Sign Up    /    Login

वड़वानल – 16

लेखक: राजगुरु द. आगरकर

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

 

 

आर.  के.     सुबह      6–30      की      फॉलिन      पर      गया      नहीं ।      दोपहर      12      से      4      उसकी कम्युनिकेशन  सेंटर  में  ड्यूटी  थी ।  चाहे  फॉलिन  पर  आर.  के.  की  गैरहाजिरी  को किसी  ने  अनदेखा  कर  दिया  हो,  मगर  कम्युनिकेशन  सेन्टर  में  उसकी  गैरहाजिरी को चीफ टेल ने ‘नोट’ कर लिया और आर. के. को फौरन कम्युनिकेशन सेन्टर में बुलाया गया । उसने निश्चय कर लिया था कि चीफ के किसी भी सवाल का जवाब      नहीं      देगा ।      वह      चीफ      से      एक      ही      बात      कह      रहा      था,      ‘‘मुझे      सीनियर कम्युनिकेशन     ऑफिसर     के     सामने     खड़ा     करो ।     मैं     तुम्हारे     किसी     भी     सवाल     का     जवाब नहीं    दूँगा ।’’

गोरा    चीफ    गुस्से    से    लाल    हो    गया ।

”Bastard, I will see that you get maximum Punishment.”

”Chief, Please, don’t use bad language,” आर. के. शान्ति से कह रहा    था ।

चीफ    ने    गुस्से    से    तिलमिलाते    हुए    सीनियर    कम्युनिकेशन    ऑफिसर    को    रिपोर्ट कर  दी  और  उसका  गुस्सा  एकदम  चढ़  गया ।  ‘‘एक  काला  नेटिव  इतना  मगरूर हो  सकता  है ?  ड्यूटी  पर  न  आकर  बैरेक  में  बैठा  रहता  है  और  ऊपर  से  अकड कर    कहता    है    कि    मुझे    एस.सी.ओ.    से    मिलना    है!’’

”Where’s that bloody son of a bitch?” वह   चीखा ।

‘‘आप    जैसे    सीनियर    अधिकारी    के    मुँह    से    ऐसे    शब्द    शोभा    नहीं    देते!’’

आर.    के.    इत्मीनान    से    अन्दर    आया ।

सीनियर    कम्युनिकेशन    ऑफिसर    के    गुस्से    में    मानो    तेल    पड़    गया ।

‘‘तू  अपने  आप  को  समझता  क्या  है ?  यह  क्या  तेरे  बाप  के  घर  की  नौकरी है  जो  तू  मनमानी कर  लेगा ?  तुम  काले,  मस्त  हो  रहे  हो । But don’t forget I Know the ways and means to f**** you bastards!” आर.   के.   शान्त    रहा ।    उसने    एक    ख़त    उसके    सामने    फेंका ।

”what’s this?”

“Please read it and forward it.”

एस.सी.ओ.    ने    गुस्से    में    ही    ख़त    उठाया    और    पढ़ने    लगा:

”To

Commanding Officer

HMIS. Talwar

Mumbai.

महोदय,

हिन्दुस्तान  में  आज  जिस  सरकार  का  अस्तित्व  है  उसे  हिन्दुस्तानी  लोगों  का समर्थन  नहीं  है ।  यह  भी  सत्य  है  कि  यह  सरकार  हिन्दुस्तानी  लोगों  द्वारा  मान्य और  उनके  द्वारा  बनाए  गए  कानून  के  अनुसार  नहीं  बनी  है ।  इसके  फलस्वरूप इस    सरकार    को    सत्ता    पर    बने    रहने    का    कोई    भी    नैतिक    अधिकार    नहीं    है ।

यह    सरकार    वैधता    की    दृष्टि    से    तो    अधूरी    है    ही,    साथ    ही    कर्तव्य    पूर्ति के मामले में भी अधूरी है । यदि बंगाल के अकाल में मौत के मुँह में समा गए लोगों  की,  सन्  1942  के  आन्दोलन  में  मारे  गए  लोगों  की  और  बिना  कारण  जेल में  ठूँसे  गए  अनगिनत  देशभक्तों  की  संख्या  पर  गौर  किया  जाए  तो  यही  प्रतीत होगा   कि   सरकार   अपने   कर्तव्य   का   पालन   नहीं   कर   रही   है ।   इस   नालायक   सरकार के    कार्यकाल    में    पूरा    देश    ही    एक    जेल    बन    गया है । आज लोगों  की गरीबी बढ़ रही है। उनके    दुख    बढ़    रहे    हैं,    जातीय    दंगों    की    तो    कोई    गिनती    ही    नहीं ।    इस    परिस्थिति को  सींचने  के  अलावा  यह  सरकार  और  क्या  कर  रही  है ?  इस  देश  को  दयनीय स्थिति   में   लाने   वाली   सरकार   को   सत्ता   पर   बने   रहने   का   कोई   अधिकार   नहीं ।

