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वड़वानल – 12

लेखक: राजगुरू द. आगरकर

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

 

गुरु   को   भी   यही   प्रश्न   सता   रहा   था ।   यूँ   ही   वह   आठ–दस   फुट   दूर   पड़े पत्थर  पर  छोटे–छोटे  कंकड़  मार  रहा  था ।  कुछ  कंकड़  उस  पत्थर  को  लग  जाते, कुछ उसके आसपास गिर जाते । गुरु की धुन में मदन भी उस पत्थर पर कंकड मारने    लगा ।

‘‘अरे,      जवाब मिल गया । देख,  कितने कंकड़ जमा हो गए हैं ।’’      गुरु करीब–करीब   चीखा ।   ‘‘यहाँ   निष्क्रिय   पड़े   कंकड़ों   को   हमने   सक्रिय   किया,   यह   कैसे सम्भव    हुआ ?’’

‘‘इसमें   क्या   खास   बात   है ?’’

‘‘हम इन  कंकड़ों  को  जमा  करने  के  उद्देश्य  से  नहीं  फेंक  रहे  थे ।  हमारा उद्देश्य  था बड़े पत्थर    पर    कंकड़    मारना ।    उसी    तरह    सभी    सैनिकों    को    इकट्ठा करने  के  लिए  ऐसा  ही  कोई  सामान्य  उद्दिष्ट  अथवा  कारण  सामने  रखना  होगा ।’’

गुरु  को  पहले  स्वतन्त्रता  संग्राम  का  इतिहास  याद  आया ।  ‘‘1857  के  विद्रोह  में कारतूसों   पर   लगाई   गई   गाय   की   चर्बी   का   सवाल   था ।   आज   रहने   के   लिए   जगह…भोजन…   तनख्वाह… बर्ताव… सुविधाएँ – ये समस्याएँ सभी की   हैं ।   सबको   इकट्ठा लाने    वाले    ये    ही    प्रश्न    होंगे ।’’

‘‘सही   है ।   हम   अपनी   आम,   साधारण   समस्याओं   पर   प्रकाश   डालते   हुए सैनिकों  को  एकत्रित  करेंगे;  विद्रोह  भी  करेंगे,  मगर  अंग्रेज़  ऐसा  प्रचार  करेंगे  कि यह  बगावत  सैनिकों  ने  अपनी  व्यक्तिगत  समस्याओं  के  लिए  की  है ।  और  जब समूचा  देश  एक  महत्त्वपूर्ण  समस्या  पर  संघर्ष  कर  रहा  है  तब  ये  स्वार्थी  सैनिक दो     ग्रास     ज्यादा     पाने     के     लिए     लड़     रहे     हैं,     ऐसा     दोषारोपण भी हम पर किया जाएगा ।’’ मदन   ने   सन्देह   व्यक्त   किया ।

‘‘तेरी     बात     बिलकुल     सही     है,     मगर     फिर     भी     संगठन     तो     हमें     करना     ही     चाहिए । बग़ावत  भी  करनी  ही  होगी ।  हम  जानते  हैं  कि  हम  यह  क्यों  कर  रहे  हैं,  हमारा उद्देश्य  क्या  है;  फिर  हम  दोषारोपण  की  परवाह  क्यों  करें ?’’  गुरु  ने  बेफिक्री से कहा ।

‘‘कल   ही   मैं   दत्त   को   खत   लिखकर   अपनी   योजना   के   बारे   में   बताता   हूँ और    हमारे साथ पत्र व्यवहार के लिए एक अलग पता भी देता हूँ ।’’

 

 

 

‘तलवार’   में   कई   पुराने   दोस्त   एकत्रित   हो   गए   थे । युद्ध के अनुभव सुनाए   जा रहे थे । कुछ   लोगों   ने   आज़ाद हिन्द फ़ौज   के   सैनिकों   और   उनके   अधिकारियों से मुलाकात की थी । कई लोग उनके कर्तव्य को देखकर मन्त्रमुग्ध हो गए थे ।

फौज  के  जवानों  के  बारे  में  सम्मानपूर्वक  बातें  करते ।  मदन  तथा  गुरु  बड़ी  शान्ति से इस चर्चा को सुनते और मन ही मन इन घटनाओं तथा घटनाएँ सुनाने वालों की  फेहरिस्त  बनाते ।  दोनों  ही  समझ  गए  थे  कि  अनेक  सैनिकों  के  मन  में  अंग्रेज़ों के प्रति गुस्सा है;  मगर इसके कारण भिन्न हैं ।

