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वड़वानल – 14

लेखक: राजगुरू द. आगरकर

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

14

 

रात    को    मदन,    गुरु,    खान    और    दास    अपने    संकेत    स्थल    पर    मिले ।

‘‘दोपहर को मुझे रामदास ने बुलाया था ।’’ मदन ने दोपहर की मुलाकात के    बारे    में    बताया ।

‘‘तुमने   रामदास   पर   विश्वास   नहीं   रखा   यह   ठीक   ही  किया,’’   गुरु   ने   अपनी राय    दी ।

‘‘यदि   हिन्दुस्तानी   अधिकारी   हमें   सहयोग   देने   के   लिए   तैयार   हों   तो   हमें उसे  स्वीकार  करना  चाहिए ।  उससे  बग़ावत  ज़ोर पकड़ेगी ।  हमारा  संगठन  मजबूत होगा ।’’    खान    ने    अपना    विचार    रखा ।

‘‘ये  अधिकारी  मन:पूर्वक  और  परिणामों  की  परवाह  किए  बिना  यदि  हमारा साथ   देने   वाले  हों   तो   कोई   लाभ   भी   होगा,   वरना   हमारे   काम   का   नुकसान   ही होगा” गुरु ने कहा।

‘‘उनके  निकट  सम्पर्क  में  न  होने  के  कारण  कौन  कितने  पानी  में  है  यह समझना मुश्किल है ।’’    मदन    ने    जवाब    दिया ।

‘‘मदन   की   बात   मुझे   ठीक   लगती   है ।   हमें   कुछ   दिनों   तक   रामदास   पर   नज़र रखनी    चाहिए ।    उसने    यदि    दुबारा    बुलाया    तो    जाना    चाहिए; उससे बात करनी चाहिए,  मगर  जब  तक  पूरा  यकीन  नहीं  हो  जाता  उसे  इस  बात  की  भनक  नहीं मिलनी  चाहिए  कि  हम  कितने  लोग  हैं  और  हमारी  योजनाएँ  क्या  हैं ।’’  गुरु  की राय    सबको    उचित    प्रतीत    हुई ।

दूसरे   दिन   सुबह   रामदास   की   गिरफ्तारी की खबर पूरी   बेस   में   हवा   की   तरह फैल    गई ।

सब  लेफ्टिनेंट  रामदास  के  ऑफिस  के  सामने  ले.स्नो,  ले.  पीटर  और  थॉमस खड़े   थे ।   नेवल   पुलिस   की   सहायता   से   एक   वरिष्ठ   लेफ्टिनेंट   कमाण्डर   ऑफिस की    तलाशी    ले    रहा    था ।

”Come on Speak out, tell me the truth who are with you?” स्नो रामदास    से    पूछ    रहा    था ।

रामदास    खामोश    था ।

‘‘हमारे  हवाले  कर  दीजिए ।  हमारा  मज़ा  दिखाने  की  देर  है,  सब  कुछ  उगल देगा ।’’    पीटर    ने    कहा ।

‘‘देखो,     सच बताओगे तो सज़ा कम होगी;  वरना…    बोल,     कौन–कौन हैं तुम्हारे साथ ?’’    स्नो ने    पूछा ।

ऑफिस से कुछ दूरी पर एक पेड़ के पीछे छिपे मदन और गुरु सुनने की कोशिश कर रहे थे । मदन डर रहा था । कहीं उसने मेरा नाम बता दिया तो ?’’

