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मैं अपना प्यार – १०

लेखक: धीराविट पी. नागात्थार्न

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

*Nondum amaban, et amare amabam…quaerebam quid amarem, amans amare (Latin): मैं प्‍यार करने नहीं लगा, मगर मुझे प्‍यार करने पर प्‍यार आता है, मैं इंतजार करता हूँ किसी के प्‍यार करने का, प्‍यार करने को प्‍यार करता हूँ – से० अगस्‍टीन AD (354-430)

दसवाँ दिन

जनवरी २०,१९८२

मैं बहुत आहत हूँ, बुरी तरह आहत हूँ। अब तक तुम्‍हारी कोई खबर नहीं आई है। मैं परंशान हूँ। तुम्‍हें हुआ क्‍या है? क्‍या तुम इतनी व्‍यस्‍त हो कि मुझे एक लाईन भी नहीं लिख सकती? मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी भावना को अपने दिल में रखो और उस पर विचार करों। अगर तुम मेरी जगह होतीं, तो तुम्‍हें पता चलता कि मैं भविष्‍य का सामना किस मुश्किल से कर रहा हूँ। मुझे बहुत तकलीफ होती है, मेरी जान। तुम एक नई चीज हो गई हो मेरी जिन्‍दगी में जिसके बिना मेरा काम नहीं चलता। क्‍या तुमने इस बारे में कभी सोचा है? तुम्‍हारे बिना जिन्‍दगी की कल्‍पना भी नहीं कर सकता। तुम्‍हारे बगैर तो मैं अपनी जिन्‍दगी की हर आकांक्षा को छोड़ दूँगा। याद रखो कि ‘‘एकता हमारी शक्ति है, विभाजन हमारी निर्बलता!’’

ठीक है, बहुत हो गया। मैं वापस अपनी दिल्‍ली की जिन्‍दगी पर आता हूँ।

आज कोई अखबार नहीं आया। यह कल की ऑल इंडिया हड़ताल का अप्रिय नतीजा है। धन्‍यवाद, भारतीय लोकतन्‍त्र! सुबह मैं काफी व्‍यस्‍त रहाः उठा, नहाया, नाश्‍ता किया, कपड़े धोए और उन्‍हें सुखाया। ये सारे उकताहट भरे काम करने के बाद मैं एक २० पृष्‍ठों का लेख फोटोकॉपी करवाने के लिये निकला।

जब मैं ग्वेयर हॉल के कैन्‍टीन तक पहुँचा, तो चू मेरी ओर साइकिल पर आ रहा था।

‘कहाँ? उसने पूछा’