आजकल मदन,     गुरु और ‘तलवार’     पर नया आया हुआ दास अक्सर कैन्टीन में   ही   रहते ।   कैन्टीन   के   कोने   की   एक   मेज़ पर वे  बैठे   रहते ।   बैरेक्स   में   गप्पें   मारते हुए  यदि  उन्हें  कोई  व्यक्ति  उनके  गुट  में  शामिल  होने  योग्य  प्रतीत  होता  तो  वे उसे  यूँ  ही  कैन्टीन  में  बुलाते  और  उसके  साथ  अंग्रेज़ों  के  अत्याचार,  हिन्दुस्तानी सैनिकों  के  साथ  किए  जा  रहे  बर्ताव,  अन्याय  आदि  पर  अपने  अनुभव  सुनाते। उनके अनुभव  सुनते,  बीच  में  ही  यदि  कोई  अंग्रेज़ों  की  तरफदारी  करता,  तो ये दोनों उस पर टूट पड़ते । कैन्टीन में उनके साथ आए हुए सैनिक की प्रतिक्रिया. उसकी   बातों   से   प्रकट   हो   रहा   अंग्रेज़ों   के   प्रति   गुस्सा,   आजादी   के   प्रति   उसकी ललक  का  अनुमान  लगाते  और  तभी  उसे  अपने  गुट  में  शामिल  करते ।  इन  नये लोगों  को  अपने  गुट  में  मिलाने  की  धुन  में  तीनों  अपनी  टुटपूँजी  आय  का  एक बड़ा    हिस्सा    चाय,    सिगरेट,    शराब    आदि    पर    खर्च    करते ।

इस   मार्ग   से   साथियों   को   ढूँढ़ना   बड़ा   खतरनाक   काम   था   और   उनकी   संख्या भी  बहुत धीरे–धीरे  बढ़  रही  थी  यह  बात  भी  तीनों  अच्छी  तरह  समझ  गए  थे ।

‘‘आज   तक,   पिछले   पन्द्रह   दिनों   में,   रोज   करीब   दो–दो रुपये   खर्च   करके हम    केवल    पाँच    ही समविचारी साथी जुटा    सके    हैं ।    मेरा    ख़याल    है    कि    यह    उपलब्धि बहुत    छोटी    है    और    बहुत    वक्त    खाने    वाली    भी    है!’’    गुरु    शिकायती    लहजे    में    बोला ।

‘‘इसके   अलावा   बोस   जैसी   कोई   एक   मछली   जाल   समेत   हमें   भी   ले   जा सकती   है,” मदन बोला।

‘‘सही है । उस दिन हम सावधान थे, ये तो ठीक रहा, वरना मुसीबत हो जाती ।  शुरू  में  तो  बोस  हमारी  हाँ  में  हाँ  मिलाता  रहा,  मगर  जब  गुरु  उसे  परखने के   लिए   अंग्रेज़ों   की   तरफ   से   बोलने   लगा,   वैसे   ही   उस   बहादुर   ने   अपना   फ़न निकाला  और  हमें  ही  धमकाने  लगा ।  नेवी  में  कुछ  क्रान्तिकारी  घुस  गए  हैं,  उनके चक्कर   में   तुम   लोग   न   पड़ना!   वरना   नतीजा   अच्छा   नहीं   होगा ।’’   दास   ने   याद दिलाया ।

‘‘फिर,    अब    क्या    करना    चाहिए ?’’    गुरु    ने    पूछा ।

और  फिर  बड़ी  देर  तक  वे  इस  प्रश्न  पर  चर्चा  करते  रहे  कि  साथीदार  कैसे जुटाए जाएँ । मगर योग्य    मार्ग    सूझ    नहीं    रहा    था ।

‘‘यदि   हम   गुस्सा   दिलाने   वाली   चीजों   के   बारे   में   बार–बार   बोलते   रहें   तो कैसा रहेगा दास ?’’

‘‘गुलामों को उन पर किये जा रहे अन्याय का एहसास दिला दो तब वो बगावत कर देंगे । बाबा साहेब अम्बेडकर ने कहा था, पर यह एहसास जिन्हें है,  वे  उन  लोगों  को  कैसे  एहसास  दिला  पाएँगे ?’’  गुरु  फिर  से  सोच  में  डूब  गया ।

‘‘उनके  सामने  अन्याय  के  बारे  में,  खाने  के  बारे  में  बोलते  रहो ।  आज  नहीं तो   कल   उन्हें   अन्याय   का   एहसास   हो   ही   जाएगा।’’   मदन   का   यह   विचार   गुरु तथा    दास    को    पसन्द    आ    गया ।

दूसरे   दिन   से   उन्होंने   यह   काम   शुरू   कर   दिया ।   खाना   खाते   समय   या   नाश्ता करते   समय   वे   अलग–अलग   मेजों   पर   बैठते   और   अपना   काम   शुरू   कर   देते,   ‘‘क्या मटन   है!   मटन   का   एक   भी   टुकड़ा   नहीं ।’’

‘‘मटन  तो  गोरे  खाते  हैं  और  हमारे  सामने  कुत्तों  को  डालते  हैं  वैसी  हड्डिया फेंकते    हैं ।’’    दूसरी    मेज़    से    जवाब    आता ।

‘‘यूरेका!    यूरेका!!’’    कोई    एक    चिल्लाता ।

‘‘नाच    क्यों    रहा    है    रे ?’’