‘‘मैं   अकेला   हूँ ।   मेरे   साथ   कोई   नहीं   है ।’’

‘‘राशन   में   कटौती   की   गई   है,   यह   अफवाह   किसने   फैलाई ?’’   थॉमस   ने पूछा ।

‘‘मैंने ।’’

गुस्साए  हुए  पीटर  ने  रामदास  का  गाल  लाल  कर  दिया ।  स्नो  आगे  बढ़ा ।

‘‘नहीं,  यह  मैं  होने  नहीं  दूँगा । अभी  हमने उसे तुम्हारे  हवाले  नहीं  किया है ।‘’

मदन  अपने  आप  से  बड़बड़ाया,  ‘‘उस  पर  विश्वास  करना  चाहिए  था । वह हमारा आदमी है । उसे    बचाना    चाहिए ।’’

मदन   ने   गुरु   को   पीछे   खींचा ।   ‘‘भावनावश   होने   की   जरूरत   नहीं   है ।   उसकी उसे    भोगने    दो!’’    और    वे    दोनों    बैरक    में    वापस    आए ।

 

 

 

कलकत्ते   से   दत्त   का   ख़त   आया   था ।   उसने   लिखा   था   कि   कलकत्ते   के   सैनिकों की    अस्वस्थता    बढ़ती    जा    रही    है ।

‘‘अरे,    मगर    कारण    क्या    है ?’’    गुरु    ने    पूछा ।

‘‘और क्या हो सकता है! वहाँ मिलने वाला भोजन । दत्त ने वहाँ दिये जा रहे  भोजन  के  बारे  में  लिखा  है: ‘यहाँ  हिन्दुस्तानी  सैनिकों  को  मेस  में  जो  भोजन दिया  जाता  है  वह  गोरे  सैनिकों  को  मिलने  वाले  भोजन  की  अपेक्षा  निकृष्ट  किस्म का    होता    है,    उसकी    मात्रा    भी    कम    होती    है ।    यहाँ    मिलने    वाली चाय तो एक अजीब तरह का रसायन है । थोड़ी–सी चाय का पाउडर और शक्कर को खूब सारे पानी में  मिलाकर  उसे  उबाला  जाता  है ।  दूध  सिर्फ  उतना  ही  डाला  जाता  है  कि  बस रंग बदल जाए । चाय नामक यह बेस्वाद द्रव गले से नीचे नहीं उतरता । दोपहर के भोजन में उबले चावल का जो भात दिया जाता है वह कंकड़ों से इतना भरा होता  है  कि  दाँतों  को  बचाते  हुए  उसे  चबाना  पड़ता  है ।  शाम  के  खाने  में  बुधवार को और शनिवार को पराँठा दिया जाता है । बाकी के पाँच दिन काले कीड़ों से भरपूर, सूखे  हुए  ब्रेड  के  टुकड़े  मिलते  हैं ।  हम  कीड़ों  को  निकाल–निकालकर  नमक, मिर्च   डली   मसाला–दाल   या   काश्मीरी   बैंगन   जैसी   किसी   बेस्वाद   सब्जी   के   साथ उन    ब्रेड    के    टुकड़ों    की    जुगाली    करते    हैं ।    पराँठा    भी    ऐसा    ही    अफलातून  होता है ।  पाव  से  लेकर  आधा  इंच  तक  मोटा  और  दस  से  ग्यारह  इंच  व्यास  वाला  ये पराँठा   किस   जगह   पूरी   तरह   पका   हुआ   है,   यह   एक   संशोधन   का   विषय   हो   सकता है ।   खाने   में   जो   सब्जियाँ   दी   जाती   हैं,   उनके   नाम   चाहे   अलग–अलग   हों,   मगर स्वाद सबका एक ही होता है । बैंगन, आलू, कद्दू, प्याज, परवल जैसी विभिन्न सब्जियाँ   एक   साथ   उबालकर   उनमें   मन   भर   नमक   और   मिर्च   डाली   कि   सब्जी तैयार!   मसाला   बदला   नहीं   जाता   मगर   सब्जियों   के   नाम   बदल   जाते   हैं ।   वेजिटेबल स्ट्यू, काश्मीरी आलू,    बैंगन,    शाही बैंगन…  यही    हाल    मटन    का    भी    है  – कलेजी, गुर्दा,  भेजा – हमेशा  गायब  हड्डियों  की  मगर  कोई  कमी  नहीं ।  दत्त  ने  आगे  लिखा है,   ‘‘तुम्हारे   यहाँ   भी   स्थिति   अलग   नहीं   होगी   यह   सब   मैं   इतने   विस्तार   से   इसलिए लिख रहा हूँ ताकि तुम लोग इस बात पर गौर करो कि क्या इस परिस्थिति का लाभ  उठाया  जा  सकता  है ।  हम  इसी  एक  मुद्दे  को  लेकर  सैनिकों  को  संगठित कर   रहे   हैं ।’’

