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वड़वानल – 13

लेखक: राजगुरू द, आगरकर

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

 

गुरु ड्यूटी समाप्त करके बैरेक में वापस   आया,   तो   एक सनसनीखेज   समाचार लेकर,    और    सुबूत    के    तौर    पर    हाथ    में    एक    काग़ज लिये ।

Secret Priority-101500 EF.

From–Flag officer Commander in Chief Royal Navy

To–Naval Supply office.

Information–All Ships and Establishments of Royal Navy.

=Twenty percent cut in ration with immediate effect.=

यह  सन्देश  बम  का  काम  करेगा  इस  बात  की  किसी  ने  कल्पना  भी  नहीं की थी । गुरु ने वह सन्देश खान, मदन और दास को दिखाया तो तीनों को ही वह  सन्देश  सही  प्रतीत  हुआ ।  उस  रात  उस  सन्देश  की  अनेको  प्रतियाँ  बैरेक में चिपकाई    गईं।

दूसरे   दिन   परोसा   गया  भोजन रोज़ जितना   ही   था,   परन्तु   फिर   भी   वह   हरेक को कम ही प्रतीत    हो    रहा    था ।

‘‘लो, अब पेट भी काटना पड़ेगा!’’ अपनी प्लेट ले जाते हुए गुरु ज़ोर से बड़बड़ा रहा    था ।

उस  दिन  से  ‘तलवार’  में  एक  ही  चर्चा  शुरू  हो  गई ।  महायुद्ध  के  कारण हुए   खर्च   से   इंग्लैंड   कंगाल   हो   चुका   है ।   उसकी   अर्थव्यवस्था   जर्जर   हो   गई   है । अर्थव्यवस्था  सँभालने  के  लिए  इंग्लैंड  ने  खर्चों  में  कटौती  करने  का  निश्चय  किया है । इसीलिए हिन्दुस्तानी सेना को दिए जा रहे भोजन की मात्रा में कमी की गई है ।  अब आधे पेट    रहकर    ही    काम    करना    पड़ेगा… ।

किसी  बात  की  कल्पना  की  जाए  और  वह  सच  हो  जाए  ऐसा  ही  भोजन की   मात्रा   में   कटौती   की   इस   खबर   के   बारे   में   हुआ   था ।   सरकार   ने   वाकई   में भोजन    में    कटौती    की    थी,    मगर    वह    पाँच    प्रतिशत    ही    थी ।

 

 

 

बेस  कमाण्डर  ले.  कमाण्डर  कोल  की  तीक्ष्ण  दृष्टि  से  सैनिकों  की  अस्वस्थता  छिपी न   रह   सकी ।

”May I Come in, Sir” तलवार  का  फर्स्ट  लेफ्टिनेंट  स्नो  पूछ  रहा  था ।

‘Yes, Come in.” कोल  ने  आवाज़  से  ही  पहचान  लिया  कि  स्नो  आया है ।

”Good Morning, Sir!” स्नो    ने    अभिवादन    किया    और    वह    अदब    से    खड़ा रहा ।

”Please Sit down. ये   कैसी   अफवाह   फैल   रही   है ?’’

‘‘पिछले     कुछ     दिनों     से     रोज़     एकाध     अफवाह     सुनाई     दे     रही     है । पिछले     चार–पाँच दिनों  से  यह  अफवाह  जोरों  से  फैल  रही  है  कि  भोजन  में  बीस  प्रतिशत  कटौती की    गई    है ।    बिलकुल    हिन्दुस्तानी    अधिकारी    भी    इस    बारे    में    पूछ    रहे    हैं ।’’

‘‘भोजन  में     कटौती     की     बात     सैनिकों     तक     पहुँची     ही     कैसे ?     यह समस्या गम्भीर है ।   अधिकारी   भी   इन   अफवाहों   पर   विश्वास   कर   लेते   हैं ।   इस   पर   कोई   उपाय सोचना   जरूरी   है ।   वरना   शायद   अधिकारी   भी   सैनिकों   के   साथ…और फिर…’’

‘‘नहीं,  सर,  वैसा  कुछ  भी  नहीं  होगा ।  वे  ब्रिटिश  साम्राज्य  के  प्रति  वफादार ही रहेंगे । मैंने आज दोपहर को ही उन सबको इकट्ठे बुलाया है । उनसे मैं बात करने    वाला    हूँ ।    उनकी    जिम्मेदारी    की उन्हें    याद    दिलाने    वाला    हूँ ।’’

”That’ s good. मैं  तुमसे  यही  कहने  वाला  था ।’’

“ मगर  सैनिकों का  क्या ? अफवाहें   फैलाने   वालों   को   ढूँढें   कैसे ?”

