी, उसका क्या हुआ?  वह सहायता अब तक क्यों नहीं पहुँची ?’’  लॉकहर्ट साउथगेट से पूछ रहा था।

‘‘सर,  पहले मैंने मुम्बई और पुणे के एअर फोर्स बेसेस से सम्पर्क करके सहायता माँगी थी। मगर इन बेसेस के अधिकारियों और सैनिकों ने अंग्रेज़ सरकार की सहायता करने से इनकार कर दिया है।’’ साउथगेट ने बताया।

”O, hell with these bloody Indians.”  लॉकहर्ट चिढ़ गया था।  “ फिर  इसके बाद तुमने क्या किया?’’ उसने साउथगेट से पूछा।

‘‘जोधपुर के हवाईदल के स्क्वाड्रन्स को मुम्बई के नौसेना तल पर हमला करने का हुक्म दिया था। पायलट्स हवाई जहाज़ों में बैठ भी गए। मगर सभी हवाई जहाज़ों में एक ही प्रकार का दोष निर्माण हो गया और हवाई जहाज़ उड ही नहीं सके। मेरा ख़याल है कि हिन्दुस्तानी सैनिकों ने नौसैनिकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई न करने का निश्चय कर लिया है,  हमें उन पर निर्भर नहीं रहना चाहिए।’’  साउथगेट ने अपनी कोशिशों के बारे में बताकर अपनी राय दी।

‘‘ठीक है। रॉयल एअर फ़ोर्स के हवाई जहाज़ कल तक यहाँ पहुँचेंगे। हिन्दुस्तानी नौसैनिकों को कल मैं अच्छा सबक सिखाऊँगा।’’  लॉकहर्ट गुर्राया।

 

 

 

गॉडफ्रे सेन्ट्रल कमेटी के सदस्यों से मिलने के लिए तैयार ही नहीं था। बाहर बैठे खान, दत्त गुरु और मदन इन्दर सिंह की राह देख रहे थे।

‘‘गॉडफ्रे तुम लोगों से मिलने के लिए तैयार नहीं है। उसके हाथ में अब कुछ भी नहीं है,  यदि घेरा उठवाना हो या सरकार से बातचीत करनी हो तो तुम लोग जनरल लॉकहर्ट से मिलो,  मगर इससे पहले ब्रिगेडियर साउथगेट से मिल लो,  ऐसी सलाह वे दे रहे हैं।’’   इन्दर सिंह ने भावनाहीन चेहरे से कहा।

‘‘अगर यह हमें पहले ही बता दिया होता तो?’’ दत्त ने पूछा ‘‘हमने उन दोनों को छोड़कर और तुम्हारे साथ यहाँ आकर गलती की है। यदि वे तीनों हमारे कब्ज़े में होते तो गॉडफ्रे झख मारकर हमसे बात करता।’’   मदन ने गुस्से से कहा।

”Forget it.  तुम साउथगेट से मिलो। मेरा ख़याल है कि इससे फ़ायदा होगा। वह तुम्हें टाउन हॉल में मिलेगा। फ़िलहाल उसका ऑफ़िस वहीं है। ”Well,  All the best.”  इन्दर सिंह हँसते हुए निकल गया।

 

 

 

 

खान अपने सहयोगियों के साथ टाउन हॉल पहुँचा तो साउथगेट अपने ऑफिस में ही था। पहरेदार ने सहयोगियों सहित खान के आने की सूचना दी और साउथगेट ने अपने अन्य कामों को एक तरफ़ हटाकर उन्हें भीतर बुलाया ।    ”Come in! साउथगेट ने रूखी आवाज़ में उनका स्वागत किया। असल में अपनी आवाज़ के इस रूखेपन को वह टालना चाहता था। मगर सेना की प्रदीर्घ सेवा के कारण यह रूखापन उसमें इतना रच–बस गया था कि आवाज़ में मुलायमियत  लाना नामुमकिन था।

बातचीत किस तरह शुरू की जाए यह सोचते हुए उसने पाइप सुलगाया। दो–चार  गहरे–गहरे  कश  लेकर  सीने में धुआँ भर लिया और हौले–हौले नाक–मुँह से धुआँ बाहर निकालते हुए वह बोलने लगा।

‘‘तुमने सिर्फ दो अधिकारियों को आज़ाद किया है। मगर सारे अस्त्र–शस्त्र, गोला–बारूद और विलयम्स तुम्हारे ही कब्ज़े में है… ।’’

‘‘आप आख़िर चाहते क्या हैं ?’’   दत्त ने पूछा।

‘‘सारे अस्त्र–शस्त्र और गोला–बारूद ताला बन्द करके चाबियाँ हमारे हवाले कर दो और विलयम्स को फ़ौरन छोड़ दो।“ साउथगेट ने अपनी अपेक्षा स्पष्ट की ।