दत्त   द्वारा   किये   गए   खाने   के   वर्णन   को   सुनकर   गुरु   को   अपना   प्रशिक्षण काल   याद   आ   गया   और   वह   अपने   आप   से   बड़बड़ाया,   ‘‘राशन   का   यह   मुद्दा अंग्रेज़ों    को    सबक    सिखायेगा ।’’

‘‘दत्त  ने  जिस  प्रकार  खाने  के  मुद्दे  को  लेकर  संगठन  किया  है  क्या  हमारे लिए वह सम्भव होगा,    यह    देखना    होगा ।’’    मदन    ने    सुझाव    दिया ।

‘‘क्या   कहता   है   अखबार ?’’   आठ   से   बारह   की   ड्यूटी   करके   लौटे   खान ने    गुरु    से    पूछा ।

चार  साल  पहले  बैरेक  में  सरकार  के  चापलूस  एक–दो  पुराने  अखबार  पढ़ने के   लिए   दिये   जाते   थे ।   कुछ   साहसी   सैनिक   सरकार   विरोधी   अखबार   छुपाकर   लाते और   छुप–छुपकर   पढ़ते ।   अब   स्थिति   बदल   चुकी   थी ।   अब   खुले   आम   अखबार लाए    और    पढ़े    जाते    थे ।

‘‘कुछ  खास  नहीं ।  जेल  से  आज़ाद  किए  गए  नेताओं  की  सूची  है ।’’  गुरु ने    बताया ।

‘‘1942  का  आन्दोलन  कहने  को  तो  अहिंसक  आन्दोलन  था,  मगर  कितना खून   बहा ?’’   खान   ने   कहा ।

‘‘सरकार   कहती   है   कि   केवल   930   व्यक्ति   मारे   गए,   1630   ज़ख्मी   हुए   और 92    हजार    जेलों    में    भरे    गए ।’’

‘‘यह   संख्या   सही   नहीं   है ।   वास्तव   में   दस   हजार   लोग   मारे   गए   और   क्रान्ति के    नेताओं    के    अनुसार    तीन    लाख    लोग    जेलों    में    डाले    गए ।’’    खान    ने    दुरुस्त    किया ।

‘‘यह कैसी अहिंसात्मक क्रान्ति है! आज़ादी का कमल रक्त–मांस के कीचड में ही खिलता है – यही    सत्य    है!’’

‘‘इतना    बलिदान    करके    भी    हमें    क्या    मिला ?    जमा    खाते    में    तो    शून्य    ही         है ।’’

‘‘महात्माजी  अथवा  कांग्रेस  के  अन्य  नेता  1942  के  बाद  खामोश  ही  बैठे हैं ।

‘‘कांग्रेस   के   नेतागण   अब   थक   चुके   हैं । इसीलिए   उन्होंने   1942   के   बाद किसी नये आन्दोलन       का       आह्वान       नहीं       किया       है ।       इसके       विपरीत       भूमिगत       क्रान्तिकारियों के    आन्दोलन    जोर–शोर    से    चल    रहे    हैं ।    कहीं    पुल    उड़ाए    जा    रहे    हैं,    तो    कहीं    सरकारी ख़जाने    लूटे    जा    रहे    हैं ।’’

 

 

 

एक    सुबह    आर.के.    को    बैरेक    में    देखकर    मदन    भौंचक्का    रह    गया ।

‘‘तू   यहाँ   कैसे ?’’

