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वड़वानल – 60

लेखक: राजगुरू द. आगरकर

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

 

 

कैसेल बैरेक्स के सैनिकों को तैयारी के लिए दो घण्टे मिल गए। उपलब्ध गोला–बारूद और हथियार बाँट दिये गये। कैसेल बैरेक्स में जाने के लिए मेन गेट के अलावा दो और गेट्स थे। इन दोनों   गेट्स – गन-गेट  तथा डॉकयार्ड-गेट से हमला होने की सम्भावना थी,  इसलिए इन दोनों गेट्स पर भेदक–शस्त्रों से लैस अतिरिक्त सैनिक नियुक्त किए गए। सुरक्षा दीवार के पास टोही टीम नियुक्त की गई । कैसेल बैरेक्स का छोटा–सा दवाख़ाना उपलब्ध साधनों की सहायता से सुसज्जित किया गया;  ज़ख्मी सैनिकों पर उपचार करने की दृष्टि से यह ज़रूरी था। दवाख़ाने पर हमला न हो इसलिए उस पर रेडक्रॉस का झण्डा फ़हराया गया। कम्युनिकेशन के दो सैनिकों ने कमेटी के सदस्यों से सम्पर्क स्थापित किया।

गॉडफ्रे और बिअर्ड ने कैसेल बैरेक्स पर चारों ओर से फुल स्केल अटैक करके सैनिकों को ख़त्म करने का निश्चय किया था। पहली गोली चलाने के बाद बीच के दो घण्टों में सैनिकों की ओर से कोई जवाब नहीं आया था, इसलिए वे ख़ुश थे। गद्दार मराठा रेजिमेन्ट को पीछे हटाकर साम्राज्य के प्रति ईमानदार गोरी सैनिक टुकड़ी के दाखिल होने तक वे चुप बैठे रहे।

”Maratha Regiment replaced by British troops Request Further instruction.”  बिअर्ड ने सैम्युअल की ओर से आया सन्देश गॉडफ्रे को पढ़कर सुनाया ।

‘‘ब्रिटिश ट्रूप्स लाने में उन्होंने बड़ी देर कर दी।’’   गॉडफ्रे की आवाज़ में नाराज़गी थी। ”Any way, अब समय गँवाने से कोई फ़ायदा नहीं। Ask them to launch full scale attack.” गॉडफ्रे ने आदेश दिया।

 

‘‘सर, मेरा ख़याल है कि हम चारों ओर से हमला करने का नाटक करेंगे,  मगर हमला कमज़ोर भाग पर ही करेंगे।’’ कैसल बैरेक्स का नक्शा फैलाते हुए बिअर्ड ने कहा।

‘‘पहले हम मेन गेट पर हमला करेंगे। नौसैनिक इस हमले में उलझ गए कि हम गन-गेट और डॉकयार्ड-गेट पर हमला करेंगे। यहाँ प्रतिकार कम होने के कारण हमें आसानी से विजय प्राप्त होगी और कैसेल बैरेक्स पर हम कब्जा कर सकेंगे। यह ‘बेस’  एक बार अपने हाथ में आ जाए,  फिर तो आगे का काम आसान हो जाएगा।’’  गॉडफ्रे की सहमति के लिए बिअर्ड ने योजना उसके सामने रखी।

‘‘तुम्हारा जो जी चाहे, करो! मुझे कैसेल बैरेक्स चाहिए!’’ गॉडफ्रे ने कहा और व्यूह रचना समझाने के लिए बिअर्ड कैसेल बैरेक्स की ओर निकला।

‘‘अटैक!’’ बिअर्ड की ओर से ग्रीन सिग्नल मिलते ही सैम्युअल ने हुक्म दिया और गोरे सैनिकों की बन्दूकें धड़धड़ाने लगीं। मेन गेट और बायें पार्श्व से,  रिज़र्व बैंक की इमारत के ऊपर से उन्होंने मार करना आरम्भ किया। पूरा वातावरण बन्दूकों की आवाज़ से दनदनाने लगा। नौसैनिक इस मार का करारा जवाब दे रहे थे। रिज़र्व बैंक की इमारत से तीव्र हमला हो रहा है और वहाँ हमारी मार कम पड़ रही है,   यह बात ध्यान में आते ही धरमवीर और मणी सुरक्षा–दीवार की आड़ से आगे सरके। रिज़र्व बैंक की गैलरी में बन्दूक की नली दिखाई देते ही दोनों ने अपनी–अपनी मशीनगनों से फ़ायर करना आरम्भ कर दिया। स्टेनगन पकड़े एक गोरा सेकण्ड लेफ्टिनेंट गैलरी से अन्तिम हिचकियाँ लेते हुए नीचे गिरा।

