Sign Up    /    Login

वड़वानल – 39

लेखक: राजगुरू द. आगरकर

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

 

 

नाश्ते के लिए वे मेस में गए । हमेशा की तरह लम्बी कतार थी । ‘‘पहेण   दी…   त्वाडे मा दी…   साले   दो   काउन्टर   क्यों   नहीं   शुरू   करते ?   हरामी, साले!’’    अश्लील    गालियों    की    बौछार    करते    हुए    जी.    सिंह    पूछ    रहा    था ।

‘‘काउन्टर  बढ़ाने  के  लिए  पर्याप्त  कुक्स  होने  चाहिए  ना ?  यहाँ  तो  हर  वॉच में चार–चार कुक्स! वे भी    क्या–क्या करेंगे ?’’    खान    ने    स्थिति    स्पष्ट    की ।

कतार    कछुए    की    गति    से    आगे    सरक    रही    थी ।

‘‘चल,  जाने  दे,  मरने  दे उस ब्रेकफास्ट को । देने वाले क्या हैं – दो  पूरियाँ  और चम्मच भर दाल ही तो   मिलने वाली है ना ?’’   चार से आठ ड्यूटी करके आया हुआ यादव उकताकर बोला।

‘‘सही में,   चल अपन चले जाएँ । एक–एक घण्टा राह देखने के लिए हम भिखारी नहीं हैं!’’    गुरु ने सहमति दर्शाई ।

‘‘अपने  अधिकारों  के  लिए  हमें  लड़ना  चाहिए ।  भाग  जाने  में  मर्दानगी  नही है!’’   खान   ने   उन्हें   रोका ।

‘‘वो देख, ऑफिसर ऑफ दि डे मेस में आया है राउंड लेने के लिए और टेस्टिंग के लिए ।’’    गुरु ने सब लेफ्टिनेंट रॉड्रिक्स की ओर देखते हुए कहा ।

‘‘अरे,    वो    राउंड    के    लिए    कम    और    टेस्टिंग    के    लिए    ज्यादा    आता    है ।’’    यादव ने    कहा ।

‘‘चलो,  उससे  पूछें  कि  दूसरा  काउन्टर  क्यों  नहीं  खोलता ?’’  खान  ने  कहा ।

और वह रॉड्रिक्स की दिशा में बढ़ गया । आठ–दस और भी लोग उसके साथ हो लिए ।

”What’s the matter?” रॉड्रिक्स   ने   पूछा ।

”We are in the Que for last forty five minutes, but…”  चिढ़े हुए खान को बीच में ही रोककर रॉड्रिक्स ने मुँहजोरी से पूछा,  ”So what? Go and stand in que…”

‘‘कितनी देर खड़े रहें, दूसरा काउन्टर खोलने को कहिए, हमें बाहर जाना है ।’’   यादव।

”Don’t teach me.” रॉड्रिक्स ।

”It is a suggestion.” खान ने कहा ।

”Get lost from here.”  रॉड्रिक्स   सैनिकों   को   तुच्छ   समझते   हुए   बोला ।

”Why get lost? अरे,   ये   क्या   नाश्ता   है ?’’   नाश्ते   की   एक   थाली   और मग रॉड्रिक्स के सामने नचाते हुए दत्त बोला, ‘‘ये चाय पीकर देख । कोई स्वाद है ?  ये  दाल  तो  बस  तीखा–तीखा  पानी  है  और  ये  पूरियाँ  कीड़ों  से  भरी  हैं ।  भीतर जाकर  ब्रेड–मक्खन  खाकर  कमेन्ट्स–बुक  में  झूठे  कमेन्ट्स  लिखने  के  बदले  ये  दाल और    पूरी    खाकर    देख…’’

”Shut up!” रॉड्रिक्स     चीखा ।

”Don’t Shout!” दत्त  की  आवाज  ऊँची  हो  गई  थी । ‘‘ये  हमारी  शिकायत है और तुझे इसे सुनना पड़ेगा ।’’

अब    पन्द्रह–बीस    लोग    रॉड्रिक्स    को    घेरकर    खड़े    हो    गए ।

‘‘नौसेना का आज तेरा आख़िरी दिन है,     कम से कम वह तो चैन से बिताओ ।’’    रॉड्रिक्स    कुत्सित    आवाज    में    बोला ।

दत्त ने रॉड्रिक्स की नजरों में देखते हुए हँसकर कहा,  ‘’’I am not a coward, आख़िरी  दिन  तक  तो  क्या,  जीवन  की  अन्तिम  साँस  तक  भी  मैं  अपने  अधिकारों के   लिए   लड़ता   रहूँगा ।’’   दत्त   की   नजरों   की   आग   रॉड्रिक्स   तक   पहुँच   रही   थी ।

”Look, officer, you will listen to us.” भीड़   में   से   किसी   ने   कहा ।

रॉड्रिक्स ने सोचा नहीं था कि सैनिक इस तरह बदतमीजी से बात करेंगे । अपने  चारों  ओर  पड़े  हुए  सैनिकों  के  घेरे  को  देखकर  वह  घबरा  गया  और  मरियल आवाज   में बोला,  ”All right. Come on, speak up.”