‘‘दाल में दाल का एक दाना मिल गया!’’     ब्रेड में से कीड़े निकाल–निकालकर मेज   पर   उन्हें   सजाते   हुए   ज़ोर से चिल्लाकर   सैनिक   एक–दूसरे   को   कीड़ों   की   संख्या बताते ।  जिसे  ज्यादा  कीड़े  मिलते  उसका  वहीं  पर  सत्कार  किया  जाता – कोई  फूल देकर ।  किसी  दिन  भोजन  यदि  बिलकुल  ही  बेस्वाद  हो  तो  खाने  की  थाली  मेज पर    उलटकर    गालियाँ    देते    हुए    निकल    जाते ।

एक  रात  सबकी  नजरें  बचाकर एक  व्यंग्य  चित्र  बैरेक  की  दर्शनीय  दीवार पर    लगाया    गया ।

एक  बड़े  भगोने  में  एक  सैनिक  ने  इतना  गहरे  मुँह  घुसाया  था  कि  उसके सिर्फ  पैर  ही  ऊपर  दिखाई  दे  रहे  थे ।  पास  ही  में  खड़ा  हुआ  गोरा  सैनिक  उससे पूछ   रहा   था,   ”Hey, you bloody blacky, what are you doing?”

दाल    में    से    एकमात्र दाल का    दाना…’’    उसने    जवाब    दिया    था ।

अनेक हिन्दी सैनिकों   ने   उसे   देखा   और   गोरों की   नजर   पड़ने   तक   वह   व्यंग्य चित्र दीवार    पर    ही    रहा ।

वे  रोज  नयी–नयी  तरकीबें  लड़ाते ।  मदन  एक  दिन  बेस  कमाण्डर  के  बेस में  घूम  रहे  कुत्ते  को  बिस्किट  का  लालच  दिखाकर  मेस में  ले  आया  और  उसके सामने    उस    दिन    परोसे    गए    मटन    के    शोरबे    का    बाउल    रखा ।    रोज    बकरे    और    मुर्गियाँ खा–खाकर हट्टे–कट्टे,    मोटे–ताजे    हो    गए    कुत्ते    ने    उस    शोरबे    को    मुँह    भी    नही लगाया ।    मदन    सबसे    कहने    लगा ।

‘‘हमें   जो   खाना   दिया   जाता   है   उसे   तो   गोरों के   कुत्ते   तक   मुँह   नहीं   लगाते ।’’

ये   सारी   बातें   सच   थीं ।   बार–बार   जब   उन्हें   दुहराया   जाने   लगा   तो   वे   सैनिकों के    मन    में    काँटे    जैसी    चुभ    गर्इं ।    सैनिक    अस्वस्थ    हो    रहे    थे ।

 

 

 

जब    कराची    से    लीडिंग    टेलिग्राफिस्ट    खान    तबादले    पर    ‘तलवार’    में    आया    उस    समय मदन,   गुरु   और   यादव   सैनिकों   के   मन   में   अंग्रेज़ी   हुकूमत   के   खिलाफ   गुस्सा   दिलाने की   जी–जान   से   कोशिश   कर   रहे   थे ।   गोरा–गोरा   तीखी   नाक   वाला   खान   पहली ही  नजर  में  प्रभावित  करने  वाला  था ।  खान  ने  ‘तलवार’  पर  पहुँचने  के  बाद  मदन और  गुरु  के बारे  में पूछताछ  की  और  उन्हें  आर. के.  का  खत  दिया ।  उस  खत से मदन और गुरु को पता चला कि खान क्रान्तिकारियों में से ही एक था और अंग्रेज़ों    को    हिन्दुस्तान    से    भगाने    के    लिए    कुछ    भी    कर    गुजरने    को    तैयार    था ।

‘‘बोलो,  भाई,  कराची  की  क्या  हालत है? ’’  पहचान  होने  पर  गुरु  ने  खान से पूछा ।

‘‘सैनिक    अंग्रेज़ों    से    चिढ़े    हुए    हैं,    परन्तु    अभी    वे    इकट्ठा    नहीं    हुए    हैं, इसलिए उनमें  आत्मविश्वास  नहीं  है ।  मगर  आर. के.  के  आने  के  बाद  वे  इकट्ठा  होने  लगे हैं ।’’    खान    कराची    की    स्थिति    का    वर्णन    कर    रहा    था ।

