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वड़वानल – 18

लेखक: राजगुरू द. आगरकर

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

 

‘तलवार’    पर 1 दिसम्बर की ज़ोरदार तैयारियाँ चल रही थीं । बेस की सभी इमारतों को   पेंट   किया   गया   था ।   बेस   के   रास्ते,   परेड   ग्राउण्ड   रोज   पानी   से   धोए   जाते थे ।   रास्ते   के   किनारे   पर   मार्गदर्शक   चिह्नों   वाले   बोर्ड   लग   गए   थे ।   परेड   ग्राउण्ड पर   कवायद   के   लिए   विभिन्न   प्रकार   के   निशान   ऑयल   पेंट   से   बनाए   गए   थे । झण्डे वाला मास्ट और उसके नीचे वाला     चार फुट ऊँचा, तीस बाई तीस का विशाल चबूतरा  आईने  की  तरह  चमक  रहा  था ।  सैल्यूटिंग  डायस  की पीतल  की  जंज़ीर ब्रासो लगाकर रोज चमकाई जाती थीं । जैसे–जैसे 1 दिसम्बर निकट आ रहा था, ‘तलवार’    पर    गहमा–गहमी    बढ़ती    जा    रही    थी ।

‘‘लेफ्टिनेंट      कमाण्डर      स्नो, पूरी तैयारी हो गई ?’’  30 नवंबर को कोल ‘तलवार’ के फर्स्ट लेफ्टिनेंट से पूछ रहा था । मुझे लोगों को और खासकर ‘अब आज़ादी दूर नहीं,  हम दो सालों में आजादी प्राप्त करेंगे और वह भी अंग्रेज़ों की मेहरबानी  से  नहीं  बल्कि  हमारे  हक  के  रूप  में’  इस  तरह  की  बकवास  करने  वाले नेहरू,   पटेल   जैसे   कांग्रेस   के   नेताओं   को   दिखाना   है   कि   हिन्दुस्तानी   सैनिक   एकजुट होकर सरकार के पीछे खड़े हैं, वे ‘आज़ादी’ और ‘आन्दोलन’ इन शब्दों को भी नहीं    जानते ।’’

‘‘मुझे  ताज्जुब  होता  है, सर,  नेहरू,  पटेल  किसके  भरोसे  आज़ादी  के  ख्वाब देख   रहे   हैं?  हमें   यह   देश   छोड़ना   पड़ेगा, यह   बात   सच   भी   हो, तो   अभी   नहीं छोड़ना है और जब तक हिन्दुस्तानी सैनिक और पुलिस हमारे प्रति ईमानदार हैं. तब    तक    तो    बिलकुल    भी    नहीं ।’’

‘‘मेरा   ख़याल   है   कि   कांग्रेस   के   नेता   यह   सोच   रहे   हैं   कि   आज़ाद   हिन्द सेना  के  सैनिकों  का  उपयोग  करके  आज़ादी  प्राप्त  की  जा  सकेगी ।  शायद  उनका यह भी अनुमान हो कि आज़ाद हिन्द सैनिकों का साथ देने के लिए हिन्दुस्तानी सैनिक    आगे    आएँगे ।’’    कोल    ने    अपना    अनुमान    स्पष्ट    किया ।

‘‘मगर,  सर,  आज़ाद हिन्द सेना के अधिकांश सैनिक मजबूरी में सुभाषचन्द्र का   साथ   दे   रहे   हैं ।   जर्मनी   ने   युद्ध   कैदी   बनाकर   उनके   साथ   जैसा   क्रूरता   का व्यवहार  किया,  उससे  बचने  के  लिए  वे  अंग्रेज़ों  के  विरुद्ध  लड़ने  के  लिए  तैयार हुए   हैं ।   कुछ–कुछ   लोगों   को   तो   हाथ   में   बन्दूक   देकर   सख़्ती से   हमारे   खिलाफ खड़ा   किया   गया   और   मजबूरी   में   उन्हें   अंग्रेज़ों   के   विरुद्ध   लड़ना   ही   पड़ा ।   ऐसे दिखावटी   सैनिकों   पर   विश्वास   करके   यदि   पटेल   और   नेहरू   ख्वाब   देख   रहे   हों तो   देखते   रहें ।   मेरा   ख़याल   है   कि   उसका   कोई   असर   ब्रिटिश   हुकूमत   पर   होने वाला    नहीं    है ।’’    स्नो    ने    अपना    विचार    व्यक्त    किया ।