एक अन्य गोरा सैनिक सीने पर सात–आठ गोलियाँ झेलकर चित हो गया। पाँच सैनिक ज़बर्दस्त जख्मी हुए थे। अब उस तरफ़ से होने वाला आक्रमण रुक गया था।

कामचलाऊ अस्पताल की छत पर नि:शस्त्र कृष्णन यह देखने के लिए गया कि बाहर क्या चल रहा है। छत पर रेडक्रॉस का झण्डा फ़हरा रहा था इसलिए वह निश्शंक था।

ब्रिटिश सैनिकों ने कृष्णन को देखा और पलभर में एक सनसनाती गोली उसके सीने को छेद गई। कृष्णन नीचे गिर पड़ा। खून के सैलाब में धराशायी कृष्णन विद्रोह का पहला शहीद था।

‘‘****साले! रेडक्रॉस के झण्डे के नीचे खड़े निहत्थे सैनिक पर गोली चला रहे हैं। अरे,  हिम्मत है तो ऐसे,  सामने आओ!’’  हरिचरण चीखते हुए आगे दौड़ा ।

हरिचरण का जोश देखकर कैसल बैरेक्स का गुरमीत सिंह भी आगे बढ़ा और उनकी स्टेनगन्स आग उगलने लगीं। इस अचानक हुए हमले से अवाक् गोरे सैनिक होश में आकर जवाब दें, तब तक दो गोरे सैनिक खत्म हो गए थे और चार–छह घायल हो गए थे।

नौसैनिकों ने मानो अपनी इस हरकत से अंग्रेज़ी सरकार को चेतावनी दी थी कि ‘‘तुम अगर हम पर हमला करोगे, तो वह तुम्हें महँगा पड़ेगा,  और एक घूँसे का जवाब हम दो घूँसों से देंगे।’’

चार ब्रिटिश सैनिकों और एक अधिकारी के मारे जाने की ख़बर से गॉडफ्रे अस्वस्थ हो गया। जितना उसने समझा था,  उतना आसान नहीं था विद्रोह को दबाना।

”Bastards, हमारी ताकत का अन्दाज़ा नहीं है तुमको। तुम जाओगे कहाँ? अच्छा सबक सिखाऊँगा मैं तुम्हें।’’    चिढ़ा हुआ गॉडफ्रे चीख रहा था। ”Call Rautre” उसने पहरे पर तैनात सैनिक से कहा।

 

 

 

 

‘तलवार’  पर सेंट्रल कमेटी की मीटिंग दोपहर के बारह बजे तक चल रही थी।

‘‘कैसल बैरेक्स के सैनिक गोरे सैनिकों को करारा जवाब दे रहे हैं। हमारे मुकाबले में गोरों का नुकसान ज़्यादा हुआ है।’’  खान ने जानकारी दी।

‘‘अंग्रेज़ों ने सभी नाविक तलों पर पहरे बिठा ही रखे हैं। यदि इन तलों पर हमले हुए तो नौसैनिकों को बचाया कैसे जाए?’’   गुरु ने पूछा।

‘‘नाक दबाए बिना मुँह नहीं खुलेगा।’’    दत्त ने कहा।

‘‘मतलब?’’    खान ने पूछा।

‘‘आज नौसेना के जहाज़ हमारे कब्जे़ में हैं। उनका इस्तेमाल हम करें,   ऐसी मेरी राय है।’’    दत्त ने कहा।

‘‘अब ‘तलवार’  के चारों ओर भी घेरा पड़ा है। यहाँ के हिन्दुस्तानी सैनिक हटाकर सरकार कब गोरों की सेना लाएगी और हमला करेगी इसका कोई भरोसा नहीं है। यदि ऐसा हुआ तो सेंट्रल कमेटी के सदस्य विवश हो जाएँगे और तब पूरा संघर्ष ही नेतृत्वहीन हो जाएगा।’’    गुरु ने डर व्यक्त किया।

‘‘गुरु का भय जायज़ है। मेरा विचार है कि ‘तलवार’  पर दो–तीन लोग रुकें और बाकी लोग अन्यत्र चले जाएँ।’’   दत्त ने सुझाव दिया।

‘‘अन्यत्र मतलब कहाँ?   हमले का ख़तरा तो सभी स्थानों पर है, ’’  खान ने पूछा।

“जहाज़ अधिक सुरक्षित हैं। यदि ऐसा पता चले कि हमला हो रहा है, तो जहाज़ों को समुद्र में हाँका जा सकता है और वहाँ से प्रतिकार किया जा सकता है,” दत्त ने सुझाव दिया।