ले.  कमाण्डर   कोल   सूझबूझ   वाला   व्यक्ति था ।  उसे  इस  बात  का  पूरा  अन्दाजा  था  कि  इन  अफवाहों  के  पीछे  क्रान्तिकारी सैनिकों  का  हाथ  है ।  इन  अफवाहों  का  उद्गम  कहाँ  से  हो  रहा  है  यदि  यह  समझ में   आ   जाए   तो   अनेक   प्रश्नों   के   जवाब   मिल   जाएँगे ।   इसकी   जड़   तक   जाना   सम्भव होगा ।

‘‘सर,  ये  सैनिक  कौन  हैं,  कितने  हैं,  आज  तो  कल्पना  करना  मुश्किल  है । नौसेना  में  इससे  पूर्व  हुए  विद्रोहों  को  याद  करके  हमें  सावधान  रहना  होगा ।  हर कदम    सोच–समझकर  उठाना    होगा ।’’    स्नो    कह    रहा    था ।

‘‘मेरा  ख़याल  है  कि  हमें  स्थिति  पर  नजर  रखनी  होगी  और  शान्त  रहना होगा ।’’    दूरदृष्टि    वाले    कोल    ने    सुझाव    दिया ।

”That’s right, sir,  हमें   यह   दिखाने   की   जरूरत   नहीं   कि   हम   इन   अफवाहों को कोई महत्त्व दे रहे हैं । बेकार में मधुमक्खियों के छत्ते के पास आग क्यों ले जाएँ!’’    स्नो    कह    रहा    था ।

‘तुम    एक    काम    करो ।    आज    की    अधिकारियों    की    सभा    में    हिन्दुस्तानी    सैनिकों  को  समझाने  की  जिम्मेदारी  हिन्दुस्तानी  अधिकारियों  पर  डाल  दो’’  कोल  ने  सलाह दी ।

स्नो       के       जाने       के       बाद       कोल       काफी       देर       तक       सोचता       रहा ।       अन्य       गोरे अधिकारियों  के  समान  उसके  दिल  में  हिन्दी  सैनिकों  के  बारे  में  केवल  द्वेष  नही था, बल्कि उनकी स्थिति का ज्ञान उसे था और उनके प्रति सहानुभूति भी थी । बुद्धिमान    हिन्दुस्तानी    लोगों    का    वह    आदर    किया    करता    था ।

‘‘महात्माजी    वाकई    में    महान    हैं ।    उनके    विचारों    से    अधिकांश    नेटिव    प्रभावित हुए   हैं ।’’   वह   अपने   आप   विचार   करता   रहा,   ‘‘मगर   सदा   अपने   साथ   बन्दूकें   रखने वाले    सैनिकों    पर    उनका    प्रभाव    नहीं    है ।    1942    के    उस    तूफान    में    गाँधीजी    ने    सैनिकों को  आह्वान  नहीं  दिया,  यह  अंग्रेज़ों  की  खुशकिस्मती  थी ।  वरना…अगर  1942 के    तूफान    में    सैनिक    शामिल    हो    जाते    तो… हिन्दुस्तानी    सैनिकों    के    भीतर    का असन्तोष…  गलत  क्या  है ?  अगर  उनकी  जगह  हम  होते  तो  हम  भी…’’  राजनिष्ठ मन    ने    सत्य    की    ओर    भटकते    हुए    मन    को    लगाम    लगाई ।

‘‘इन  सब  अफवाहों  का  उचित  बन्दोबस्त  तो  करना  ही  होगा;  मगर  ऐसा करते  समय  सैनिकों  में  गुस्सा  न  फैल  जाए  इस  बात  का  ध्यान  रखना  होगा ।’’ उसने  मन  ही  मन  कुछ  निश्चय  किया  और  कुछ  अस्वस्थता  से  बेस  का  राउण्ड लेने   के   लिए   निकल   पड़ा ।

अफवाहें  जोरों  से  फैल  रही  थीं ।  सैनिकों  को  उद्विग्न  करने  में  मदन,  गुरु, खान और दास को काफी सफ़लता मिली थी । वे अपनी सफ़लता पर खुश थे । उन्हें  इस  बात  का  पूरा  एहसास  था  कि  नौसेना  अधिकारी,  विशेषत:  हिन्दुस्तानी अधिकारी   चुपचाप   नहीं   बैठेंगे ।   अपना   महत्त्व   बढ़ाने   के   लिए,   अपना   स्वार्थ   साधने के  लिए  इन  अफवाहों  का  उद्गम  ढूँढ़ने  का  प्रयत्न  करेंगे ।  उस  दिशा  में  कुछ  लोग प्रयत्न    कर    रहे    थे ।

”You leading tel, come here.” सब   लेफ्टिनेन्ट रामदास मदन   को   बुला रहा    था ।    मदन    उसके    सामने    जाकर    अदब    से    खड़ा    हो    गया ।

”What is your name?”