‘‘हमने बिना शर्त दो अधिकारियों को आज़ाद कर दिया है,  और गोलीबारी भी बन्द कर दी है। अब इससे आगे आप हमसे किसी और बात की उम्मीद करते हैं तो पहले सेना का घेरा उठाना होगा।’’   खान ने चिढ़कर कहा।

‘‘सेना का घेरा उठाने की पूर्व शर्त तुम्हें मालूम है, – Unconditional surrender.”  साउथगेट ने शान्ति से कहा।

सैनिक इस तरह से आत्मसमर्पण के लिए तैयार नहीं होंगे इसका खान और उसके सहयोगियों को पूरा यकीन था।

‘‘नहीं,  ये सम्भव नहीं है। पहले घेरा उठाइये,  फिर हम विचार करेंगे।’’  खान ने चिढ़कर जवाब दिया।

‘‘ठीक है, as you wish. अगर तुम लोग surrender  नहीं करना चाहते तो मुझे कुछ और सोचना पड़ेगा।’’  साउथगेट की धमकाती आवाज़, उसके बोलने का तरीका,  उसके चेहरे के भाव देखकर खान समझ गया कि साउथगेट सरल मन का इन्सान नहीं है। वह पक्का… है। खान को यह भय सताने लगा कि कहीं वह हमें यहाँ हिलगाए रखकर यह अफ़वाह न फ़ैला दे कि हमने आत्मसमर्पण कर दिया है । ‘यहाँ से बाहर निकलना ही चाहिए ।’  उसने सोचा और शान्त सुर में साउथगेट से कहा,  ‘‘बिना शर्त आत्मसमर्पण करने का निश्चय बहुत महत्त्वपूर्ण निश्चय है और वह मैं अकेला इन तीनों साथियों के साथ नहीं ले सकता। इसके लिए सेन्ट्रल कमेटी की मीटिंग बुलाना ज़रूरी है। हम चर्चा करने के बाद अपने निर्णय की सूचना आपको देंगे।’’

‘‘ठीक है,  मगर निर्णय जितनी जल्दी हो सके,  लीजिए। अगर हमने नौसेना को नष्ट करने का हुक्म दे दिया तो उसे वापस न ले सकेंगे,  यह  बात ध्यान में रखना। ” साउथगेट ने धमकाते हुए कहा।

खान,  दत्त,  गुरु और मदन को एक ही बात का अफ़सोस हो रहा था: ‘हमने दो अधिकारियों को आज़ाद कर दिया और साउथगेट से मिलने गए यह बहुत बड़ी गलती थी।‘

 

 

 

रॉटरे का ‘तलवार’  पर जाने का मन नहीं था,  परन्तु लॉकहर्ट ने अपने साथ आए कर्नल ग्रीफिथ को ‘तलवार’  की स्थिति का जायज़ा लेने के लिए कहा,  और रॉटरे से कहा कि उसके साथ जाए। रॉटरे को मजबूरन जाना पड़ा।

रॉटरे और ग्रीफिथ ‘तलवार’  पर पहुँचे तो शाम के छह बज चुके थे। ‘तलवार’  के सैनिक आज़ादी से घूम रहे थे,  उन पर किसी का भी नियन्त्रण नहीं था।

“ ‘तलवार’ में निहत्थे प्रवेश करना ख़तरनाक तो नहीं है ना ?’’   ग्रीफिथ ने पूछा।

‘‘फिकर मत करो,  वे हम पर हमला नहीं करेंगे,  क्योंकि उनके नेताओं ने उन्हें हथियार न उठाने का आदेश दिया है। गाँधीजी के विचारों से प्रभावित नौसैनिक हमें छुएँगे तक नहीं। और मान लो,  अगर ऐसा कुछ हुआ तो पहरे पर तैनात अपने सैनिकों को बुला लेंगे।’’

जैसे ही रॉटरे और ग्रीफिथ ‘तलवार’  पहुँचे,  पन्द्रह–बीस सैनिक ‘रॉटरे,  हाय हाय!’ , ‘रॉटरे, गो बैक’  के नारे लगाते हुए दौड़े। दास भागकर आगे आया। इस अनपेक्षित प्रसंग से रॉटरे और ग्रीफिथ बेचैन हो गए।

‘‘दोस्तों! आज हम यहाँ आए हैं…’’   रॉटरे कुछ कहने की कोशिश कर रहा था। मगर नारों के शोरगुल में उसकी आवाज़ दब गई।

सैनिकों की संख्या और उनका शोर बढ़ता ही जा रहा था। किसी ने आगे जाकर मेन गेट बन्द कर दिया। दास परेशान हो गया। सैनिकों का घेरा तोड़ते हुए वह रॉटरे के करीब पहुँचा।

‘‘रॉटरे,  तुम दोनों ने यहाँ आकर गलती की है। अब यहाँ रुकने की भयानक गलती न कर बैठना।’’   दास ने सलाह दी ।