‘‘कैसे,    मतलब ?    तबादला    हुआ    है    मेरा    यहाँ – ‘तलवार’    पर ।’’

”Oh, that’s good. ईश्वर    हमारे    साथ    है!’’    गुरु    ने    कहा ।

‘‘यह  याद  रखना  कि  सिर्फ  ‘तलवार’  पर  बग़ावत  करना  पर्याप्त  नहीं  है । सभी    जहाजों    पर    और    बेसेस    पर    बग़ावत    होनी    चाहिए ।    तैयारी    करने    के    लिए हमारे    आदमी    हर    जगह    पर    होने    चाहिए ।’’    मदन    ने    अपनी    राय    दी ।

‘‘चिन्ता  मत  करो ।  वह  भी  हो  जाएगा ।  पहले  तुम  यह  बताओ  कि  कराची में    हालात    कैसे    हैं ?’’    गुरु    ने    पूछा ।

‘‘कराची   में   बेस   पर   और   बाहर   भी   वातावरण   तनावपूर्ण   है ।   लोग   सिर्फ़ एक     ही     प्रश्न     पूछ     रहे     हैं : आजाद     हिन्द     फौज     हिन्दुस्तान     की     सेना     है ।     वह     हिन्दुस्तान की  आजादी  की  खातिर  लड़ी  थी ।  इस  सेना  के  सैनिकों  पर  राजद्रोह  के  मुकदमे चलाने   का   अंग्रेज़ी   हुकूमत   को   कोई   अधिकार   नहीं   है ।   सैनिक   महात्मा जी  और   कांग्रेस के   नेताओं   से   चिढ़   गए   हैं ।   राष्ट्रीय   नेताओं   को   अब   और   ज्यादा   खामोश   न रहकर अंग्रेज़ी  सरकार  से  कहना  चाहिए  कि  हिन्दुस्तान  छोड़ो  वरना  हम  हिन्दुस्तानी  सेना को    आह्वान    देंगे ।’’    आर.के.    ने    जवाब    दिया ।

‘‘नेतागण  अपनी  ओर  से  कोशिश  कर  ही  रहे  हैं ।  कांग्रेस  तो  सैनिकों  की तरफ    से    मुकदमा    लड़    ही    रही    है ना ?’’    मदन    ने    पूछा ।

‘‘क्या    अंग्रेज़ों    के    कायदे–कानून    और    उनकी    अदालतों    पर    भरोसा    करना चाहिए ? सैनिकों    का    गुस्सा    कायदे    आजम    जिन्ना    पर    है ।’’    आर.के.    ने    कहा ।

‘‘क्यों ?’’   गुरु   ने   पूछा ।

‘‘हिन्दुस्तान   की   आजादी   के   लिए   जात–पाँत   भूलकर,   जान   की   बाजी   लगाते हुए लड़ने वाले सैनिकों के बीच फूट डालने का प्रयत्न जिन्ना ने किया । उन्होंने शाहनवाज  खान  को  सूचित  किया,  ‘आप  अन्य  अधिकारियों  से  अलग  हो  जाइये । मैं आपकी ओर से लडूँगा ।’’ मेजर जनरल खान ने जवाब दिया, ‘‘हम आजादी की    खातिर    युद्धभूमि    पर    कन्धे    से    कन्धा    लगाकर    लड़े    हैं ।    अनेको    ने    युद्धभूमि पर   अपने   प्राण   न्यौछावर   कर   दिये ।   हम   इकट्ठे   रहकर   ही   जीतेंगे   या   मरेंगे!’’   खान के    जवाब    ने    सैनिकों    को    मन्त्रमुग्ध    कर    दिया    है ।

‘‘आर. के., आजाद हिन्द सेना के एक भी सैनिक को अगर सजा दी गई ना,    तो    मैं…   इस    अंग्रेज़ी    सरकार    को    अच्छा    सबक    सिखाऊँगा,    शायद    मुझे    सफलता न मिले;  मगर कोशिश तो मैं जी–जान से करूँगा ।’’ गुरु की आँखों में खून उतर आया    था ।