‘‘मदन ।’’

रामदास  ने  मदन  को  ऊपर  से  नीचे  तक  देखा  और  कहा, “Come and report to me in my office.”

‘‘मगर    क्यों    सर,    मुझसे    क्या…’’

‘No arguments, obey first.”

पहले  तो  मदन  ने  सोचा  कि  रामदास  से  मिलूँ  ही  नहीं ।  मगर  यदि  उसके पास नहीं गया तो उसका सन्देह बढ़ेगा और वह हाथ धोकर पीछे पड़ जाएगा । इसके   अलावा,   रामदास   हाल   ही   में   ‘तलवार’   पर   आया   है ।  वह किस   हद   तक अंग्रेज़ों  का  चाटुकार  है  इसका  मदन  को  कोई  अन्दाज़ा  नहीं  था ।  उसने  निश्चय किया  कि रामदास    से    मिलेगा    तो    सही    मगर    ज्यादा    बोलेगा    नहीं ।

”May I come in, Sir?”

”Oh, come on Young man!” दरवाज़े में खड़े मदन को रामदास     ने     भीतर बुलाया ।    मदन    अदब    से    अन्दर    गया    और    एक    कड़क    सैल्यूट    मारते    हुए    उसने रामदास    का    अभिवादन    किया ।

”Good noon, sir!”

‘‘देखो, For the time being, no formalities. आओ बैठो ।’’ रामदास की    निकटता    साधने    की    कोशिश,    ‘‘सिगरेट    लोगे ?’’

”No, thanks!” मदन   सतर्क   हो   गया ।

रामदास  ने  सिगरेट  सुलगाई  सीने  में  खींचा  हुआ  धुआँ  फस्  से  बाहर  छोड़ते हुए उसने    मदन    से    कहा – ‘‘तुम्हारे    और    तुम्हारे    दोस्तों    को    मुबारकबाद!’’

‘‘मुबारकबाद किसलिए ?’’ सपाट  चेहरे से    मदन    ने    पूछा ।

‘‘अब,   नादान   बनने   की   कोशिश   न   करो ।   अगर   तुम   मेरे   मुँह   से   सुनना चाहते  हो  तो  सुनो ।  तुम  लोगों  ने  अफ़वाह  फैलाकर  सैनिकों  को  उद्विग्न  कर  दिया इसलिए!’’

‘‘आपको   शायद   कोई   गलतफहमी   हो   रही   है ।   हमें   इस   बारे   में   कुछ   भी मालूम   नहीं   है ।’’

‘‘ये सब किस तरह हुआ । इसके पीछे कौन–कौन हैं, यह मुझे मालूम है । कमाण्डर  कोल  के  कुत्ते  को  मेस  में  लाकर  उसके  सामने  मटन  का  बाउल  रखते हुए  मैंने  तुम्हें  देखा  है ।  मुझे  तुम्हारे  काम  में  व्यवधान  नहीं  डालना  था,  इसलिए मैं मेस के भीतर नहीं आया .’’

मदन   ने   सोचा   भी   नहीं   था   कि   रामदास   उसकी   गतिविधियों   को   बारीकी से   देख   रहा   होगा ।   उसने   मन   में   निश्चय   कर   लिया   कि   चाहे   जो   भी   हो   जाए, कितने    ही    सुबूत    दिये    जाएँ,    फिर    भी    कुछ    भी    स्वीकार    नहीं    करना    है ।

‘‘सच   कहूँ   तो   मुझे   इस   बारे   में   कुछ   भी   मालूम   नहीं   है ।   कुत्ता   मेरे   पीछे–पीछे आया । मुझे कुत्ते बेहद पसन्द हैं । वफ़ादार जानवर । उस दिन मटन कुछ ज़्यादा ही    था ।    फेंकने    के    बदले    मैंने    उसे    खिला    दिया ।’’

मदन की लीपा–पोती   का   रामदास पर कोई   असर   नहीं   हुआ । मदन की नज़रों से नज़र मिलाते हुए    उसने दूसरा    सुबूत    दिया ।

‘‘तुम शेरसिंह    को    जानते    हो    ना ?’’