‘‘आज इतवार है । डेली ऑर्डर में ब्रेकफास्ट का मेनू ब्रेड, बटर, जैम और बॉइल्ड एग्ज़ हैं । हमें यह सब मिलना ही चाहिए ।   हमारा   राशन   कहाँ   गया ?’’ दत्त   ने   पूछा ।

‘‘आज सप्लाई नहीं आई होगी,  मैं पता करता हूँ ।’’  रॉड्रिक्स  कोई  रास्ता ढूँढ़ने की कोशिश कर रहा था ।

‘‘पहले  अपने  गाल  पर  लगा  मक्खन  तो  पोंछ  लो ।’’  किसी  ने  शरारत  से सलाह    दी    तो    रॉड्रिक्स    का    हाथ    अपने    गाल    की    ओर    चला    गया ।

‘‘अगर गैली में सप्लाई नहीं हुई तो तुम्हारे गाल पर मक्खन कहाँ से आया ?’’ फिर वही शरारती आवाज़ ।

रॉड्रिक्स    के    गाल    पर    कुछ    भी    नहीं    लगा    था ।

” We want our ration,” दत्त   चिल्लाया ।

रॉड्रिक्स अब घबरा गया था । वह सोच रहा था कि यहाँ से निकले कैसे । ड्यूटी चीफ़ पेट्टी ऑफिसर को मेस की    ओर आता देखकर उसे कुछ ढाढ़स बँधा । उसने चीफ़ जॉर्ज को बुलाया। मेस में सभी की नज़रें रॉड्रिक्स पर थीं । उसक चारों ओर सैनिकों की भीड़ बढ़ती जा रही थी ।

चीफ    जॉर्ज    मेस    में    आया ।

”You, bloody coolies, you want bread, butter and jam?  अपने घर  में  बासी  रोटी  भी  मिलती  है  क्या ? तुम अपने आप को समझते क्या  हो ?’’ चीफ़ जॉर्ज को मेस में आया देखकर रॉड्रिक्स को जोश आ गया था ।

रॉड्रिक्स  के  इस  अपमानजनक  और  मगरूर  वक्तव्य  से  वहाँ  उपस्थित  सभी लोगों   को   गुस्सा   आ   गया,   कुछ   लोगों   की   आँखों   से   चिंगारियाँ   निकलने   लगीं । ”You bloody…” मुट्ठियाँ  भींचते  हुए  दास  रॉड्रिक्स  पर  चढ़ने  ही  वाला  था, कि तभी दत्त ने उसे पीछे खींचा । ‘‘नहीं, दास, इस तरह अपना आपा न खोना, यही परीक्षा की घड़ी है ।’’    दत्त ने समझाया ।

दास  के  क्रोध  को  और  दत्त  के  उसे  रोकने  को  रॉड्रिक्स  ने  देख  लिया ।  एक काला   सैनिक   उस   पर   हमला   करने   की   कोशिश   करे,   यह   उससे   बर्दाश्त   नहीं   हुआ । वह दत्त और दास पर चिल्लाया,  ”Come on, get lost from here and remember–beggars cannot be choosers.”

”We are not beggars, but we are masters of this country.”  खान ने  चीखकर कहा और उसने अपनी प्लेट की  दाल और पूरियाँ उसके सामने फेंकते हुए चाय का मग भी उड़ेल दिया ।

खान    का    अनुकरण    और    आठ–दस    लोगों    ने    किया ।

रॉड्रिक्स समझ गया कि सैनिक बेकाबू हो रहे हैं । वह जॉर्ज की सहायता से  बाहर  निकला ।  क्रोधित  दत्त,  दास,  यादव  और  अन्य  हिन्दुस्तानी  सैनिकों  की नज़रों की तीखी सुइयाँ अभी भी उसके पूरे बदन में चुभ रही थीं ।

