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वड़वानल – 03

लेखक: राजगुरू द. आगरकर

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

 

उस    दिन    गुरु    ने    मुम्बई    बेस    से    आए    हुए    दो    सन्देश    देखे    और    उसका    माथा    ठनका। पहला   सन्देश   था –

”Ten officers arriving by Bombay Central Mail. Request arrange reception.”

दूसरा    सन्देश    था –

”Five Ratings despatched by train.”

‘कहते हैं Ratings Despatched –  अरे     डिस्पैच     करने     के     लिए     सैनिक     यानी कोई    निर्जीव    चीज    है    क्या ?    और    रेटिंग्ज    के    स्थान    पर    क्या    वे    सेलर्स    अथवा    सोल्जर्स नहीं कह सकते ?’’ गुरु मिश्रा से पूछ रहा था । उसके शब्दों से गुस्सा टपक रहा था ।

‘‘इतने परेशान न हो । नये हो । बहुत कुछ सहन करना होगा । बहुत कुछ समझना  होगा ।  Muster by open list याद  करो ।’’

हर   तीन   महीनों   में   जहाजों   पर   और   बेस   पर Muster by open list होती   थी ।   गुरु   को   ट्रेनिंग   के   दौरान   लिये   गए Muster by open list  की   याद आई ।

31 दिसम्बर का दिन था । बेस के सारे सैनिक Muster by open list की  तैयारी  कर  रहे  थे   ।  बैरेक  में  हर  सैनिक  शीशे  के  सामने  खड़ा  होकर  चीफ द्वारा कल सिखाई गई कसरत की प्रैक्टिस कर रहा था । आईने से पूछ रहा था.

‘‘Am I dressed correctly?’’ और  यूँ  ही  अपनी  कैप  ठीकठाक  कर  रहा  था । कैप  के  रिबन  पर  यदि  ‘ब्लैको’  का  तिल  जितना  दाग  भी  पड़ा  हो  तो  उसे  थूक लगाकर   साफ   कर   रहा   था ।   जूते   साफ   कर   रहा   था ।   हरेक के मन में एक ही डर  था – चीफ  या  डिवीजन  अफसर  कोई  गलती  न  निकाल  दे,  वरना  भूखे  पेट, पैर    टूटने    तक    परेड    ग्राउण्ड    के    चक्कर    लगाने    पड़ेंगे ।

आठ के घण्टे पर ‘Clear lower decks’ का आदेश हुआ और सैनिक परेड ग्राउण्ड पर इकट्ठे हो गए।                      ‘muster by open list’ आरम्भ हो गई ।

‘‘ऑफिशियल नम्बर 5986 ।’’

‘‘ऑफिशियल   नम्बर   5987’’   डिवीजन   पेट्टी   अफसर   एक–एक   नंबर   पुकार रहा    था । बुलाया  गया   सैनिक   आगे   आता ।   डिवीजन   ऑफिसर   के   सामने   खड़ा   होता । सैल्यूट   करके   बाएँ   हाथ   में   आइडेन्टिटी   कार्ड   पकड़कर   आगे   पकड़कर   अपना   नाम, ऑफिशियल    नम्बर    रैंक, मांसाहारी है अथवा शाकाहारी,   यह बता रहा था,  डिवीजन ऑफिसर अपने हाथ की लिस्ट से मिलान करके उस पर ये जानकारी सही होने का निशान बनाता । यदि कोई सैनिक जवाब देते हुए लड़खड़ाता, सीधा न खड़ा

होता,  उसका  सैल्यूट  गलत  हो  जाता  या  जानकारी  देने  का  क्रम  गलत  हो  जाता तो   डिवीजन   ऑफिसर   गुस्सा   होता ।   शिकारी   भेड़िये   जैसा   ताक   में   बैठा   गोरा   नेवल पुलिस   वापस   लौटने   वाले   सैनिक   को   बुलाकर   कहता – ”Two rounds of the Parade Ground.”

इस    दण्ड    के    पीछे    बस    ‘नेवल    पुलिस    की    इच्छा’    होती    थी ।

गुरु    को    इस    पूरी    हरकत    पर    बहुत    गुस्सा    आ    रहा    था ।

‘ये सब किसलिए ? क्या हम कैदी हैं ?’’ वह अपने आपसे ही सवाल पूछ रहा था ।

‘‘हिन्दुस्तानी सैनिकों को उनकी गुलामी की याद दिलाने के लिए या गुलामों के दिलों पर अपना श्रेष्ठत्व थोपने के लिए ?’’