इस सरकार के लिए यही उचित है कि सत्ता के सभी सूत्रों को महात्माजी एवं    अन्य    नेताओं    के    हाथों    सौंपकर    यह    देश    छोड़कर    निकल    जाए ।

वर्तमान  सरकार  को  मैं  नहीं  मानता ।  इसीलिए  इस  सरकार  की  आज्ञाओं का    पालन    करने    से    मैं    इनकार    करता    हूँ ।

जय    हिन्द!

आर.के.   सिंह ।’’

एस.सी.ओ.     की     नजरों     में     आग     भड़क     रही     थी ।     उसने     एक  कदम आगे बढ़कर आर.  के.    की    कनपटी    पर    एक    ज़ोरदार    झापड़    कस    दिया ।

‘‘लूत   भरे   काले   कुत्ते,   तू   अपने   आप   को   समझता   क्या   है ?   साम्राज्य   को चुनौती ?’’

लड़खड़ाते  आर.  के. ने  स्वयं  को  सँभाला ।  एस.सी.ओ.  की  आँखों  में  आँखें डालते   हुए   उसने   शान्तिपूर्वक   कहा,    ”You forward this letter to Kohl.”

लेफ्टिनेन्ट   कमाण्डर   कोल   को   जब   उसने   सिर्फ   ‘कोल   कहकर   सम्बोधित किया,  तो  एस.सी.ओ. के  गुस्से  का  पारा  और  भी  चढ़  गया ।  गुस्से  से  मुट्ठियाँ भींचते हुए उसने आर. के. के पेट में मुक्के मारना आरम्भ किया । दो–चार घूँसों में  आर.  के.  नीचे  गिर  गया,  तब  एस.सी.ओ.  जूते  से  लात  मारते  हुए  चिल्लाया, ”You Fool, respect your seniors. Say Lieutenant commander Kohl. Come on say.”

कम्युनिकेशन   सेन्टर   में   ड्यूटी   पर   तैनात   अनेक   हिन्दुस्तानी   सैनिक   आर. के.  के  साथ  हो रही  मारपीट  को  देखकर  बेचैन  हो  रहे  थे ।  मदन  परिस्थिति  एव सम्भावित परिणामों का निरीक्षण कर रहा था । गुरु के लिए यह सब असहनीय हो  गया  और  वह  रोष  में  भरकर  आगे  बढ़ने  को  तत्पर  हुआ  मगर  मदन  ने  फ़ौरन उसे   पीछे   खींच   लिया   और   धीरे   से   बोला,    ”Control Yourself.”

गोरा लीडिंग सिग्नलमेन पुटपुटाया, ‘‘इन कालों को उनकी जगह दिखानी ही चाहिए!’’

‘‘साला,  मादर…,  इस  गोरे  की  अच्छी  धुलाई  करनी  चाहिए ।’’  पीछे  खड़ा हुआ    सलीम    पुटपुटाया ।

‘‘इन्कलाब जिन्दाबाद, वन्दे मातरम्, जय हिन्द…’’ अपने ऊपर पड़ती हर लात   का   जवाब   आर.   के.   नारों   से   दे   रहा   था ।   आर.   के.   के   होंठों   से   खून   निकलते देख    गोरा    चीफ    बीच–बचाव    करने    के    लिए    आगे    आया ।

”It’s enough, Sir…” कम्युनिकेशन ऑफिसर को पीछे खींचते हुए चीफ़ ने समझाया ।

”Kohl is not my senior. He is only Kohl!” आर.  के.  ने  होंठों  पर आया खून पोंछते हुए फिर से दुहराया ।