‘‘दूसरी    एक    महत्त्वपूर्ण    घटना    यह    हुई    कि    कुछ    दिन    पहले    हम    राष्ट्रीय    कांग्रेस के अध्यक्ष मौलाना अबुल कलाम आजाद से मिले थे । हमारे साथ किये जा रहे व्यवहार के बारे में, कम तनख़्वाह के बारे में तो उन्हें बताया ही, साथ ही हरेक के   मन   में   पल   रही   आजादी   की   आस   और   उसके   लिए   हर   सैनिक   के   अपना सर्वस्व    न्यौछावर    करने    के    इरादे    के    बारे    में    भी    बताया ।’’

‘‘फिर   उन्होंने   क्या   कहा ?’’   मदन   ने   पूछा ।

‘‘उन्होंने  शान्ति  से  हमारी  बात  सुनी ।’’  आर.  के.  इस  जवाब  से  गुरु  को निराशा    हुई ।

 

 

 

”Leading, tell Madan to main gate for guest” लाऊडस्पीकर   से   क्वार्टर मास्टर  ने  घोषणा  की  और  कौन  आया  होगा  इसके  बारे  में  विचार  करते  हुए  मदन मेन    गेट    पर    आया ।

‘Hello, good noon, Madan” मेन  गेट  पर  खड़े  विलायती  पोशाक  वाले युवक    ने    उसे    ‘विश’    किया ।

”A tetter From uncle Shersingh from Calcutta.” और   उसने   मदन के हाथ में एक लिफाफा दिया । मदन ने उसे पहचाना नहीं था । उसने लिफाफा ले  लिया ।  उस  नौजवान  ने  अपनी  हैट  उतारकर  कमर  तक  झुकते  हुए  मदन  से कहा,   ”O.K. Madan, see you.” मदन  ने  उसकी  ओर  देखा – वह  भूषण  था ।

पत्र  में  लिखे  निर्देशानुसार  दोपहर  चार  बजे  मदन,  गुरु  और  खान  गेट  वे के   पास   खड़े   होकर   भूषण   की   राह   देख   रहे   थे ।   उन्होंने   भूषण   को   देखा   और   उससे पर्याप्त  अन्तर  रखते  हुए  उसके  पीछे–पीछे  इस  तरह  जाने  लगे  कि  किसी  को  कोई सन्देह  न  हो ।  पहले  ट्रामगाड़ी  से,  फिर  लोकल  से  और  फिर  पैदल  चलते  हुए  घण्टे भर   बाद   भूषण   एक   पुराने   घर   में   घुसा ।   घर   का   दरवाजा   खुला   ही   था ।   करीब पाँच   मिनट   बाद   वे   तीनों   उस   घर   में   घुसे   तो   घर   का   दरवाजा   बन्द   हो   गया । अब वहाँ    गहरा    अँधेरा    था ।

‘‘ऐ,    किधर    जा    रहे    हो ?’’    एक    डपटती    हुई    आवाज    सुनाई    दी ।

‘‘शेरसिंहजी    से    मिलना    है ।’’

‘‘हाथ    में    क्या    है ?’’

‘‘फूल ।’’

‘‘कौन–सा    फूल ?’’

‘‘लाल    गुलाब ।’’

अन्दर  हर  तरफ  अँधेरा  था । अँधेरे में  टटोलते  हुए  तीन  कमरे  पार  करके वे एक दरवाजे के पास आए । दरवाजा खोलते ही प्रकाश की किरण भीतर को झाँकी । तीनों कमरे में गए । दरवाज़ा बन्द हो गया । उस बड़े से कमरे के भीतर वातावरण    गम्भीर    था ।    कमरे    में    सुभाषचन्द्र    की    एक    बड़ी    ऑयल    पेंटिंग    थी ।    उसकी तस्वीर    के    नीचे    बैठे    शेरसिंह    कुछ    लिख    रहे    थे ।

Courtsey: storymirror.com

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Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.
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