रॉटरे को दास की सलाह उचित लगी । वह घेरा तोड़ने की कोशिश करने लगा। सैनिकों के नारों ने ज़ोर पकड़ लिया। चिढ़े हुए एक–दो सैनिक आगे बढ़े। दास तीर के समान आगे लपका। रॉटरे पर पड़ने वाले दो हाथों को दास ने ऊपर ही रोक लिया।

‘‘युद्ध और प्यार में सब कुछ माफ़ है – यह अंग्रेज़ी कहावत है। मगर हमारी संस्कृति यह है कि युद्धों को नीति और नियमों से ही जीता जाए।’’  दास समझा रहा था । ‘‘हालाँकि इस समय रॉटरे हमारा दुश्मन है, वह अत्याचारी है, फिर भी इस समय वह निहत्था है । वह लड़ने के लिए नहीं आया है । सेन्ट्रल कमेटी की ओर से मैं आप लोगों से अपील करता हूँ कि इन दोनों को सही–सलामत ‘तलवार’ से बाहर जाने दें!’’

नारे थम गए । कोई चिल्लाया, ‘‘ठीक है । हम इन्हें बाहर जाने देंगे, मगर इन दोनों को ‘तलवार’  से बाहर निकलने तक अपनी कैप्स उतारनी होंगी ।’’

इस माँग का गड़गड़ाहट से  समर्थन किया गया।

‘‘रॉटरे,  मेरा  ख़याल है कि इसके अलावा कोई चारा नहीं।’’  दास  ने  कहा ।

रॉटरे और ग्रीफिथ ने पलभर को सोचा और अपनी–अपनी कैप हाथ में लिये वे मेन गेट की ओर चलने लगे। रॉटरे के मन में इस अपमान का बदला लेने की विभिन्न योजनाएँ बन रही थीं । उसने मन ही मन ठान लिया कि जिन सैनिकों ने हमें कैप्स उतारने पर मजबूर किया है,   चौराहे पर  उनके कच्छे उतरवाऊँगा।

 

 

 

‘‘क्या हमें लॉकहर्ट से मिलना चाहिए? ’’ मदन ने टाउन हॉल से बाहर निकलकर पूछा।

‘‘मैं नहीं समझता कि इससे कोई लाभ होगा,’’  निराशा से खान ने जवाब दिया।

‘‘यह न भूलो कि हम पर बीस हज़ार सैनिकों की ज़िम्मेदारी है। हर सम्भव पत्थर को पलटकर देखना होगा।’’ गुरु ने सुझाव दिया। दत्त का भी यही विचार था। अत: चारों फॉब हाउस पहुँचे। मगर लॉकहर्ट वहाँ नहीं था।

जैसे ही पता चला कि सेन्ट्रल कमेटी के सदस्य आए हैं,  रॉटरे ने उन्हें भीतर बुलाया।

‘‘फिर क्या तय किया आपने?’’  रॉटरे ने कुछ अकड़ से पूछा।

‘‘तय क्या करना है?   जब तक माँगें पूरी नहीं हो जातीं,   हम पीछे नहीं हटेंगे।’’   खान अपना संयम खो रहा था,  वह बेचैन हो गया था।

‘‘सैनिकों को शान्त रखो। यदि उन्होंने ज़रा–सी भी गड़बड़ी की तो किसी भी तरह की दया नहीं दिखाई जाएगी,  यह याद रखो!’’  रॉटरे ने घुड़की दी।

‘‘हिन्दुस्तानी सैनिक शान्त थे और शान्त ही हैं। गड़बड़ की थी ब्रिटिश सैनिकों ने। आप उन्हें काबू में रखिये, और याद रखिये, यदि उन्होंने एक भी गोली चलाई तो हम उसका मुँहतोड़ जवाब देंगे। यह न भूलिये कि हमारे पास बहुत सारा गोला–बारूद है।’’  खान ने टका–सा जवाब दिया।

खान के जवाब से रॉटरे को काफ़ी गुस्सा आ गया। ‘सालों को सबक सिखाना होगा।’  वह अपने आप से पुटपुटाया,  ‘ये समय नहीं है’   उसने स्वयँ को समझाया। चेहरे के भाव न बदलते हुए वह शान्त सुर में बोला, ‘‘भूदल के पहरेदार  शान्त  हैं,  हाँ,  मगर यदि तुम लोगों ने हथियार नहीं डाले तो फिर….’’

‘‘भूदल का घेरा उठाकर हमारी सारी माँगें मान लो, ’’   खान ने कहा।

‘‘वह मेरे हाथ में नहीं है,’’   रॉटरे ने असमर्थता जताई।

दोनों पक्ष ख़ामोश हो गए और फॉब हाउस में सन्नाटा छा गया।

‘‘तो, बिना शर्त आत्मसमर्पण करोगे ?’’   कुछ देर रुककर रॉटरे ने पूछा।

‘‘यह सम्भव नहीं, ’’  खान ने जवाब दिया ।

‘‘ठीक है।’’  रॉटरे उठ गया। खान और उसके साथियों को यह जाने का आदेश था।

Courtesy: storymirror.com

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Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.

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