”Chief, take that bastard away otherwise I shall kill him.” एस. सी.ओ.    चीखा ।

आर.  के.  को  कैद  करके  क्लोज़ कस्टडी  में  रखा  गया ।  वरिष्ठ  अधिकारियों का   अपमान,   आज्ञा   का   उल्लंघन   करना,   साम्राज्य   से   गद्दारी   इत्यादि   छोटे–छोटे   आठ दस    आरोप    उस    पर    लगाये    गए ।    मदन,    गुरु,    दास,    खान – इन    आज़ाद    हिन्दुस्तानियों को उसके भविष्य की कल्पना    थी ।    दुख    एक    ही    बात    का    था ।    आर.के.    का    बरबाद होता   हुआ   जीवन   उन्हें   अपनी   आँखों   से   देखना   पड़   रहा   था ।   वे   कुछ   भी   नही कर    सकते    थे ।

शनिवार को आर. के. को कमांडिंग ऑफिसर के सामने पेश किया गया ।

आर.  के.   का   चेहरा   सूजा   हुआ   था ।   पिछले   दो   दिन   नौसेना   की   पुलिस   शायद उसकी    खूब    पिटाई    करती    रही    होगी ।

रेग्यूलेटिंग पेट्टी ऑफिसर ने आर. के. पर लगाए गए आरोपों को पढ़ना आरम्भ किया । हर आरोप के बाद आर. के. नारे लगाता और सामने खड़े एस.सी.ओ.    की    ओर    देखकर    हँसता    रहता ।

”Keep your mouth shut!” गुस्साया हुआ एस.सी.ओ.  चिल्लाया ।

”Mr Kohl, ask him to keep his mouth shut.” आर. के.  ने  कहा । उसने    ठान    लिया    था    कि    आज    इन    गोरों    को    चिढ़ाता    रहेगा ।

”Say Sir” रेग्यूलेटिंग    पेट्टी    ऑफिसर    चिल्लाया ।

”Now all of you keep your mouth shut and you answer my question.” कोल   चिल्लाया ।

पलभर  के  लिए  खामोशी  छा  गई ।  कोल  ने  शान्त  स्वर  में  पूछा,  ‘‘ये  ख़त तुमने   लिखा   है ।’’

‘‘हाँ,    मैंने    लिखा    है ।’’    आर.  के.    ने निश्चयात्मक सुर में    जवाब    दिया ।

”Say ‘Yes, Sir’ ” एस.सी.ओ.  ने  हौले  से  सलाह  दी ।  कोल  ने  कठोरता से    उसकी    ओर    देखा    तो    एस.सी.ओ.    ने    गर्दन    झुका    ली ।

एस.सी.ओ.   तथा   अन्य   गोरे   अधिकारियों   की   हम   कौड़ी   जितनी भी  कीमत   नही करते ये प्रदर्शित करने की सन्धि का लाभ आर.के. ने उठाया । एस.सी.ओ. की ओर देखकर हँसते हुए वह बोला, ”Yes, Kohl, मैंने ही लिखा है वह ख़त और मुझे    इसका    गर्व    है ।’’    उसकी    आवाज    में    निर्भयता    थी ।

”It will be better if you pay proper respect to your seniors.” कोल ने सलाह दी ।

कोल   ने   उसके   पेट   में   घुसकर   जानकारी   प्राप्त   करने   का   निश्चय   किया । वह    अभी भी    शान्त    था ।

‘‘तुम्हें  इस  पत्र  को  लिखने  पर  वाकई  में  पछतावा  रहा  हो  और  यदि  तुम यह  बात  लिखकर  दे  दो;  तुम्हें  ख़त  को  लिखने  के  लिए  किसने  उकसाया  उनके नाम    बता    दो;    तो    मैं    सहानुभूति    से    तुम्हारे    बारे    में    विचार    करूँगा ।’’

‘‘मुझे सचमुच में बुरा लग रहा है और   पछतावा   भी   हो   रहा   है   कोल…’’ आर.के.    एक    पल    को    रुका ।

एस.सी.ओ.    के    चेहरे    पर    विजय    की    मुस्कराहट    फैल    गई ।

कोल    सतर्क    हो    गया ।

‘‘ख़त लिखने पर नहीं, बल्कि ख़त लिखने में इतनी देर कर दी इसलिए । शिकारी के जाल में फँसा पंछी अपने को छुड़ाने की कोशिश खुद ही करता है । उसे   कोई   पढ़ाता–सिखाता   नहीं   है ।   गुलामी   से   मुक्त   होने   और   स्वतन्त्रता   प्राप्त करने   का   अधिकार   हर   प्राणी   को   है   और   उसी   का   प्रयोग   मैं   कर   रहा   हूँ ।   जय हिन्द ।’’

”All right. मतलब   तुम   गद्दार   हो!’’   भीतर   का   क्रोध   चेहरे   पर   न   लाते हुए उसने डिफॉल्टर   रजिस्टर   में   सज़ा   लिखी   और   रेग्यूलेटिंग   पेट्टी   ऑफिसर  ने उसे   पढ़कर   सुनाया ।’’

‘‘एक    साल    की    बामशक्कत    कैद    और    नौसेना    से    बर्खास्तगी ।’’

”Thank you, Kohl,” आर.के.  के  मुख  पर  जीत  का  भाव  था ।  हाथ  में  ली    हुई    टोपी    को    उसने    पैर    से    दूर    उछाल    दिया ।

‘‘वन्दे    मातरम्!