‘यदि ये हिन्दुस्तानी सैनिक चिढ़ गए तो…’  उसके मन में विचार आया। इस विचार के आते ही उसकी नजरों के सामने घूम गए अंग्रेज़ अधिकारियों के चेहरे जो क्रान्तिकारियों के रोष की बलि चढ़ गए थे । महात्मा गाँधी,   उनके आन्दोलन…  पुलिस की गोलाबारी,  लाठीचार्ज…  और यह सब बगैर किसी हिंसात्मक प्रतिकार के सहन करने वाले सत्याग्रही…

‘इस देश में महात्माजी हैं – यह अंग्रेज़ों के लिए फायदेमन्द हैं । उनके अहिंसा के तत्वज्ञान से अधिकांश हिन्दुस्तानी प्रभावित हो गए हैं । वरना इन चिढ़े हुए हिन्दुस्तानियों ने तो अंग्रेज़ों की वो गत बनाई होती कि वे   त्राहि–त्राहि   कर उठते… ये चिढ़े हुए नौसैनिक शायद–––’’   उसके   मन   में   यह   विचार   आते   ही   वह   बेचैन हो    गया ।

‘मगर  यह  सम्भव  नहीं ।  क्या  हमने  1857  का  विद्रोह  नहीं  कुचल  दिया ? उसी   तरह   ये   भी… हाँ, यदि जनता भी सैनिकों का साथ देने लगे तो फिर…फिर असम्भव हो जाएगा–––’

जेब से रुमाल निकालकर उसने माथे से पसीना पोंछा । उसका गला सूख गया था और साँस फूल रही थी । वह जल्दी–जल्दी ऑफिसर ऑफ दि डे के दफ़्तर में घुसा । कैप मेज पर फेंक दी । गिलास में रखा पानी गटागट पी गया, कमीज  के  बटन खोलकर,    पंखा पूरे ज़ोर से चलाकर वह कुर्सी पर पसर गया। कुछ आराम महसूस हुआ ।

”May I come in, Sir?’ चीफ़ जॉर्ज दरवाजे में खड़ा था ।

”Yes, come in” उसने जॉर्ज को अन्दर बुलाया। जॉर्ज भीतर आया ।

‘‘बोल, क्या कह रहा है ।’’   अब और कौन–सी नई बात हो गई – ऐसा भाव उसके शब्दों से झलक रहा था ।

‘‘अभी  मेस  में  जो  कुछ  हुआ  वह  ठीक  नहीं  था । मेरा ख़याल है कि हम कमाण्डर किंग को सब बता दें । कल यदि इसमें से कोई और बात पैदा हुई तो हम पर दोष नहीं लगना चाहिए। फिर ‘बेस’   का वातावरण भी तो विस्फ़ोटक हो गया है ।’’    जॉर्ज ने सुझाव दिया ।

‘‘जॉर्जी, तेरी डरने की आदत अभी गई नहीं ।’’ रॉड्रिक्स हँसते हुए बोला, ‘‘मैं नहीं सोचता कि यह सब किंग को बताने   की ज़रूरत है । जो कुछ हुआ उसमें कोई ख़ास बात नहीं,   ऐसा भी  नहीं है । राशन की कमी होने के बाद से ये  वाक्–युद्ध अक्सर होने लगा है । इसमें कोई सीरियस चीज नहीं । हाँ, आज दिनभर में फिर से  ऐसा  कुछ  हो  जाए  तो  जरूर  सूचित  करेंगे ।  मैं  तो  वह  सब  भूल  गया  हूँ ।  तू भी भूल जा ।’’   उसने   जॉर्ज   को   सलाह   दी ।

जॉर्ज  समझ  गया  कि  किंग  को  यह  सब  बताना  रॉड्रिक्स  को  अपमानजनक लग रहा है; उसे यह अपनी कार्यक्षमता पर दाग जैसा प्रतीत हो रहा है ।

 

 

 

मदन और गुरु शेरसिंह से मिलने के लिए बाहर निकले थे ।

जब वे वापस आए तो दोनों ही के चेहरे उतरे हुए थे । दिल में कोई मरणांतक वेदना लिये वे लौटे थे । वे  चुपचाप    कॉट पर बैठ गए ।

‘‘क्या हुआ रे ?’’    खान ने पूछा ।

‘‘क्या कहें! अपना आधार ही खत्म हो गया!’’   मदन भावविह्वल हो रहा था ।

‘‘मतलब  क्या ?  साफ–साफ  बता  ना!’’  खान  ने  कहा,  उन्हें  इस  तरह  बैठा  देखकर  दत्त और दास भी वहाँ    आए ।

पूरा धीरज बटोरकर मदन ने कहा, ‘‘शेरसिंह को आज सुबह पकड़ लिया गया ।’’