”Forget about it, मुझे   सैनिकों   की   कोई   झंझट   नहीं   चाहिए ।   साथ   ही ‘तलवार’       को       देखने आने वाले नगारिकों को भी कोई झंझट नहीं चाहिए । Maintain Strict discipline किसी भी सिविलियन को   सैनिकों  के  सम्पर्क  में न  आने  देना. उन्हें  एक  निश्चित  मार्ग  से  ही  जाने–आने  दो – कोल  ने  सूचनाएँ  दीं ।

मगर    रात    के    गर्भ    में    क्या    छिपा    हुआ    है    ये    न    तो    कोल    को    मालूम    था और    न    ही    स्नो    को ।

 

 

 

जब पौ फटी तो मास्ट पर अधजला यूनियन जैक था । हवा न चलने के कारण वह सिमट गया । झण्डा ऐसा लग रहा था, मानो सिर झुकाए खड़ा हो । यूनियन जैक   की   दायीं   ओर   वाली   रस्सी पर एक   फूटी   हुई   बाल्टी   में   झाडू   और   पोंछने   का कपड़ा    रखकर    उसे    यूनियन    जैक    से    एक    फुट    ऊँचाई    पर    ले    जाया    गया    था ।    सैनिक मानो  यह  सूचित  करना  चाहते  थे  कि  उनकी  नजर  में  यूनियन  जैक  की  कीमत झाडू–बाल्टी  जितनी  ही  है ।  सैल्यूटिंग  डायस  और  परेड  ग्राउण्ड  पर  हर  जगह  ”Quit India’, ‘Revolt Now,’ ‘Down with Imperialism’ आदि  जैसे  नारे बड़े–बड़े अक्षरों में लिखे थे । एक रात में यह सब कैसे हो गया इसका अन्दाज़ा कोई    भी    लगा    नहीं    पा    रहा    था ।

सुबह  की  सैर  को  निकले  अधिकारियों  ने  इस  परिवर्तन  को  देखा  और  वे अवाक्   रह   गए ।   बाहर   चल   रहा   स्वतन्त्रता   आन्दोलन   ‘तलवार’   के   भीतर   भी   पहुँच चुका   है   इस   पर   वे   अभी   भी   विश्वास   नहीं   कर   रहे   थे ।   उनमें   से   किसी   ने   ऑफिसर ऑफ  दे  डे  सब  लेफ्टिनेंट  डेनियल  से  सम्पर्क  स्थापित  किया ।  किसी  और  ने  कोल का फोन नम्बर घुमाया । कोल ने आधी नींद में फोन उठाया । पूरी बात सुनकर उसकी    नींद    रफूचक्कर    हो    गर्ई ।

कोल   जल्दी–जल्दी   में   नाइट   ड्रेस   में   ही   परेड   ग्राउण्ड   पर   आया ।   परेड   ग्राउण्ड का    दृश्य    देखकर    वह    बेचैन    हो    गया ।

‘‘इन bloody bastard Indians को सबक सिखाना ही होगा!’’     वह अपने आप से पुटपुटाया । ”What the hell you are looking at my face?” सामने खड़े   डेनियल   पर   वह   चिल्लाया । ”where is Lt. Commander Snow? Come on, send for him. I want him here within no time.”

कोल    की    नजर    मास्ट    की    ओर    गई ।    यूनियन    जैक    की    बगल    में    बाल्टी, और वह भी एक फुट ज्यादा ऊँचाई पर ‘झण्डे का ऐसा अपमान!’ उसके भीतर का देशभक्त अंग्रेज़ जाग उठा ।    ‘‘डेनियल’’ – वह    चिल्लाया ।

करीब    पच्चीस    बरस    का    डेनियल    दौड़कर    आगे    आया, ”Yes, Sir.’