‘‘कुल  मिलाकर  कराची  में  भी  परिस्थिति  विस्फोटक  हो  रही  है ।  मदन  के चेहरे    की    प्रसन्नता उसके    शब्दों    में    भी    उतर    रही    थी ।’’

‘‘बीच    ही    में    कभी    कोई    सैनिक    जल्दबाज़ी कर    बैठता    है    और    सारा    वातावरण बदल   जाता   है ।   उसे   फिर   से   वापस   पहली   स्थिति   में   लाने   में   टाइम   लग   जाता है।’’    खान    ने    अपना    रोना    रोया ।

‘‘मतलब,    ऐसा क्या  हुआ था ?’’    गुरु    ने    उत्सुकता    से    पूछा ।

‘‘तुम   एबल   सीमन   शाहनवाज   को   जानते   हो ?’’   खान   ने   पूछा ।   तीनों   ने इनकार    में    सिर    हिला    दिया ।

‘‘है तो ईमानदार,   मगर   गरम   दिमाग   वाला,   अंग्रेज़ों   से   नफरत   करने   वाला। कई  बार  उसे  समझाया  कि  गुस्सा  करना  छोड़  दे ।  इससे  न  सिर्फ  तेरा  बल्कि  औरों का भी नुकसान होगा,    और    परसों    हुआ    भी    ऐसा    ही ।’’

तीनों    के    चेहरों    पर    उत्सुकता    थी ।

कैप्टेन्स   डिवीजन   के   लिए   शिप्स   कम्पनी   फॉलिन   हो   गई   थी ।   कलर्स   के लिए  आठ  घण्टे  बजाए  गए ।  बैंड  की  ताल  पर  व्हाइट  एन्साइन  मास्ट  पर  चढ़ाई गई ।   कैप्टेन   सैम   ने   हर   डिवीजन   का   निरीक्षण   आरम्भ   किया ।   शाहनवाज   कुछ फुसफुसा  रहा  था,  बीच–बीच  में  हँस  भी  रहा  था ।  प्लैटून  कमाण्डर  का  इस  ओर ध्यान    गया    तो    वह    अपनी    जगह    से    ही    चिल्लाया । ”Shut up you, bloody bastards. Navy does not need your bloody opinion. Navy damn well expects you to obey bloody orders. I am here to knock some discipline in your empty rotten heads. let that bloody son of a bitch come forward and speak up.”

‘‘शाहनवाज  खामोशी  से  एक  कदम  आगे  आकर  फॉलिन  से  बाहर  आया और    गोरे    प्लैटून    लीडर    के    सामने    खड़ा    हो    गया ।

”Yeah, I was talking.”

”You bloody bastard, Join the fall in and report to me after Division. I shall teaeh you a good lesson. गोरा   प्लैटून   कमाण्डर   चीखा ।

”Don’t use obscene language. Mind your tongue.” शहनवाज को गुस्सा    आ    गया    था ।

”Come on, Join the Fall in.”

शाहनवाज     प्लैटून     कमाण्डर     पर     झपट     पड़ा     और     आगा–पीछा     सोचे     बिना     उसने प्लैटून     कमाण्डर     पर     घूँसे  बरसाना     शुरू     कर     दिया ।     सामने     की     गोरी     प्लैटून     के     दो–चार सैनिक बीच–बचाव करते हुए शाहनवाज पर लातें बरसाने लगे । उन्होंने उसे तब तक  मारा  जब  तक  वह  बेहोश  नहीं  हो  गया ।  शाहनवाज  को  कैप्टेन  के  सामने खड़ा   किया   गया ।   कैप्टेन   ने   विभिन्न   आरोप   लगाते   हुए   चार   महीनों   की   कड़ी सज़ा   सुना   दी ।

गुरु    और    मदन    यह    सुनकर    पलभर    के    लिए    सुन्न    हो    गए ।

‘‘आर. के. ने आपको एक सन्देश भेजा है । शाहनवाज जैसा उतावलापन न  करना । इससे हमारे कार्य को हानि   पहुँचेगी ।

Courtsey: storymirror.com

 

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Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.
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Navneet Bakshi
9 months ago

वैसे यह कहना तो सही नहीं होगा कि शाहनवाज़ जैसे और भी होने चाहिए होगे क्योंकि बातें करनी तो बहुत आसान हैं लेकिन मेरा यह मानना है कि अहिंसा के मार्ग को सरहाहना तो बड़ी मिली, लेकिन अंग्रेजों के साथ लड़ाई के लिए इस से और कमज़ोर तरीका नहीं हो सकता था | यह तो हमारी किस्मत कह लो कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजी सरकार की माली हालत कमज़ोर पड़ गई थी वर्ना उनका हिन्दोस्तान छोड़ कर जाने का कोई इरादा तो नहीं था |

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