‘‘क्या ?’’  खान ने पूछा और वहाँ भयानक चुप्पी छा गई । मानो उनके परिवार के किसी प्रिय व्यक्ति को उनसे छीन लिया गया हो ।

‘‘कैसे पकड़ा ?’’   कुछ देर बाद दत्त ने पूछा ।

‘‘हम सुबह शेरसिंह के गुप्त ठिकाने पर पहुँचे । हमेशा की तरह दूर ही से हम आहट लेने लगे । दूर पर पुलिस की गाड़ी खड़ी थी । हम सतर्क हो गए। गाड़ी से चार यूनिफॉर्म वाले और छह–सात सादे वेश में पुलिसवाले उतरे । उनमें बोस भी था…’’

‘‘हरामी साला,    अब मिलने तो दो,  दिखाता हूँ साले को…’’    दाँत–होंठ भींचते हुए दास ने कहा ।

”Cool down, Das. ये गुस्सा करने का वक्त नहीं है । यदि गुस्से में हमारे हाथ से कोई गलती हो गई तो हम सभी   मुश्किल में पड़ जाएँगे और हमारा उद्देश्य पूरा  नहीं  होगा । दत्त  ने  समझाया,  ‘‘तू  आगे  बता ।’’  उसने  बीच  ही  में  रुके  मदन से    कहा ।

‘‘हम शेरसिंह के मकान पर नजर रखे हुए दूर खड़े थे । इन्तज़ार का वह जानलेवा आधा घण्टा एक युग के समान     प्रतीत हुआ । आधे घण्टे बाद हथकड़ियाँ पहने शेरसिंह को बाहर लाया गया । उनके  साथ  उनके  चार–पाँच  साथी भी थे । उन सबको लेकर पुलिस की गाड़ी निकल गई और टूटे दिल से हम वापस लौट आए ।’’    मदन    ने    थरथराती    आवाज    में    कहा।

किसी को कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं हो रही थी । शेरसिंह की गिरफ़्तारी से सभी को आघात पहुँचा था । उन सबका आधार ही टूट गया था । उनका मार्गदर्शक सलाख़ों के पीछे चला गया था ।

‘‘शेरसिंह   की   गिरफ्तारी   हमारे   लिए   दुर्भाग्य   की   बात   है ।   जो   होना   नहीं चाहिए  था,  वही  हो  गया  है ।  दत्त  समझा  रहा  था ।  ‘अब  आगे  जो  कुछ  भी  करना है,    वह    अत्यन्त    सावधानी    से    करना    होगा’ ।’’

‘‘जो काम हमने हाथ में लिया है उसे किसी भी हालत में पूरा करना ही है,  फिर चाहे कितनी भी मुसीबतें क्यों न      आएँ । यह सच है कि शेरसिंह का मार्गदर्शन अब  हमें  मिलने  वाला  नहीं  है ।  अब  हमें  अपना  मार्ग  खुद  ही  ढूँढ़ना  होगा  और एक एक कदम फूँक–फूँककर रखना होगा । मेरा ख़याल है कि अब हम शेरसिंह की   गिरफ्तारी   के   बारे   में   भूल   जाएँ   और   आगे   की   योजना   पर   विचार   करें ।   क्योंकि आज     वाला मौका यदि हमने गँवा दिया तो फिर शायद ऐसा मौका दुबारा न मिले ।’’ खान अब सँभल गया था ।

‘‘अरे,   तुम   लोग   अब   तक   यहीं   हो ?’’   एबल   सीमन   चाँद   इन   छह   लोगों को इकट्ठा देखकर    पूछ रहा था ।

‘‘मतलब ?’  गुरु ने पूछा ।

‘‘मेरा   ख़याल   था   कि   शायद   किंग   ने   तुम   लोगों   को   उठाकर   सलाखों   के पीछे फेंक दिया होगा । अरे, ऐसा सिर्फ मुझे ही नहीं, बल्कि सीमेन मेस के हरेक को   लग   रहा   था ।’’   चाँद   कह   रहा   था,   ‘‘तुम   सब   लोग,   खासकर   यादव,   जिस तरह  से  रॉड्रिक्स  से  बात  कर  रहे  थे,  उससे  हम  समझ  रहे  थे  कि  हम  गुलाम  नहीं हैं । हमारे भी कुछ अधिकार हैं जो हमें मिलने चाहिए ।’’

