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ग्रीशा

लेखक: अंतोन चेखव
अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

ग्रीशा, छोटा-सा, गुबला-गुबला बच्चा, जो दो साल आठ महीने पहले पैदा हुआ था, पेड़ों वाले गलियारे में अपनी आया के साथ घूम रहा है. उसने रुई वाली लम्बी ड्रेस पहनी है, गर्दन पर स्कार्फ है, बड़ी-सी हैट- रोएँदार बटन वाली – और गरम गलोश पहने हैं. उसका दम घुट रहा है, उसे गर्मी लग रही है, और ऊपर से अप्रैल का दमकता सूरज सीधे आँखों पर मार कर रहा है और पलकों में चुभ रहा है.
उसका पूरा बेढंगा, अविश्वास से सहम-सहमकर चलता हुआ शरीर बेहद फूहड़ लग रहा है. अब तक ग्रीशा को सिर्फ चार कोनों वाली दुनिया ही मालूम थी, जिसमें एक कोने में उसका पलंग, दूसरे में – आया का सन्दूक, तीसरे में कुर्सी, और चौथे में – छोटा सा लैम्प. अगर पलंग के नीचे झाँककर देखो, तो एक हाथ टूटी गुड़िया और ड्रम दिखाई देगा, और आया के सन्दूक के पीछे कई सारी चीज़ें दिखाई देंगी: धागों के रील, कागज़, बिना ढक्कन वाला डिब्बा और एक टूटा हुआ जोकर. इस दुनिया में, आया और ग्रीशा के अलावा, अक्सर मम्मा और बिल्ली भी होते हैं. मम्मा गुड़िया जैसी है, और बिल्ली पापा के ओवरकोट जैसी. बस, सिर्फ ओवरकोट की आँखें और पूँछ नहीं होती. उस दुनिया से, जिसे बच्चों का कमरा कहते हैं, एक दरवाज़ा जाता है उस भाग में जहाँ खाना खाते हैं और चाय पीते हैं. वहाँ ऊँची टाँगों वाली ग्रीशा की कुर्सी है और एक घड़ी लटक रही है, जो है सिर्फ इसलिए कि पेंडुलम को हिलाती रहे और बजती रहे. डाईनिंग रूम से उस कमरे में जा सकते हैं, जहाँ ख़ूबसूरत कुर्सियाँ रखी हैं. वहाँ कालीन पर एक काला धब्बा पड़ा है जिसके लिए अभी तक ग्रीशा को ऊँगलियों से धमकाया जाता है. इस कमरे के पीछे एक और कमरा है, जहाँ उसे नहीं ले जाते, और जहाँ दिखाई देती है सिर्फ पापा – एक बहुत ही रहस्यमय व्यक्ति – की झलक. आया और मम्मा तो समझ में आ जाती हैं: वे ग्रीशा को कपड़े पहनाती हैं, खाना खिलाती हैं और सुलाती हैं, मगर पापा किसलिए हैं – पता नहीं. एक और भी रहस्यमय व्यक्ति है – ये है आण्टी, जिसने ग्रीशा को ड्रम दिया था. वो कभी दिखाई देती है, कभी ग़ायब हो जाती है. वो कहाँ ग़ायब हो जाती है? ग्रीशा ने कई बार पलंग के नीचे, सन्दूक के पीछे और दीवान के नीचे भी झाँक कर देखा मगर वो वहाँ नहीं थी… इस नई दुनिया में, जहाँ सूरज आँखों में चुभ रहा है, इत्ते सारे पापा, मम्मा और आण्टी हैं कि समझ में नहीं आता कि किसके पास भागें. मगर सबसे ज़्यादा अचरज भरी चीज़ है – घोड़े. ग्रीशा उनके चलते हुए पैरों की ओर देखता है और कुछ भी समझ नहीं पाता: वो आया की ओर देखता है, जिससे कि वो उसे समझा सके, मगर वो ख़ामोश ही रहती है. अचानक उसे पैरों की भयानक धम्-धम् सुनाई देती है…पेड़ों वाले रास्ते पर, सधे हुए क़दमों से, सीधे उसकी ओर आ रहा है सैनिकों का झुण्ड, लाल-लाल चेहरों वाला, और बगल में दबी हैं नहाने वाली झाडुएँ. डर के मारे ग्रीशा ठण्डा पड़ जाता है और वह प्रश्नार्थक मुद्रा से आया की ओर देखता है – कोई ख़तरे की बात तो नहीं है? मगर आया ना तो भागती है, ना ही रोती है, मतलब ख़तरे की कोई बात नहीं है. ग्रीशा आँखों से सैनिकों को बिदा करता है और ख़ुद भी उनकी ताल पर चलने लगता है.
रास्ते पर दो बड़ी-बड़ी बिल्लियाँ भाग रही हैं अपने लम्बे मुँह लिए, जीभ बाहर निकाले और पूँछ ऊपर उठाए. ग्रीशा सोचता है कि उसे भी भागना चाहिए, और वो बिल्लियों के पीछे भागता है. “रुक!” बड़ी बेदर्दी से उसके कंधे पकड़कर आया चिल्लाती है. “कहाँ जा रहा है? क्या तुझे शरारत करने की इजाज़त मिल गई है?” कोई एक आया बैठी है और हाथों में संतरों का एक टब पकड़े है. ग्रीशा उसके पास से गुज़रता है और चुपचाप एक संतरा ले लेता है. “ये क्यों किया तूने?” उसके हाथों पे मारते हुए और संतरा छीनते हुए उसकी वाली आया चीख़ी. – बेवकूफ़!”
अब ग्रीश्का ख़ुशी-ख़ुशी वो वाला शीशे का टुकड़ा उठा लेता, जो उसके पैरों के पास पड़ा है और जो लैम्प की तरह चमक रहा है, मगर वह डरता है कि उसे फिर से हाथ पर मार पड़ेगी.