‘‘देख   रहे   हो   अधजला   यूनियन   जैक ?   भड़वे,   फिर   उसे   नीचे   कौन   उतारेगा ? तेरा  बाप ?  अरे,  राष्ट्र  ध्वज  की  प्रतिष्ठा  की  खातिर  अपनी  जान  की  बाजी  लगाने वालों  का  गोबर  खा!  मेरे  मुँह  की  तरफ  क्या  देख  रहे  हो ?  जाओ,  सम्मानपूर्वक उस ध्वज को नीचे उतारो!’’ डेनियल मास्ट की ओर दौड़ा उसने रस्सियाँ खोली और    अपमानित    यूनियन    जैक    को    नीचे    उतारने    लगा ।

बेचैन   कोल   अपने  ध्वज   को सम्मानपूर्वक   सैल्यूट   करते   हुए   मन   ही   मन   क्षमा याचना    कर    रहा    था ।

ढाई  घण्टे  बाद,  अर्थात्  आठ  बजे  से  मुम्बई  के  नागरिक  आने  लगेंगे ।  अगर उन्होंने यह सब देख    लिया    तो ?    कोल    के    दिल    की    धड़कन    मानो    रुक    गई ।

‘‘अगर   हेडक्वार्टर   या   वरिष्ठ   अधिकारियों   तक   यह   बात   पहुँच   गई   तो…अगला प्रमोशन…    आज    तक    हासिल    की    गई    प्रतिष्ठा    और    नाम…’’

और   वह   चिल्लाया,   ”Where is Snow?”  ले.  कमाण्डर स्नो आगे बढ़ा ।

‘‘कल   तुमसे   कहा   था । तू क्या   हजामत   बना   रहा   था ?   इतनी   सारी   रामायण हो   गई… ।’’

”Cool down, Sir!” गुस्साया   हुआ   स्नो   शान्त   रहने   की   कोशिश   करते   हुए समझा रहा था ।

‘‘आठ    के    अन्दर    यह    सब    साफ    हो    जाना    चाहिए ।

‘Yes, Sir!” स्नो ने जवाब दिया ।

”Hands Call, Hands call, Clear lower decks, Fallin on the parade Ground.” क्वार्टर    मास्टर    बार–बार    घोषणा    कर    रहा    था ।

‘तलवार’    के    सारे    सैनिक    परेड    ग्राउण्ड    पर    इकट्ठे    हो    गए । किसी को भी पता नहीं था कि समय से पहले उठाकर उन्हें इकट्ठा क्यों किया गया है ?  बैरेक से आते हुए उन्होंने चारों ओर लिखे नारों को देखा, परेड ग्राउण्ड   पर   लिखे   नारे   पढ़े   और   उनके   मन   में   एक   ही   सवाल   उठा,   ‘‘ये   नारे   किसने लिखे  होंगे ?’’  अनेक  सैनिकों  के  मन  में  नारे  लिखने  वालों  के  प्रति  आश्चर्ययुक्त आदर    की    भावना    जाग    उठी ।

काम   का   बँटवारा   हुआ ।   सैनिकों   के   गुट   बनाकर   उन्हें   विभिन्न   अधिकारियों के  पास  भेजा  गया  और  ‘तलवार’  की  साफ–सफाई  करने  का,  सैनिकों  के  दिलों में    पनप    रहे    देशप्रेम    के    पौधे    को    उखाड़    फेंकने    का    काम    आरम्भ    हुआ ।    मगर    अंग्रेज़ अधिकारियों  को  इस  बात  की  कल्पना  नहीं  थी  कि  उनकी  इसी  हरकत  की  वजह  से   वह   पौधा   जड़   पकड़कर   उत्साहपूर्वक   बढ़ेगा ।   कोल   काफी   बेचैन   था ।   उसने अपनी  निगरानी  में  पूरी  बेस  की,  विशेषत:  परेड  ग्राउण्ड  की  सफ़ाई  करवाने  का निश्चय    किया    और    वह    परेड    ग्राउण्ड    पर    पहुँचा ।

”Come on, Scrub it properly, Wash of that bloody India.” इण्डिया  इस  शब्द  पर  थूकते  हुए  वह  चीखा,  ‘‘साला,  मेरे  देश  पर  थूकता  है  क्या ? साले  की  आँतें ही  बाहर  निकालता  हूँ ।’’  गुस्साया  हुआ  मदन  मुट्ठियाँ  तानते  हुए पुटपुटाया  और  आगे  बढ़ा ।  दत्त  ने  उसे  पीछे  खींचते  हुए  समझाया,  ‘‘भावनावश मत हो,   अभी हमें लम्बी दूरी पार करनी है ।’’