‘फोटोकॉपी करवाने,’’ मैंने जवाब दिया।

उसने मुझसे अपनी साइकिल पर बैठने को कहा और फोटोकॉपी वाली दुकान तक ले जाने की इच्‍छा जाहिर की। मैं मान गया। जब हम वहाँ पहुँचे, तो बिजली नहीं थी। दुकानदार ने कहा कि मैं एक बजे आकर फोटोकॉपी ले जाऊँ। जब मैं उसकी साइकिल पर बैठ कर वापस आ रहा था तो मैंने सोचाः एक अच्‍छी सैर दूसरी का वादा करती है। मैंने उससे कहा कि साइकिल किंग्‍ज-वे कैम्‍प की ओर ले चले। जिससे हम लंच के लिये ‘पोर्क’ खरीद सकें। किंग्‍ज-वे कैम्‍प के पास वाले ब्रिज पर हमें रेनू मिली जो अपनी टीचर बसन्‍ता से मिलने जा रही थी। उसने हमसे थाई तरीके से ‘नमस्‍ते’ किया। मैंने उसे वुथिपोंग के कमरे पर लंच की दावत दी। उसने स्‍वीक़ति में सिर हिलाया। फिर हमने उससे बिदा ली। मैंने पोर्क के लिय १५रू० दिये हम वुथिपोंग के कमरे पर आए। हमने ‘‘चू’’ को अकेले पकाने के लिये छोड़ दिया और हम वुथिपोंग के क्‍लास से लौटने का इंतजार करने लगे। मैंने अपने हॉस्‍टल में झांका यह देखने के लिये कि कहीं तुम्‍हारी चिट्ठी तो नहीं आई है। (मुझे कितनी उम्‍मीद थी कि तुम्‍हारा खत आएगा)। मगर मुझे बडी निराशा हुई यह देखकर कि मेरे लिये कोई खत नहीं था। मैं इतना उदास हो गया, अपने आप को ढाढ़स बंधाने की भी ताकत नहीं रही। तुमने मुझे छोड दिया! तुमने मुझे फेंक दिया! अपनी निराशा से दूर भागने के लिये मैंने प्राचक को मेरे साथ पिंग-पाँग खेलने के लिये कहा। प्राचक ने अपने हॉस्‍टल में खाना खाया, मैंने वुथिपोंग, चू और ओने के साथ खाया। रेणु नहीं आई। हम उसे याद करते रहे मगर इस बारे में कुछ कर नहीं सके। मुझसे पूछना मत, प्‍लीज, कि लंच के समय मुझे तुम्‍हारी याद आई या नहीं, जा़हिर है कि जब हम बढि़या लंच करते हैं तो तुम्‍हारी याद आती ही है। यह तो मालूम ही है। समझाने की ज़रूरत नहीं है। ठीक है? लंच के बाद ओने और चू ग्‍वेयर हॉल गए टयूटोरियल्‍स के लिये। मैं और वुथिपोंग कमरे में ही रहे। किसी टूटे हुए दिल वाले के लिये खामोशी एक खतरनाक हथियार होता है। इस बात को ध्‍यान में रखते हुए मैंने उसके साथ बात-चीत शुरू कर दी। हमारी बात-चीत कुछ गपशप जैसी ही थी। हमेशा की तरह मैंने वुथिपोंग को उसके दिल का दर्द ऊँडेलने दिया और उसकी समस्‍या का कोई हल सोचने लगा। मैं पूरे ध्‍यान से उसकी बात सुन रहा था और उसकी जिन्‍दगी-या-मौत वाला मामला समझ रहा था। चू बीच में टपक पडा़, वह कोई चीज़ लेने आया था, जो वह भूल गया था। उसकी यह दखलन्‍दाजी सन्‍देहास्‍पद थी। वुथिपोंग ने अन्‍दाज लगाया कि उसने हमारी गपशप सुन ली है। मैंने इस ओर जरा भी ध्‍यान नहीं दिया, क्‍योंकि मेरे दिल में किसी के भी प्रति बुरी भावना नहीं थी। मैंने भी वुथिपोंग से कहा कि वह फिकर न करे। इसके बाद मैं उसे अपने साथ फोटोकॉपी की दुकान पर घसीट कर ले गया, और वहाँ से होस्‍टेल। सोम्‍मार्ट कमरे में नहीं था। उसकी प्रयून के साथ बूनल्‍यू के कमरे में रोज विशेष टयूशन होती है। हमने कुछ गाने सुने। वुथिपोंग नहाया और फिर कमरे से गया।

मैं कंबल में दुबक कर तीन घंटे सोया। यह नींद दिन भर की परेशानियों पर पर्दा डालने जैसी थी। जब मैं नींद में था तो किसी ने खिड़की पर टक-टक की, मैं अलसाया हुआ था, मैंने उठकर नहीं देखा कि यह कौन था। शाम को 5.30 बजे मैंने अपनी आँखें खोलीं, पहला ही ख़यालः क्‍या तुम्‍हारा खत आया है? मैंने दरवाजे के नीचे देखा। चौकीदार ने भीतर सरकाया होगा, मैंने सोचा। मगर उसका नामो निशान नहीं था। मुझे ऐसा लगा कि मेरी सारी शक्ति निकल गई है। निराशा से मैं अपनी छोटी-सी कॉट से उतरा और अकेलेपन तथा झल्‍लाहट से बचने के लिये कुछ न कुछ करता रहा –डिनर तक अपने आपको व्‍यस्‍त रखा।

चूंकि मैं डिनर पर देर से पहुँचा, इसलिये मुझे चावल नहीं मिला। मैंने तीन चपातियॉ और दाल खाई। सब्‍जी को हाथ भी नहीं लगाया। बस यही मेरा डिनर था। आज की डायरी के बाद लिख रहा हूँ। रात को मैं बस डायरी ही लिखता हूँ, कुछ और करने का मन ही नहीं होता।

मेरे ख़याल बस तुम्‍हारे ही इर्द-गिर्द घूमते हैं। अब, मैं डायरी लिखना बन्‍द कर रहा हूँ। मैं ‘‘सोच रहा हूँ ’’ कि नहा लूँ और कुछ देर तक कुछ बेकार की चीजें पढूँ, फिर सो जाऊँ। उम्‍मीद के बावजूद उम्‍मीद करता हूँ कि तुम जल्‍दी वापस आओगी।

दिल का तमाम प्‍यार!

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Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.

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