दत्त के सुझाव को सबने मान लिया और थोड़ी बहुत चर्चा के बाद यह निश्चित किया गया कि सेंट्रल स्ट्राईक कमिटी का कार्यालय HMIS ‘नर्मदा’ पर स्थानांतरित किया जाए।

HMIS ‘नर्मदा’ हिंदुस्तान की शाही नौसेना की ध्वज नौका थी। सन् 1941 में निर्मित इस जहाज़ ने दूसरे महायुद्ध में भाग लिया था. उस समय का वह एक अत्याधुनिक जहाज़ था। ‘नर्मदा’ के शस्त्रागार में बारा पौण्ड वाली तोपें, विमान विरोधी तोपें, पनडुब्बी विरोधी टॉरपीडो दागने की सामग्री, चार इंच वाली तोपें…यह सब था। ज़रूरत पड़ने पर इस सब का प्रयोग करना संभव होगा, इसी उद्देश्य से सेन्ट्रल कमिटी का कार्यालय नर्मदा पर स्थानांतरित किया गया था. ‘तलवार’ पर दास, पांडे, चाँद, सूरज – ये चार लोग रुक गए.

‘नर्मदा’ पर पहुँचते ही खान ने सभी जहाज़ों और नाविक तलों को संदेश भेजा:

– फ़ास्ट – 211205 – प्रेषक – अध्यक्ष सेंट्रल स्ट्राईक कमिटी – प्रति – सभी जहाज़ व नाविक तल।

= कमिटी का कार्यालय 211205 से ‘नर्मदा पर आ गया है।सात सौ किलो साइकल्स पर चौबीसों घण्टे वॉच रखो, हमला होने पर करारा जवाब दो =

संदेश भेजने के बाद सेंट्रल कमिटी की बैठक शुरू हुई।

“नाविक तलों पर सैनिकों की संख्या और गोला बारूद मर्यादित है। यदि अंग्रेज़ फ़ुल स्केल अटैक करते हैं तो नौसैनिक टिक नहीं पाएँगे। उनकी ताकत बढ़ानी होगी। यह कैसे करना है, इस पर विचार करना होगा,” गुरू ने सुझाव दिया।

“यही तो असल बात है। चारों ओर सैनिकों का घेरा पड़ा है…ये घेरे तोड़कर सैनिकों तक मदद पहुँचाना नामुमकिन है,” असलम के स्वर में निराशा थी।

“हम ‘फ़ोर्ट बैरेक्स’, ‘कैसेल बैरेक्स’, और ‘तलवार’ को जहाज़ों की सहायता से ‘फ़ायर अम्ब्रेला’ दे सकेंगे।“ खान ने उपाय सुझाया। “मगर ऐसा करते समय संभावित जान और माल की हानि का भी विचार करना होगा। होने वाला नुक्सान हिंदुस्तान का होगा। मरने वालों में निरपराध हिंदुस्तानी नागरिक होंगे। इस नुक्सान से ब्रिटेन का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा।“ गुरू ने ख़तरे स्पष्ट किए।

“मेरा विचार है, कि सबसे पहले हम सैनिकों का हौसला बढ़ाएँ। उन्हें सूचित करना होगा कि हम सब तुम्हारे साथ हैं। आक्रमण होने पर हमें सूचना दें। हमले का प्रतिकार करें, मगर आक्रामक न बनें!” दत्त का यह सुझाव मान लिया गया और वैसा संदेश भेज दिया गया।

“इस समय हमारे कब्ज़े में बीस जहाज़ हैं। इन जहाज़ों पर पर्याप्त मात्रा में गोला बारूद और तोपें हैं। इन जहाज़ों का इस्तेमाल हम ‘डॉकयार्ड’, ‘कैसेल बैरेक्स’ और ‘फोर्ट बैरेक्स’ की सुरक्षा के लिए करेंगे। अंग्रेज़ों ने यदि हिंदुस्तान की नौसेना की सम्पत्ति को नष्ट करने का प्रयत्न किया तो हम उसका प्रतिकार करेंगे; क्योंकि ये सम्पत्ति हमारी है।“ गुरू ने सुझाव दिया।

खान और दत्त ब्रेक वाटर में खड़े ‘नर्मदा’ पर आए हैं यह पता चलते ही डॉकयार्ड के जहाज़ों के सैनिक इकट्ठे हो गए और उन्होंने दत्त और खान से मार्गदर्शन लेने की इच्छा प्रकट की। ‘नर्मदा’ के एक बाज़ू में खड़े HMIS ‘कुमाऊँ’ के ब्रिज पर खान खड़ा हो गया और उसने वहाँ एकत्रित नौसैनिकों को संबोधित किया।

