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मैं अपना प्यार…६

लेखक: धीराविट पी. नागात्थार्न

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

*Amare et sapere vix conceditur (Latin): प्‍यार करना और अकलमन्‍द होना तो भगवान के भी बस में नहीं हैं। प्‍यूबिलियस साइरस (fl.1st Century BC)

छठा दिन

जनवरी १६,१९८२

जितनी ज्‍यादा तुम्‍हारी याद आती है, उतनी ही ज्‍यादा तुम्‍हारी ज़रूरत महसूस होती है।

दिमाग में तुम्‍हारे प्रति नाज़ुक और प्रेमपूर्ण भावनाएँ इस कदर भर गई हैं। एक पल को भी तुम्‍हें भूलने की जुर्रत नहीं कर सकता। मेरे दिल पर तुम पूरी तरह से छा गई हो। अपनी मर्जी से मैं अपने आपको पूरी तरह तुम्‍हें समर्पित करता हूँ। ये है मेरी आज की डायरी की प्रस्‍तावना!

मैं सुबह आठ बजे उठा। कमरे से बाहर निकलने का भी मन नहीं हो रहा था, मैंने रेडियो लगाया, वॉयस ऑफ अमेरिका सुनता रहा ८-४० तक। इस डर से कि ब्रेकफास्‍ट खत्‍म न हो जाये, बाथरूम भागा, फिर होस्‍टेल-मेस, अपना ब्रेकफास्‍ट खाने। दस बजे “Negation in English” (अंग्रेजी में प्रत्‍याख्‍यान) की फोटोकापी करवाई पास की दुकान से .३९ रू० प्रति फोटोकापी के हिसाब से। कितना ज्‍यादा लेते हैं- खून चूस लेते हैं। वापसी में मैं म्‍यूएन के रूम पर रूका लिंग्विस्टिक्‍स की कुछ और किताबें देखने के लिये, जो मेरे शोध-विषय के लिये सहायक हों। कुछ किताबें मेरे काम की हैं। मैं होस्‍टल पहुँचा लंच के लिये और फिर सो गया।

अपने कमरे से उकता कर मैं मैगजि़न-सेक्‍शन गया और वहाँ कुछ घंटे बिताए। काफी फ़ायदेमन्‍द है वे चीजें सीखना जो मैं नहीं जानता हूँ तो, मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि शिक्षा के बिना जिन्‍दगी वैसी ही है जैसे दिमाग के बिना कोई बच्‍चा। ये ऐसी चीजों को इकट्ठा करने जैसा है जिनकी किसी को ज़रूरत नहीं है। दूसरे शब्‍दों में शिक्षा और जिन्‍दगी को ‘‘एक ही’’ समझना चाहिए। इन्‍हें अलग नहीं किया जा सकता, मगर इनका समन्‍वय करके जिन्‍दगी को काबिले बर्दाश्‍त और खुशनुमा बनाया जा सकता है। ‘‘मोन्‍टेग्‍यू की व्‍याकरण में प्रत्‍याख्‍यान और अस्‍वीकृति’’ नामक लेख (ले० हेपलमेन) ने दिमाग पर काफ़ी जोर डाला। शैली की दृष्टि से काफि प्रतीकात्‍मक है। मैं इसका सिर-पैर भी नही समझ पाया, मगर मैं पढ़ता रहा, यह सोचकर कि ‘कुछ भी नहीं होने से थोडा-बहुत होना बेहतर है।’ ५-३० बजे मैंने पढ़ना खत्‍म किया और यूनिवर्सिटि-स्ट्रीट से होकर वापस होस्‍टल आया।

यूनिवर्सिटी-पोस्‍ट ऑफिस में रूका कुछ एरोग्राम्‍स लेने के लिये। क्‍लर्क बोला, ‘‘स्‍टॉक नहीं है।’’ बगैर कुछ कहे मैं मुड़ा और चल पडा। वापस होस्‍टल में – ६-३० बजे। जब मैं कमरे में घुसा तो प्रयून और सोमार्ट के बीच कोई ‘रोमान्टिक बहस’ हो रही थी। मैं भी बहस में शामिल हो गया मगर उसे आखिर तक नहीं ले जा सका, क्‍योंकि भगवान ने इस विषय की जानकारी मुझे नहीं दी है।

आज की खास घटनाऍ ये थीः

१.       श्रीमति इन्दिरा गाँधी ने अपनी कैबिनेट में फेर-बदल कियेः

वेंकटरामन को रक्षा मन्‍त्री बनाया गया, वित्‍त-विभाग मुखर्जी को, जे०एन० कौशल को – विधि विभाग, और बारोट, चन्‍द्राकार और वेंकट रेड्डी की छुट्टी कर दी गई (दि स्‍टेट्समेन, दिल्‍ली, शनिवार, जनवरी १६,१९८२)।

२.       हॉलेण्‍ड से एल० जेन्‍सन का पत्र मिला। वह मेरी मानी हुई बहन जैसी है, जब से हम बैंकोक में मिले थे, चार साल पहले। पत्र का सारांश हैः ध्‍यान और चिन्‍ता, ढेरों शुभकामनाएँ और गर्मजोशी भरा नमस्‍कार।

३.       आज का मौसम सामान्‍य है। स्‍टेट्समेन कहता हैः आसमान मुख्‍यतः साफ रहेगा। दिन में ठंडी हवाएँ चलेंगी। रात का तापमान करीब 50C रहेगा।

नई दिल्‍ली का अधिकतम तापमान (सफदरगंज) शुक्रवार को था 20.40C (68.7F), सामान्‍य से 10C कम और न्‍यूनतम तापमान था 80C (46.40F) सामान्‍य से 10C ऊपर।

अधिकतम आर्द्रता थी – 78% और न्‍यूनतम – 39%। सूर्यास्‍त – 5.47 बजे, कल सूर्योदय ( 7.15 बजे। चाँद आधी रात से पहले नहीं निकलेगाः चाँद अस्‍त होगा 11.47 बजे। कल चाँद का अंतिम सप्‍ताह है। रोशनी 6.17 बजे तक।

देर हो चली है। मुझे तुमसे ‘गुड नाइट’ कहना पड़ेगा, वापसीपर मुलाकात होगी!

ढेर सारा प्‍यार।

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Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.

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