जय   हिन्द!!

क्विट    इंडिया!!! ‘’ आर.के.    नारे लगाता    रहा ।

आज पहली बार ‘तलवार’ की मिट्टी का प्रत्येक कण देशप्रेम की उत्कट भावना    से    ओतप्रोत    होकर    पुलकित    हो    उठा    था ।

आर.के.   का   हर   नारा   ब्रिटिश   अधिकारियों   और   सैनिकों   को   चिन्ताग्रस्त   कर रहा    था ।

आर.के.   के   साथ   क्या   होता   है,   उसे   कितनी   सजा   मिलती   है   यह   जानने के  उद्देश्य  से  रेग्यूलेटिंग  ऑफिस  के  चारों  ओर  मँडराने  वाला  हर  सैनिक  रोमांचित हो रहा था । उनमें से अनेक सैनिकों का मन हो रहा था कि जोर से चिल्लाकर नारा लगाएँ, ‘जय    हिन्द!’    मगर    हिम्मत    ही    नहीं    हो    रही    थी ।

कोल की अनुभवी नजरों ने सैनिकों में हुए इस परिवर्तन को ताड़ लिया ।

‘‘चाहे   जो   करना   पड़े,   मगर   इस   आँधी   को   यहीं   रोकना   होगा,   वरना…’’ वह अपने आप से पुटपुटाया । उसने रेग्यूलेटिंग पेट्टी ऑफिसर को बुला भेजा ।

‘‘आर.के.  को  मुल्की (स्थानीय) पुलिस के हवाले करने की जल्दी न  करना ।’’

कोल   सूचना   दे   रहा   था,   ‘‘सारे   थर्ड   डिग्री   मेथड्स   आजमाकर   इसके   साथियों के    नाम    उगलवा    लो!’’

आर.के. की यमयातनाएँ आरम्भ हो गर्इं । सेल में उसे छह–छह घण्टे खड़ा रखा  गया,  तलवों  पर  डण्डे  मारे  गए,  उल्टा  टाँगकर  रखा  गया,  दो  रात  और  दो दिन  उसे  सोने  नहीं  दिया  गया  और  पूरे  शरीर  पर  मार  तो  रोज़  ही  पड़ती  थी । हर बार उससे एक ही सवाल पूछा जाता,    ‘‘तेरे    साथी    कौन    हैं ?’’

और    उसका    जवाब    एक    ही    होता,    ‘‘कोई    नहीं ।’’

जब यह सब बर्दाश्त के बाहर हो गया तो उसने अनशन शुरू कर दिया ।

उसके  अनशन  के  निर्णय  से  चिन्ताग्रस्त  हो  गए  कोल  ने  उसे  मुल्की  पुलिस  को सौंप    दिया    और    राहत    की    साँस    ली ।

गुरु  और  मदन  ने  आर.के.  पर  किये  गए  अत्याचार  की  खबरें  नमक–मिर्च लगाकर    सैनिकों    तक    पहुँचाईं ।

Courtsey: storymirror.com

Share with:


0 0 votes
Article Rating

Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.
0 Comments
Inline Feedbacks
View all comments

Random Posts

Placeholder Image 90

Thewriterfriends.com is an experiment to bring the creative people together on one platform. It is a free platform for creativity. While there are hundreds, perhaps thousands of platforms that provide space for expression around the world, the feeling of being a part of fraternity is often lacking. If you have a creative urge, then this is the right place for you. You are welcome here to be one of us.