‘‘मैं सिर्फ चाँदसिंह को जानता हूँ । यह शेरसिंह कौन है ?’’ मदन के चेहरे पर  मुस्कराहट  थी ।

“भूमिगत  क्रान्तिकारी  शेरसिंह,  तुम  कलकत्ते  में  उनसे  मिले  थे । मुझे    उन्होंने    ही    तुम    लोगों    से    मिलने    के    लिए    कहा    है ।’’

मदन   को   इतिहास   की   याद   आ   गई ।   इतिहास   में   वर्णित   शिर्के,   पिसाल, आठवले ।   उसके   मन   ने   कौल   दिया – यह   फँसा   रहा   है ।   इकट्ठा   की   गई   जानकारी मेरे सामने फेंक रहा है । वह और भी ज्यादा सावधान हो गया । शायद रामदास मुझसे  सारी  जानकारी  उगलवा  लेगा  और  फिर  मुझे  फँसा  देगा…  अपने  लिए  कुछ और    सुख–सुविधाएँ    प्राप्त    कर    लेगा ।    उसने    चुप    ही    रहने    की    ठानी ।

‘‘अभी     भी     विश्वास     नहीं     होता ।     मैं     भी     एक     क्रान्तिकारी     हूँ ।     मुझे     मदद     चाहिए, तुम    लोगों    का    सहकार्य    चाहिए ।’’

‘‘मदद ?   हम   क्या   मदद   कर   सकते   हैं ?’’

‘‘इस    बेस    में    बहुत    कम    अधिकारी    विद्रोह    के    पक्ष    में    हैं…   सैनिक    और अधिकारी  का  भेद  भूलकर  हम  एक  हो  जाएँ,  हमारी  ताकत  बढ़ेगी ।  तीनों  दलों के  अधिकारी  विद्रोह  की  तैयारी  में  लगे  हैं ।  उन्होंने  कमाण्डर  इन  चीफ  को  एक ख़त    लिखा    है ।    देखना    चाहते    हो ?’’    रामदास    के    शब्दों    में    चिड़चिड़ाहट    थी ।

मदन   शान्त   था ।

रामदास   ने   गुस्से   से   सामने   की   ऐश   ट्रे   में   सिगरेट   मसल   दी   और   टेबल की   दराज   से   एक   ख़त   निकालकर   मदन   के   सामने   फेंका । ‘‘पढ़ो,   जिससे   तुम्हें विश्वास हो    जाए ’’

मदन     ने     पत्र     खोला     और     रामदास     की     ओर     देखा ।     रामदास     सामने     रखे     गिलास से    गटगट    पानी    पी    रहा    था ।

मदन   ने   ख़त   पर  नजर   दौड़ाई ।   ख़त   पर   कोई   तारीख   नहीं   थी   और   नीचे किसी    के    हस्ताक्षर    भी    नहीं    थे ।    ख़त    में    कोई    खास    दम    नहीं    था ।

‘‘हमने  युद्ध  के  समय  प्रजातन्त्र  को  नाज़िज्म  द्वारा  होने  वाले  खतरे  को  दूर करने के लिए प्रयत्नों की पराकाष्ठा कर दी थी । इस खतरे को टालने में हमारा भी बड़ा सहयोग रहा है । हमने समय–समय पर आपके सामने अपनी माँगें रखी हैं,   परन्तु   आपने   उन   पर   कोई   ध्यान   नहीं   दिया   है ।   अब   इस   सम्बन्ध   में   चर्चा करके   आप   इस   समस्या   का   हल   निकालें   ऐसी   आप   से   विनती   है ।   इसके   लिए हम   आपको   14   फरवरी   तक   का   समय   दे   रहे   हैं ।   यदि   हमारी   माँगें   मंजूर   नही हुर्इं तो 15 फरवरी, 1946 को पूरे देश की सेना में अनुशासनहीनता फ़ैलाने की हम    कोशिश    कर    रहे    हैं ।’’

ख़त  में  माँगों  का  कोई  उल्लेख  नहीं  था ।  ऑफिस  के  निकट  किसी  के  पैरों की   आहट   सुनाई   दी   तो   रामदास   ने   फौरन   मदन   के   हाथों   से   ख़त   छीन   लिया  और    उसे    मेज़    की    दराज    में    छिपा    लिया ।

‘Sir, Please allow me to go.’ मदन ने उठते हुए कहा और इजाज़त की    राह    न    देखते    हुए    वहाँ    से    बाहर    निकल    गया ।

Courtsey: storymirror.com

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Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.
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Navneet Bakshi
1 year ago

उस दिन से ‘तलवार’ में एक ही चर्चा शुरू हो गई । महायुद्ध के कारण हुए  खर्च  से  इंग्लैंड  कंगाल  हो  चुका  है|
सुनते तो अब यही हैं कि अंग्रेजो के जाने का मूल कारण यही था, अब श्रेय किस ने लिया और फायदा किस को हुआ, यह सब तो दब के ही रह गई हैं बातें | जब लोगों को main मुद्दे का ही नहीं पता तो बहस हो भी कैसे सकती है | जब मैं चीन में था तो मैंने जाना कि हर दिन हर पल टी.वी. और मिडिया के माध्यम से उन्हें जापानियों के शासन में हुई ज्यादतियों को आज की पीड़ियों को भूलने नहीं दिया | आज भी उनमें जापान से बदला लेने की भावना ज्वाला की तरह भड़क रही है |

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