“नमस्ते!” अचानक ग्रीशा को ठीक अपने कान के ऊपर किसी की भारी, मोटी आवाज़ सुनाई देती है और वो चमकती बटनों वाले एक ऊँचे आदमी को देखता है.
ग्रीशा के अचरज का ठिकाना न रहा, जब इस आदमी ने आया से हाथ मिलाया, उसके पास ठहर गया और बातें करने लगा. सूरज की चमक, गाड़ियों का शोर, घोड़े, चमकते बटन, ये सब इतना नया और डरावना है, कि ग्रीशा की रूह प्रसन्नता से भर गई और वह खिलखिलाने लगा.
“ जाएँगे! जाएँगे!” वो चमकीले बटनों वाले आदमी के कोट की पूँछ पकड़कर चिल्लाया. “कहाँ जाएँगे?” उस आदमी ने पूछा. “जाएँगे!” ग्रीशा ज़िद करने लगा. वो ये कहना चाहता था, कि अपने साथ पापा को, मम्मा को और बिल्ली को भी ले जाना अच्छा रहेगा, मगर ज़ुबान वो सब नहीं कहती है, जो ग्रीशा कहना चाहता है. कुछ देर के बाद आया पेड़ों वाले रास्ते से मुड़ती है और ग्रीशा को एक बड़े आँगन में ले जाती है, जहाँ अभी तक बर्फ़ है. चमकीली बटनों वाला आदमी भी उनके साथ चल रहा है. बर्फ के ढेर और पानी के डबरे पार करते हैं, फिर गन्दी, अंधेरी सीढ़ी से एक कमरे में आते हैं. वहाँ बहुत धुआँ है और कोई औरत भट्टी के पास खड़े होकर कटलेट्स बना रही है. रसोईन और आया एक दूसरे को चूमती हैं और उस आदमी समेत बेंच पर बैठकर धीमे-धीमे बातें करने लगती हैं. गरम कपड़ों में लिपटे ग्रीशा को बेहद गरम लग रहा है, उसका दम घुट रहा है. ”ऐसा क्यों हो रहा है?” वो इधर-उधर देखते हुए सोचता है.
वो देखता है काली छत, भट्टी से ब्रेड निकालने का दो सींगों वाला चिमटा, भट्टी, जो अपनी बड़े काले छेद से देख रही थी… “मा-S-S-S-मा” वो चिल्लाता है. “बस,बस,बस!” आया चिल्लाती है, “थोड़ा रुक!” रसोईन मेज़ पर बोतल, तीन छोटे-छोटे गिलास और केक रखती है. दो औरतें और चमकीले बटनों वाला आदमी अपने-अपने गिलास एक दूसरे से टकराते हैं और कई बार पीते हैं, और वो आदमी या तो आया को या रसोईन को अपनी बाँहों में लेता है. और फिर सब धीमी आवाज़ में गाने लगते हैं. ग्रीशा केक की ओर हाथ बढ़ाता है, और वे उसे केक का छोटा-सा टुकड़ा देते हैं. वो खाता है और देखता है कि आया कैसे पी रही है…उसका दिल भी पीने को करने लगा. “दे! आया, दे!” वो कहता है. रसोईन उसे अपने गिलास से चुस्की लेने देती है. उसकी आँखें फैल जाती हैं, माथे पे बल पड़ जाते हैं, वो खाँसता है और फिर बड़ी देर तक हाथों को हिलाता रहता है, और रसोईन उसकी ओर देखती है और हँसती है. घर लौटने के बाद ग्रीशा मम्मा को, दीवारों को और पलंग को सुनाने लगता है कि वो कहाँ गया था और उसने क्या-क्या देखा. वो ज़ुबान से उतना नहीं कहता, जितना उसका चेहरा और उसके हाथ कहते हैं. वो दिखाता है कि सूरज कैसे चमकता है, घोड़े कैसे दौड़ते हैं, डरावनी भट्टी कैसे देखती है और रसोईन कैसे पीती है… शाम को वह किसी भी तरह सो नहीं पाता. झाड़ुओं वाले सैनिक, बड़ी वाली बिल्लियाँ, घोड़े, छोटा-सा शीशा, संतरों वाला छोटा-सा टब, चमचमाते बटन, – सब कुछ गड्ड-मड्ड हो गया था और उसके दिमाग पे बोझ डाल रहा था. वो इस करवट से उस करवट पलटता रहता है, पैर पटकता है और आख़िर में अपने जोश को बर्दाश्त न करने के कारण रोने लगता है. “अरे, तुझे तो बुखार है!” मम्मा उसके माथे को छूते हुए कहती है. “ये कैसे हो गया?”
“भट्टी!” ग्रीशा रोता है. “भट्टी, तू जा यहाँ से!”
“शायद इसने ज़्यादा खा लिया था…” मम्मा ने फ़ैसला कर लिया. और नई, अभी-अभी देखी हुई ज़िन्दगी के अनुभवों से हैरान ग्रीशा को मम्मा कॅस्टर-ऑइल का चम्मच पिलाती है.

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Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.
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Navneet Bakshi
Navneet Bakshi
1 year ago

शायद एक तीन साल के बच्चे की दृष्टि से रूस के एक माहौल की झलकी सी ही लगी है मुझे यह, अगर इस से ज्यादा लेखक का कोई और मकसद था तो वह तो मुझे समझ नहीं आया |

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