खान ने सुबह से ‘कैसेल बैरेक्स’ में हुई घटनाओं को स्पष्ट किया; बैरेक्स के सैनिकों ने गोरे सैनिकों के थोबड़े कैसे तोड़ दिए ये बताकर उसने भूदल सैनिकों से अपील की:

“ ‘कैसेल बैरेक्स’ का घेरा डाले हुए मराठा रेजिमेंट के सैनिकों ने ‘कैसेल बैरेक्स’ पर हमला करने से इनकार कर दिया। उनकी इस दिलेरी की जितनी भी तारीफ़ की जाए, कम है। हम उनसे अपील करते हैं कि हमारे साथ इस संघर्ष में शामिल हो जाएँ। अपनी इज़्ज़त को, आत्म सम्मान को बचाने के लिए, देश की स्वतंत्रता के लिए हमारे साथ आइए।” एकत्रित सैनिकों ने नारे लगाए: ‘इन्कलाब ज़िंदाबाद! ‘जय हिंद!’ आर्मी-नेवी एक हों!’

खान ने सबको शांत किया।

“स्वतंत्रता के सूर्य के उदित होने के लक्षण देखते ही गोरे चमगादड़ों ने जहाज़ों और नाविक तलों से अपना मुँह काला कर लिया है। मगर अभी भी कुछ गोरे सैनिक और अधिकारी जहाज़ों और नाविक तलों पर दुबक कर बैठे हैं। वे तुरंत जहाज़ और नाविक तल छोड़ दें; हम उनका विरोध नहीं करेंगे। आज़ाद हिंद नौसेना की ओर से मैं हिंदुस्तानी नौसेना अधिकारियों से अपील करता हूँ कि उनका हमारा शत्रु एक ही है। वे भी हिंदुस्तानी हैं। हमारा संघर्ष किसी स्वार्थ से प्रेरित नहीं है,   वह स्वतन्त्रता के लिए है,   हमारे आत्मसम्मान के लिए है। यदि हिन्दुस्तानी अधिकारी हमारे साथ आएँ तो, बेशक, उन्हें प्राप्त होने वाली सभी सहूलियतों से महरूम होना पड़ेगा, मगर मातृभूमि की स्वतन्त्रता के लिए लड़ने की खुशी उन्हें प्राप्त होगी। स्वतन्त्र हिन्दुस्तान में वे सम्मान से जी सकेंगे। यदि हिन्दुस्तानी अधिकारियों को हमारे साथ नहीं आना है तो वे जहाज़ और नाविक तल छोड़ दें,  हमारे साथ दगाबाज़ी न करें। मैं उन्हें आश्वासन देता हूँ कि तुम्हारे अंग्रेज़ों के जूते चाटने वाले कुत्ते होने के बावजूद हम तुम पर वार नहीं करेंगे, क्योंकि तुम राह भूल गए हो । तुम हिन्दुस्तानी हो । मगर, यदि हमसे दगाबाजी की तो फिर तुम्हारी ख़ैर नहीं,  हम तुम्हारा कोई लिहाज नहीं करेंगे।“

 

‘‘दोस्तो!’’ खान ने आगे कहा,  ‘‘हमें अपनी नौदल सम्पत्ति की – डॉकयार्ड और डॉकयार्ड में उपलब्ध सुविधाओं की रक्षा करनी है। नागरी सम्पत्ति का नाश न हो, हमारे देशवासी अपनी जान न गँवाए – यह सुनिश्चित करना है,  मगर इसके साथ ही आज़ाद हिन्द नौसेना के जवानों की रक्षा के लिए हम किसी की भी परवाह नहीं करेंगे इस बात का ध्यान रहे। हम लड़ने वाले हैं आख़िरी साँस तक,  लड़ने वाले हैं एक दिल से। अन्तिम विजय हमारी ही है। जय हिन्द!’’

खान ने भाषण समाप्त किया और सैनिकों ने नारे लगाए।

खान और दत्त ‘नर्मदा’  पर लौटे। खान ने सभी जहाज़ों को सेमाफोर से सन्देश भेजा।

सुपरफास्ट – 211245 – प्रेषक – अध्यक्ष सेन्ट्रल कमेटी – प्रति – सभी जहाज़ = बन्दरगाह से बाहर निकलने के लिए तैयार रहो। पन्द्रह मिनट पहले सूचना दी जाएगी,   तोपें तैयार रखो =

सन्देश भेजते समय किसी ने भी नहीं सोचा था कि कोई एक अंग्रेज़ अधिकारी यह सन्देश पढ़ लेगा और तिल का ताड़ बना देगा।

 

 

Courtesy: storymirror.com

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Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.
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