Random Posts

Rail Wheel manufacture made cheaper in India than import from China

By Suresh Rao | December 25, 2020 | 4 Comments

(pic) Splitting of a freshly cast wheel at the furnace of Rail Wheel Factory in Yelahanka Bangalore. Credit: DH Photo The Yelahanka Bangalore Rail Wheel Factory (RWF) has cut its manufacturing cost and is offering its products at a rate unmatched by its overseas competitors. RWF’s managing director Rajiv Kumar Vyas said automation and reform…

Share with:


Read More

When I Badly Hurt My Foot

By Navneet Bakshi | July 15, 2020 | 5 Comments

I remember, I was in 6th standard then. We used to come back from school around 4:30 PM. Immediately after dumping the school bags, removing the school uniform and changing in to a set of ‘home clothes’ we would rush out to play. The sun sets early in the hills and every minute used to…

Share with:


Read More

Unique Remembrance

By Sabita Paintal | March 26, 2021 | 1 Comment

I was stunned to hear on phone about the sudden demise of my daughters pet dog ( mac) . He was 9 years old and of pug breed , hail and hearty, small structured and lovable. He poured too much attachment to his both doctor owners and made their lives lively . He was very…

Share with:


Read More

Flipping through fictitious journal

By Gopalakrishnan Narasimhan | September 1, 2020 | 2 Comments

  10th Jan1984: Appa screamed at me that is nothing new. But he did it in front of all in the tenants. Even she was there! “If you keep scoring only this much, you can land up only to clean the tables at a Udipi Hotel.” Is securing 75% too less? I am perplexed. What would have she thought of me?   12th Feb’84:…

Share with:


Read More

Hymn of Creation (Rig Veda)

By Suresh Rao | September 6, 2021 | 0 Comments

In ‘big bang theory’ postulated by modern astronomers, we believe that the Universe apparently began from nothingness. Everything in the Universe (stars, galaxies, suns, planets & their moons for example,) that we see today began after a ‘big bang’ or ‘explosion’ in ‘nothingness’ say our modern astronomers. Ancient rishis of Bharatavarsha (ancient land of Bharata) talked about…

Share with:


Read More

वड़वानल – 22

By Charumati Ramdas | July 29, 2020 | 0 Comments

लेखक: राजगुरू द. आगरकर अनुवाद: आ. चारुमति रामदास   मुर्गे  ने  पहली  बाँग  दी  फिर  भी  सैनिक  जेट्टी  पर  सज़ा  भुगत  ही  रहे  थे । आख़िर    तंग आकर   पीटर्सन    ने    पॉवेल    से    रुकने    को    कहा । ‘‘तुम  लोगों  की  सहनशक्ति  की  मैं  दाद  देता  हूँ;  मगर  याद  रखो,  मुकाबला मुझसे   है ।   अपराधी   को   पकड़े  …

Share with:


Read More

The Tale of the Unextinguished Moon

By Charumati Ramdas | September 20, 2020 | 6 Comments

A.Charumati Ramdas   In May 1926, journal Novyi Mir published the ‘Tale of the Unextinguished Moon’, written by Boris Pilnyak. Publication of the ‘Tale’ resulted in the confiscation of that particular number of the journal and ultimately the author had to admit that it was a great mistake on his part to write this work.   In…

Share with:


Read More

Mexico makes a super car

By Suresh Rao | July 12, 2021 | 0 Comments

WORLD AWAITS THOSE WHO CAN USE IMAGINATION AND  TECHNOLOGY AROUND TO CREATE The jobs of the future will be driven by technology and innovation—65 per cent of children entering primary school today will enter a new world of jobs that do not yet exist. We need to create excitement about the future and have open…

Share with:


Read More

एल्तिशेव परिवार की कहानी (एक अंश)

By Charumati Ramdas | September 29, 2020 | 0 Comments

लेखक: रमान सेन्चिन अनुवाद: आ. चारुमति रामदास   अपने अनेक हम-उम्र लोगों के समान निकलाय मिखाइलविच एल्तिशेव ज़िन्दगी के काफ़ी बड़े दौर तक यही सोचता था कि इन्सानों की तरह जीना चाहिए, अपने कर्तव्य को पूरा करना चाहिए और धीरे-धीरे आपको इसका पुरस्कार अवश्य मिलेगा. रैंक में पदोन्नति, सरकारी क्वार्टर, तनख़्वाह में वृद्धि, जिसमें से…

Share with:


Read More

Decoding The Crimson Island

By Charumati Ramdas | July 31, 2020 | 2 Comments

Decoding M.Bulgakov’s The Crimson Island A.Charumati Ramdas The Crimson Island, written by the author of Master and Margarita, remains one of the most mysterious plays of world. Looking quite innocent on the surface, the play, which saw the stage just for one theatrical season, only in Moscow, was first published as a satirical sketch on 20th April 1924 in…

Share with:


Read More
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x