‘‘आज  तक  हममें  से  अनेक  लोग  सोचते  थे,’’  चाँद  के  साथ  आया  हुआ सूरज  कह  रहा  था, ‘‘स्वतन्त्रताप्राप्ति  वगैरह  हमारा  क्षेत्र  नहीं; मगर  आज  समझ में  आ  गया  कि  स्वतन्त्रताप्राप्ति  के  लिए  हम  भी  कुछ  कर  सकते  हैं ।  अपनी  गर्दन पर पड़े हुए गुलामी के जुए को उतार फेंकना,  अपने आप स्वयं की गुलामी नष्ट करना – ये भी बड़ी सहायता हो सकती है । आज तुमने हमें दिखा दिया। अपने अधिकारों के  लिए  गर्दन  तानकर  गोरे  अधिकारियों  से  बात  कर  सकते  हैं,  इसका  एहसास करा दिया । हम तुम लोगों के साथ हैं । इससे आगे जो लड़ाई तुम लड़ोगे उसमें हमारा केवल समर्थन ही नहीं,  बल्कि  पूरी  तरह  से  सहयोग  रहेगा ।  बैरेक  में  सुबह से यही चर्चा चल रही है । उसका सारांश ही मैं आपको बता रहा था ।’’

‘‘तुम  हमारा  साथ  दोगे,  इससे  हमें  खुशी  ही  हो  रही  है,  मगर  इसके  लिए हम तुम्हारा आभार नहीं मानेंगे;  क्योंकि वर्तमान परिस्थिति में मातृभूमि की स्वतन्त्रता  के  लिए  चल  रहे  संघर्ष  में  शामिल  होना  हर  हिन्दुस्तानी  नागरिक  का कर्तव्य है । तुम अपना कर्तव्य निभाने जा रहे हो,   इसकी हमें खुशी है ।’’   दत्त ने हँसते हुए कहा ।

‘‘अपना  संघर्ष  जारी  रखते  हुए  हमें  अपने  आप  पर  काबू  रखना  होगा । गर्म दिमाग से शारीरिक हमला    करना उचित नहीं है ।’’    दत्त    ने    कहा ।

‘‘मतलब,      क्या तुम  यह कहना चाहते हो कि यदि गोरा अधिकारी हमें भिखारी कहे,   माँ–बहन की गालियाँ दे फिर   भी   हमें   खामोश   रहना   चाहिए ?’’   मुक्के   का जवाब  मुक्के  से  देने  के  सिद्धान्त  पर  विश्वास  रखने  वाला  दास  जोश  में  कह  रहा था,   ‘‘हमने   अपने   हाथों   में   चूड़ियाँ   नहीं   पहनी   हैं । र्इंट का जवाब पत्थर से ही देना    होगा!’’

‘‘मेरा   ख़याल   है   कि   हमें   शान्त   ही   रहना   चाहिए ।’’   मदन   ने   बड़े   सुकून से    कहा ।

‘‘आज की बदली हुई परिस्थिति में यदि कांग्रेस और सामान्य जनता का समर्थन प्राप्त करना हो तो हमें अहिंसा के     मार्ग से ही जाना चाहिए । तभी महात्माजी के    विचारों    से    प्रभावित    जनता    हमारा    साथ    देगी ।’’

‘‘बल प्रयोग किसी भी प्रश्न का समाधान नहीं हो सकता ।’’    खान ने सहमत होते  हुए  कहा ।  ‘‘हमारा  विरोध  नीतियों  से  है,  प्रवृत्ति  से  है,  व्यक्तियों  से  नहीं । किंग   अथवा   रॉड्रिक्स   की   विजेता   के   रूप   में   जो   प्रवृत्ति   है,   उस   प्रवृत्ति   का   हम विरोध  करते  हैं ।  प्रवृत्ति  को  हिंसात्मक  मार्ग  से  नष्ट  नहीं  किया  जा  सकता,  बल्कि इससे   वे   और   प्रबल   हो   जाती   हैं ।   हमारा   उद्देश्य   है   नौसेना   पर   कब्जा   करके   अंग्रेज़ों के पंख काटना । हम उनसे कहने वाले हैं कि हमारा देश छोड़कर चलते बनो!’’