“तुझे याद है, तूने एक हिन्दुस्तानी चीफ’ से पूछा था ? उसका जवाब सही लगा था तुझे ? बोला था वह कि अपने सैनिकों का डिवीजन ऑफिसर से परिचय हो जाए, इसलिए ये सारा नाटक, अरे, परिचय होना चाहिए दिलों से । मगर ये गोरे ऐसा कभी करते ही नहीं।” मिश्रा गुस्से से कह रहा था ।

 

 

‘क्लाईव’ पर दो साल युद्ध की दौड़–धूप में ही गुजरे । कभी व्यापारी जहाजों के बेड़े के सुरक्षा दल के साथ जाना पड़ता, कभी बन्दरगाह की सुरक्षा के लिए बन्दरगाह के मुहाने पर सुरंग बिछानी पड़ती, तो कभी जल–सुरंग निकालने का काम करना पड़ता । लाल सागर से सुदूर बंगाल की खाड़ी तक जहाजों का आवागमन हमेशा जारी रहता । र्इंधन, पानी, खाद्यान्न सभी की आपूर्ति समुद्र में ही की जाती थी ।

कभी–कभी छोटी–मोटी दुरुस्ती के लिए जहाज़  एकाध दिन के लिए बन्दरगाह में आता तो सभी त्योहार जैसा आनन्द मनाते । हरेक सैनिक अधिकाधिक समय बाहर गुजारने की कोशिश करता, रोज–रोज उन्हीं चेहरों को देख–देखकर उकताए हुए सैनिक नयनसुख लूटते, फ्लीट–क्लब का बार गूँज उठता, तवायफें परेशान हो जातीं, मगर खूब पैसा कमाकर ले जातीं । कल के दिन का भरोसा न करने वाले सैनिक हाथ आए दिन का एक–एक क्षण पूरा–पूरा भोगते और इन्हीं क्षणों की यादों में समुद्र के आगामी दिन गुजारते ।

दोपहर को तीन बजे रेडक्रॉस से भेजी गई भेंट वस्तुएँ फॉक्सल पर बाँटी जाने वाली थीं । मुफ्त में मिलने वाली इन चीजों के लिए काफ़ी सैनिक फॉक्सल पर इकट्ठा हो गए । गुरु और मिश्रा भी फॉक्सल पर आए ।

‘‘यहाँ तो सिर्फ हिन्दुस्तानी सैनिक हैं । गोरे सिपाही…’’ गुरु मिश्रा से पूछ रहा था – ‘‘वे क्यों आएँगे यहाँ ? उनके पैकेट उनके मेस में पहुँचा दिये गए होंगे ।’’

फॉक्सल पर गहमागहमी का वातावरण था । क्या–क्या चीजें हो सकती हैं, हमें किस चीज की जरूरत है, इस बात पर चर्चा हो रही थी ।

”I want pin drop silence. Come on., Sit down in a single line.” चीफ रॉड्रिक चिल्ला रहा था । वह अपने साथ भेंट वस्तुओं का एक बोरा लाया था ।

चीफ के चिल्लाने से फॉक्सल पर थोड़ी–बहुत खामोशी हुई । मगर हर कोई आगे आने की कोशिश कर रहा था।

”You bloody beggars sit down first…” गालियाँ देते हुए वह सैनिकों को शान्त करने की कोशिश कर रहा था।

”Hey you! Come on sit down here.” गुरु और मिश्रा की ओर देखते हुए चीफ चिल्लाया – ‘‘हमें नहीं चाहिए वे चीजें ।’’

”Then get lost from here.”

गुरु और मिश्रा उसकी नजर बचाकर वहीं मँडराते रहे, सैनिकों के शान्त हो जाने के बाद चीफ ने अपने साथ आए सिपाहियों की सहायता से वितरण आरम्भ किया, पोस्टकार्ड्स पुराने ताशों की गड्डियाँ, टूथ पेस्ट, ब्रश, बूट पॉलिश ऐसी छोटी–छोटी चीजें बाँटी गर्इं ।

‘‘दे दान, छुटे गिरान!’’ गुरु के कानों में शब्द गूँज रहे थे ।

 

गुरु के तबादले का आदेश आया और गुरु खुश हो गया, रोज–रोज की सेलिंग, कबूतरख़ाने जैसी मेस, शुद्ध हवा के भी लाले, अपर्याप्त भोजन, रोज–रोज वे ही खरबूजे जैसे चेहरे और वही उकताहटभरी बातचीत । ये सब अब खत्म होने वाला था, जी भर के खुली हवा का आनन्द मिलने वाला था । देश में क्या चल रहा है इसकी जानकारी मिलने वाली थी । कोचिन के HMIS वेंदूरथी में जाने को मिलेगा इसलिए गुरु खुश था ।