‘You, bloody cowards, black pigs, if yon have guts write all this nonsense in front of me and I shall teach you a good lesson!” कोल   का   चिल्लाना   जारी   था । ‘‘मस्ती चढ़   रही   है   सालों   पर,   तुम्हारी   मस्ती   मैं   उतारूँगा ।   ‘तलवार’   में   घुस   आए   इस क्रान्तिकारी  को  मैं  ढूँढ  निकालूँगा  और  आज  मैं  तुम्हें  बताए  देता  हूँ  कि  जैसे  ही वह   मुझे   मिलेगा,   मैं   उसे   चीर   के   रख   दूँगा! By God, I shall not spare him.” कोल   चिल्ला–चोट   मचा   रहा   था ।   बीच–बीच   में   अधिकारियों   की   भी   खबर   ले   लेता ।

करीब   पौने   आठ   बजे   कोल   ने   बेस   का   राउण्ड   लगाया   और   एक–एक   दीवार का,  दीवार  के  एक–एक  कोने  का  मुआयना  किया ।  इस  बात  का  इत्मीनान  कर लिया कि कहीं भी कुछ भी लिखा हुआ नहीं है, सब कुछ साफ हो गया है और वह घर वापस आया ।

आठ  के  घण्टे  और ‘Long live the king’  की  ताल  पर  शाही  ठाठ  में, धीमी गति से रॉयल नेवल एनसाइन मास्ट पर फहराने लगा । ‘तलवार’ पर सब कुछ ठीक है यह ज़ाहिर करने में अंग्रेज़ अधिकारी   कामयाब   हो गए   थे; मगर कोल बेहद बेचैन हो गया था । ‘तलवार’     का प्रमुख होने के कारण इन सारी घटनाओं का ज़िम्मेदार उसी को    बनाया    जाने    वाला    था ।

कोल     अस्वस्थ     मन     से     अपने     चेम्बर     में     बैठा     था ।     पिछले     महीने     भर     को     घटनाएँ फिल्म  की  रील  की  तरह  उसकी  नजरों  के  सामने  से  गुजर  रही  थीं ।  सब  लेफ्टिनेंट रामदास के पास पर्चे मिले,      इसके      करीब      आठ–दस      दिन      बाद      आर.के.     का   अहिंसात्मक संघर्ष   और   फिर   आज   की   घटना ।   ‘यह   सब   मेरे   कैरियर   को   बरबाद   कर   देगा और  प्रमोशन  पर  भी  असर  डालेगा,  इसमें  कोई  शक  नहीं ।’  इस  ख़याल  से  यह बेचैन हो गया ।   उसे   अपने   आप   पर   ही   गुस्सा   आया ।   उसने   पाइप   सुलगाया ।

दो   गहरे–गहरे   कश   लगाकर   सीने   में   धुआँ   भर   लिया   और   संयमपूर्वक   धीरे–धीरे  उसे   बाहर   छोड़ा,   मगर   मन   की   बेचैनी   कम   न   हुई ।   अपने   आप   पर   वह   गुस्सा हो गया ।

‘‘मुझे  हर  घटना  को  गम्भीरता  से  लेकर  कड़ी  कार्रवाई  करनी  चाहिए  थी ।’’ वह    अपने    आप    से    बड़बड़ाया ।

‘‘इन  सारी  घटनाओं  के  पीछे  बड़ा  अनुशासनयुक्त  नियोजन  है ।’’  वह  सोच रहा था,      ‘‘कौन कर सकता      है यह नियोजन ?  कोई भूमिगत क्रान्तिकारी या ‘रिवोल्यूशनरी  पार्टी’  जैसा  कोई  संगठन…’’  सोच–सोचकर  दिमाग  चकराने  लगा, मगर    कोई    सुराग    नहीं    मिल    रहा    था ।

‘‘इसके   पीछे   कौन है,   यह   ढूँढ़ने   के   लिए   मैं   आकाश–पाताल   एक   कर   दूँगा । अपराधियों को    कड़ी    सज़ा    दूँगा ।’’    वह    स्वयं    से    पुटपुटाया ।

पूरे  दिन  बेस  में  घूमता  रहूँगा  और  कुछ  और  नहीं  होने  दूँगा  यह  निश्चय करके    वह    अपने    चेम्बर    से    बाहर    निकला ।

Courtsey: storymirror.com

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Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.
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