गरम खून वाले दास को यह मंजूर ही नहीं था । ‘‘हम सैनिक हैं । हमें बन्दूक चलाना सिखाया गया है; चुपचाप लाठियाँ और गोलियाँ खाना नहीं ।’’

दास  के  ये  विचार  प्रतिनिधिक  थे ।  अनेक  लोग  सशस्त्र  क्रान्ति  के  पक्ष  में थे ।

‘‘हम पर आक्रमण हो,  फिर भी हम खामोश रहें,    यह बात ठीक नहीं लगती, ‘’ यादव   ने   कहा ।

‘‘मेरा   ख़याल   है   कि   हम   इस   चर्चा   को   यहीं   रोक   दें ।’’   दत्त   के   मन   में   सन्देह के बादल  उठ  रहे  थे । ‘आन्दोलन  का  मार्ग  कौन–सा  होना  चाहिए,  इसी  बात  को लेकर यदि आरम्भ में ही दो गुट बन गए तो सब कुछ…  ये गुटबाजी टालनी होगी । हमें एकजुट रहना होगा,    वरना…।’

‘‘तुम  लोगों  के  विचार  सही  हैं ।’’  दत्त  ने  दास  और  यादव  के  विचारों  से सहमति दर्शाई । ‘‘हम   सैनिक हैं । हमने शस्त्रास्त्र चलाना सीखा है । शस्त्र चलाने के भी कुछ नियम हैं । मेरा ख़याल है कि पहला आक्रमण हमारी संस्कृति का अंग नहीं है,’’    दत्त    समझा    रहा    था ।

‘‘आज   सभी   के   मन   में   विद्रोह   की   आग   सुलग   रही   है ।   उसके   दावानल बनने  के लिए  कोई  एक  छोटी–सी  घटना  भी  पर्याप्त  होगी ।  हम  पहले  ऐसी  किसी घटना पर विचार करें । एक बात   याद   रखो,   यदि   सबको   साथ   लेकर   चलना है तो कहीं न कहीं समझौता करना ही पड़ेगा ।’’

‘‘दत्त  सही  कह  रहा  है ।  हम  प्रसंगानुसार  अपना  मार्ग  निश्चित  करेंगे ।  मगर तब तक हम पूरी तरह अहिंसात्मक मार्ग से ही चलेंगे और एकता बनाए रखेंगे ।’’ खान ने धीरज रखने का सुझाव देकर समझौते का प्रस्ताव रखा ।

‘‘ये एकदम मंज़ूर!’’    दास और यादव ने मान लिया ।

‘‘चाँद  और  सूरज  ही  की  तरह  मुझे  भी  यही  लग  रहा  था  कि  हमें  या  तो गिरफ़्तार  कर  लिया जाएगा,  या  कम  से  कम  गार्ड  रूम  में  तो  बुलाया  ही  जाएगा । मगर वैसा भी नहीं हुआ । या तो हमें मिल रहे समर्थन को देखकर रॉड्रिक्स हक्का–बक्का रह गया; या फिर हमें अनदेखा करके मिटा देने का उसने निश्चय किया है । इस परिस्थिति   का   लाभ   उठाते   हुए   हमें   दूसरा   वार   करना   चाहिए ।’’   गुरु   ने   कहा ।

‘‘मतलब,    करना क्या होगा ?’’    यादव ने पूछा ।

‘‘पहले   खाना   खा   लेते   हैं ।   एक   बज   चुका   है ।   भूखे   पेट   कुछ   सूझेगा   भी नहीं ।’’  दास  को  जोर  की  भूख  लगी  थी ।  दास  का  सुझाव  सबको  पसन्द  आ  गया और वे मेस की ओर चल पड़े । मेस में हमेशा ही की तरह गड़बड़ और शोरगुल था ।

‘‘अरे, चीफ सा’ब और थोड़े चावल दे दो ।’’ सुजान ड्यूटी कुक की दाढ़ी को सहलाते हुए विनती कर रहा था ।

‘‘अरे भाई,  ज़्यादा चावल कहाँ से लाऊँ । जो कुछ मिलता है,  जैसा मिलता है,   वैसा ही पकाकर परोसते हैं ।’’   कुक   जी–तोड़   कर   कह   रहा   था ।   गुरु,   दत्त, खान,  मदन,  दास,  यादव  और  उनके  साथ  आए  हुए  सैनिकों  ने  खाना  लिया  और हमेशा की तरह अलग–अलग टेबल पर बैठ गए ।

‘‘अरे,  प्लेट  के  चारों  ओर  ये  क्या  रंगोली  बना  रखी  है ?’’  खान  ने  सामने बैठे कृष्णन से पूछा ।