नया जोश और खुली हवा में जीने की अदम्य इच्छा लिये गुरु ने वेंदूरथी पर प्रवेश किया । मगर तलवार और वेंदुरथी के हालात में जरा भी फर्क नहीं था । नये भर्ती हुए रंगरूटों के रेले के सामने पुरानी बैरेक्स अपर्याप्त प्रतीत हो रही थीं । नये बैरेक्स का निर्माण हो नहीं रहा था । परिणामस्वरूप बैरेक्स के बाहर भी पास–पास खाटें बिछाई गई थीं । दो खाटों के बीच इतनी कम जगह थी कि पैर लटकाकर एक–दूसरे के सामने बैठना भी सम्भव नहीं था । पपड़ी पड़ी बैरेक की दीवारें ऐसी लगतीं जैसे किसी कुष्ठ रोगी का चेहरा हो । बाथरूम, शौचालय भी अपर्याप्त थे और वे बदहाल थे । हाँ, ‘ऑफ वाच’ होने पर शहर में खूब घूम–फिर सकते थे ।

‘‘एक तार भेजने के लिए मैं गोरों की बैरेक में गया था,’’ गुरु यादव से कह रहा था – ‘‘क्या ठाठ हैं रे उनके! हर डॉर्मेटरी में बस चार–चार कॉट्स । हर कॉट के पास साढ़े चार फुट की अलमारी । कॉट्स के बीच में इतनी खाली जगह कि आराम से कबड्डी खेल लो । चारों के लिए एक मेज़, चार कुर्सियाँ, एक छोटा–सा रेडियो, दीवारों पर सफेद रंग और खूबसूरत प्राकृतिक दृश्य, सुन्दर औरतों की तस्वीरें भी थीं । मज़ा है उनकी!’’

‘‘अरे, तूने उनकी रिक्रीएशन रूम तो देखी ही नहीं है । कैरेम बोर्ड है, अखबार आते हैं, पत्रिकाएँ होती हैं । हर बैरेक के सामने हरा–भरा लॉन । लॉन के किनारे रंग–बिरंगे फूलों की क्यारियाँ । बड़ा प्रसन्न वातावरण होता है ।’’ गोरों की बैरेक्स का उत्साह से वर्णन करने वाला यादव रुक गया । उसके चेहरे के भावों में अचानक परिवर्तन हुआ और चिढ़कर वह आगे बोला, ‘‘तुझे मालूम है, बैरेक का सफ़ेद रंग, सामने वाली लॉन, फूलों की क्यारियाँ – ये सब हिन्दुस्तानी सिपाहियों की मेहनत से ही बनाया गया है । मरें हम और लुत्फ’ उठाएँ ये गोरे।’’

‘‘उसके लिए अच्छी किस्मत लानी पड़ती है,’’ गुरु ने कहा।

‘‘गलत कह रहे हो । किस्मत बनानी पड़ती है और यह हमारे हाथों में है । अरे, अगर हम सब एक होकर थूक भी दें तो ये सारे अंग्रेज उस थूक के सैलाब में बह जाएँगे । मगर इसके लिए हमें एकजुट होना पड़ेगा ।’’

Courtsey: storymirror.com

 

 

 

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Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.
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Navneet Bakshi
1 year ago

संदेशों की शैली में तो अब भी कोई परिवर्तन नहीं आया और Rank Differentiation तो होती ही है ,सब जगह होती है | हाँ इतना ज़रूर है कि उस वक्त गुलाम होने के कारण यह भेदभाव ज्यादा देखने को मिलता था | मुझे तो राजगुरू द. आगरकर की लेखन शक्ति पर अचम्भा होता है, माना कि उन्होंने नेवी में नौकरी की थी मगर फिर भी मेरे विचार से कहानी के सारे पात्र तो काल्पनिक ही हैं | पर इतना सटीक चित्रण !! दुर्भाग्य की बात है कि हमारे देश में हिंदी और प्रादेशिक भाषाओँ में रचे साहित्य को पढ़ने वाले नाम-मात्र ही हैं | मेरा यह मानना है की इसका discredit कांग्रेस की सत्तर साल के शासन में अपनायी गयी नीतियों को ही दिया जाना चाहिए | अंग्रेजी को बढ़ावा देना चाहे गलत नहीं था लेकिन, अपने देश की अन्य भाषाओँ को नकारना बहुत गलत था | अब सम्पूर विश्व में शायद भारत ही इकलौता देश है जिस की एक संपन्न संस्कृति होते हुए भी एक सशक्त, सर्वमान्य भाषा नहीं है जिस पर नाज़ तो न सही, जिसे कम से कम सारा देश गर्व से स्वीकारे तो सही |

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