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*************मेरी प्रेरणा************

*************मेरी प्रेरणा************
मेरी कल्पना की परी तुम
कि मेरी कल्पना के पर
लुप्त हो जाती हो मुझ में ही कहीं तुम
मेरी कविता को देकर स्वर
प्रिय तुम उभरती हो दिल में फिर
श्वासों में घुल-मिल जाती हो
बनती हो तुम गीत मेरा
फिर स्वयं ही उसको गाती हो
मैं केवल माध्यम बन तुम्हारे
अनूठे प्यार के इज़हार को सराहया करता हूँ
और तुम्हारी रचना को
अपनी रचना कह कर सुनाया करता हूँ
झन्न, झनन, झन्न, झन्न
घुंघरुओं की झंकार मुझे सुनाई देती है
कि तुम मेरे मन के आँगन में चलती हो
मेरी आँखों में तुम्हारे प्रेम की चमक है कि
तुम दीपशिखा बन मेरे मन में जलती हो
घटा सी उमड़ आती है याद तुम्हारी
मेरे उर में कविता फिर अंगडाई लेती है
झाँक देखता हूँ मैं अंतर्मन में तो
मुझे छवि तुम्हारी दिखाई देती है
बरसती हो छम-छम
धूप की बारिश सी
फिर छा जाती हो मेरे नभ पर इन्द्रधनुष बन
तुम्हारी यादों को शब्दों में पिरोता रहूँ हरदम
बस यही कहता है मेरा मन
मैं यादों का पिटारा खोलता हूँ
अपनी प्रेम की किताब का हर पन्ना मैं
फिर दोबारा खोलता हूँ
उठाता हूँ याद का एक-एक मोती
पिरोता हूँ, रोता हूँ, सोचता हूँ
कि हर किसी की प्रेरणा
उससे जुदा तो नहीं होती
कितने होंगे भाग्यशाली वे जो
अपनी प्रेरणा को सीने से लगाते हैं
और चूम कर उसके लबों से
प्रेम-रस की कविता चुराते हैं
प्रेम ही तो गाता है हर उर में
अपने प्रेम की ही तो हर कोई कविता सुनाता है
कोई चुराता है चुम्बनों के रूप में प्रिया के लबों से
और कोई यादों की माला बनाता है
शाम जब आती है सिंदूरी साड़ी पहने
मुझे लगता है तुम आई हो वह बात कहने
जिसे तुम कभी कह नहीं पाई
शाम तो तब भी थी बहुत बार आई
हमारे मिलन के पलों को रंगने
सांझ फिर छेड़ देती है वह राग सारे
जो दिए मुझे तुम्हारे संग ने
वही शाम मुझे कहती है रोज़ आकर
जो तुमने कहा था मुझे संकुचा कर
“मैं जा रही हूँ -(किसी और से ब्याह कर)”
तब तुम्हें पता न था और मुझे भी
कि तुम जाकर भी नहीं जा पाओगी
और शाम कि तरह रोज़ मिलने
मुझे सिन्दूरी साड़ी पहने चली आओगी
चांदनी झाँकती है मेरी खिड़की से शीतल
देखती रहती है मेरी आँखों से बहता जल
पसर जाती है बिस्तर पर जैसे तुम
अलसाई सी, आँखें मूंदे
मेरे सीने पर रखती थी सर
और मैं घंटों तुम्हें सहलाया करता था
तुम्हारे रूप की चाँदनी में नहाया करता था
हूँ, हाँ करती थी तुम, प्रेम का दम भरती थी
और मैं तुम्हारे संग
ज़िन्दगी बिताने के ख्वाब सजाया करता था
मगर चाँद भी यहाँ अपना
भाग्य निर्णय नहीं कर पाता
मैं तो फिर
किस गिनती में हूँ आता
जो यादें छोड़ गई थीं तुम
वो मेरी कवितायेँ हैं
मोती हैं झरते मेरी आँखों से
जिन्हें जग देख नहीं पाता
और मैं बैठा उन मोतियों की
मालाएं रहता हूँ बनाता
सराहना के शोर गुल में
जग संग कुछ मैं भी हूँ मुस्कुराता
तुम वास्तव में मेरा अस्तित्व, मेरा वजूद, मेरी हस्ती हो
जिन्दा हूँ मैं क्योंकि तुम, जान मेरी
मेरी जान बन कर मुझ में बसती हो

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Navneet Bakshi

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