‘‘अरे बाबा,    ये रंगोली नहीं,   आज के खाने में मिले विभिन्न प्रकार के सजीव–निर्जीव पदार्थ हैं । ये देख,    यहाँ चावल से निकले पाँच तरह के,    अलग–अलग तरह के कंकड़ हैं; ये चार–पाँच काले कीड़े हैं; बीच में यह पीला टुकड़ा   इल्ली का है । यह जो टहनी दिखाई दे रही है, वह साँबार नामक पदार्थ से ‘ऑल इन वन  कढ़ीपत्ते  की’  है ।  सारे  मसाले  इसी  एक  पत्ते  में  होते  हैं,  ऐसा  गोरों  का  ख़याल है;   साँबार  से  मिले  ये  छह  दाल  के  दाने मतलब  मुझे  मिला  हुआ  इनाम  ही  है––– ।’’

‘‘बहुत खूब! साले,   दवाख़ाने में चपरासी बनने के बदले तुझे लेखक ही बनना चाहिए था!’’    खान उसकी पीठ थपथपाते हुए बोला ।

‘‘अरे, वास्तविकता को भूलने के लिए किया गया यह मज़ाक है । अधूरा और  गन्दा  खाना  कितने  दिनों  तक  खाएँगे ?  पेट  की  भूख  कितने  दिनों  तक  मारते रहेंगे ?    देखना,    सभी    को    यही    सवाल    सता    रहा    है ।    सभी    बेचैन    हैं ।’’

कृष्णन का दबा हुआ दुख उफनकर बाहर आ गया। खान ने पूरी मेस में नज़र दौड़ाई । मेस की बेचैनी महसूस हो रही थी ।

‘यदि एक और धक्का दिया जाए तो विद्रोह का जहाज़ पानी में धकेल दिया  जाएगा  और  फिर  आजादी  का  किनारा  दूर  नहीं ।’  खान  के  मन  में  ख़याल आया । ‘पर करना क्या होगा ?’ उसने अपने आप से सवाल पूछा और बेचैन हो गया । दो टेबल छोड़कर बैठे गुरु के मन में एक विचार रेंग गया और वह सम्मोहित–सा उठकर खड़ा     हो गया । सबको सुनाई दे ऐसी ऊँची आवाज़ में चिल्लाया,  ”Silence please! Silence please! Friends, listen to me.” मेस में खामोशी छा गई । सबका ध्यान गुरु की ओर खिंच गया । सब यह जानने के लिए  उत्सुक  थे  कि  वह  क्या  कह  रहा  है ।  कुछ  लोग  अपनी–अपनी  थालियाँ  लेकर खड़े हो गए,    तो कुछ लोग उठकर उसके पास    गए ।

‘‘दोस्तो!,   सुबह   हमें   दिया   गया   नाश्ता   और   अब   यह   दोपहर   का   भोजन इन्सानों  के  खाने  लायक  नहीं  है ।  हमने  आज  तक  अलग–अलग  तरह  से  अपनी शिकायतें   दर्ज   करवाईं,   मगर   उनकी   दखल   किसी   ने   नहीं   ली,   इसलिए   मैं   इसी क्षण    से    इस    खाने    का    बहिष्कार    करता    हूँ ।’’

गुरु ने अपनी प्लेट उठाई और उसे डस्टबिन में खाली कर दिया । गुरु के मेस से बाहर जाते ही मेस में भयानक खामोशी छा  गई ।  गुरु  के  खड़े  होने  से पहले का कोलाहल रुक गया था । दत्त और खान के अन्त:चक्षुओं    को इस खामोशी में छिपे तूफान का एहसास हो गया । वे दोनों नि:शब्द बैठे थे । मेस की यह खामोशी दो–चार    मिनट ही रही ।

‘‘मैं  गुरु  की  राय  से  पूरी  तरह  सहमत  हूँ ।  उसकी  इस  कृति  में  सहभागी होकर उसका साथ देने के लिए मैं भी खाने का बहिष्कार करता हूँ ।’’ ‘तलवार’ पर  हाल  ही  में  आए  परमेश्वरन्  ने  कहा  और  वह  भी  मेस से बाहर निकल  गया ।

‘‘दो,  तीन,  चार–––’’  दत्त  और  खान  बहिष्कार  जाहिर  करके  मेस  से  बाहर निकलने वाले सैनिकों की संख्या    गिन रहे थे ।

‘‘बीस लोग खाना फेंककर उठ गए ।’’    दत्त ने अन्तिम संख्या बताई ।

‘‘तुमने ध्यान दिया ही होगा कि इन बीस लोगों में एक भी आज़ाद हिन्दुस्तानी सैनिक नहीं था ।’’    खान    ने    कहा ।

‘‘गुरु  को  यह  कैसे  सूझा  क्या  पता!  मगर  उसकी  इस  हरकत  से  वातावरण को  गर्म  करने  में  बड़ी  मदद  मिली  है ।’’  दत्त  ने  खुले  दिल  से  गुरु  की  सफलता की    सराहना    की ।

 

Share with:


0 0 votes
Article Rating

Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments

Recent Comments

Random Posts

Placeholder Image 90

Thewriterfriends.com is an experiment to bring the creative people together on one platform. It is a free platform for creativity. While there are hundreds, perhaps thousands of platforms that provide space for expression around the world, the feeling of being a part of fraternity is often lacking. If you have a creative urge, then this is the right place for you. You are welcome here to be one of us.

Random Posts

Falling In Love

By Rcay | July 8, 2020 | 2 Comments

   Falling In Love March came with its charms In the form of your photo While July gave us the first sight August made us longing   But we had to wait for September To make our First Night Tired we were by the rituals Yet we did not sleep in the night   As…

Share with:


Read More

The Presidential transition

By Prasad Ganti | January 21, 2021 | 6 Comments

A new President has been inaugurated in Washington. The incumbent left grudgingly after creating chaos and pandemonium. Back in 1796, when George Washington transferred power to John Adams, it was the first time in the history of the world that a peaceful transition of power had occurred to another elected representative. Over the course of…

Share with:


Read More

A Hare And A Tortoise Story- Retold

By Navneet Bakshi | October 17, 2020 | 8 Comments

I got this story through Whatsapp forward, re-written by someone with a changed paradigm . We all have heard this story in it’s original form. This is one of those early stories that every child hears from his parent or a grandparent. And then when he grows up and graduates from the very first stage…

Share with:


Read More

The pandemic politics

By Prasad Ganti | April 3, 2021 | 2 Comments

People are being vaccinated against the Covid 19 virus  in some parts of the world. More in some countries while less in some others. While there is a resurgence of cases in India, things are getting better in the UK and the US. Most of the people are vaccinated in the UAE and Israel, not…

Share with:


Read More

Memoir of a Gulmohar tree

By Yash Chhabra | September 8, 2020 | 3 Comments

The most awaited month has arrived May, the month of vibrant colors It brings a wave of crimson spread My branches shine in vibrant colors Dancing to the tune of a mild breeze The Garden looks deserted in the crowd The garden appears deserted to me No one to appreciate my blossom No one caresses,…

Share with:


Read More

शरद पूर्णिमा

By Alka Kansra | October 31, 2020 | 2 Comments

Happy Sharad Purnima. शरद पूर्णिमा शरद पूर्णिमा की रात लक्ष्मी जन्म की रात आसमान में पूरा चाँद सोलह कला सम्पूर्ण चाँद धरती को स्पर्श करता चाँद अमृत बरसाता मंद मंद मुसकाता चाँद तभी तो कृष्ण ने रचाया राधा संग महारास Alka Kansra Share with: 5 1 vote Article Rating

Share with:


Read More

KARNATAKA BUNDH (Monday Sept 28)

By Suresh Rao | September 27, 2020 | 7 Comments

Police in the city and across the state have taken steps to maintain law and order during the Karnataka bandh on Monday called by farmers, labour unions, and various rights organisations. Talking to the press, Bengaluru Police Commissioner Kamal Pant has warned strict action against those participating in the bandh. “No one approached us for…

Share with:


Read More

Indian Army captures dominant heights along the LAC

By Suresh Rao | September 2, 2020 | 7 Comments

(pic) Indian forces have captured Pangong North Finger 4 Ridgeline along the Line of Actual Control (LAC) in Ladakh For the first time since early June, Indian Army and Special Frontier Force (SFF) mounted rapid mission to take position at Finger 4 heights in Ladakh, BusinessToday.In of  September 2, 2020 reports. The Finger 4 feature…

Share with:


Read More

Decoding The Crimson Island

By Charumati Ramdas | July 31, 2020 | 2 Comments

Decoding M.Bulgakov’s The Crimson Island A.Charumati Ramdas The Crimson Island, written by the author of Master and Margarita, remains one of the most mysterious plays of world. Looking quite innocent on the surface, the play, which saw the stage just for one theatrical season, only in Moscow, was first published as a satirical sketch on 20th April 1924 in…

Share with:


Read More

Left hand does not know what the right hand does… PMO, Ministry, RTI reponses are all different!

By Suresh Rao | October 29, 2020 | 1 Comment

I cannot understand why the central ministries and PM’s office cannot give the correct numbers and/or information on Covid committment by INDIA to other countries, including China to which assistance was given using an air force jet,  to deliver the aid to China at Wuhan! It is time PM/PMO consulted ministries before issuing public statements! …

Share with:


Read More
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x