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एल्तिशेव परिवार की कहानी (एक अंश)

लेखक: रमान सेन्चिन

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

 

अपने अनेक हम-उम्र लोगों के समान निकलाय मिखाइलविच एल्तिशेव ज़िन्दगी के काफ़ी बड़े दौर तक यही सोचता था कि इन्सानों की तरह जीना चाहिए, अपने कर्तव्य को पूरा करना चाहिए और धीरे-धीरे आपको इसका पुरस्कार अवश्य मिलेगा.
रैंक में पदोन्नति, सरकारी क्वार्टर, तनख़्वाह में वृद्धि, जिसमें से थोड़ी-थोड़ी बचत करके आप पहले एक  फ्रिज, फिर एक वार्डरोब, क्रिस्टल का डिनर-सेट, और अंत में – एक कार भी ख़रीद सकते हो. कभी निकलाय  मिखाइलविच  को “झिगूली” का मॉडेल-6 बहुत पसन्द था. यह उसका सपना था.
इसमें से कुछ तो संभव हो सका. उसे दो कमरों वाला क्वार्टर दिया गया, ये सच है कि चाभियाँ लेते समय न तो निकलाय  मिखाइलविच , न ही उसकी बीबी ने इस बात को महत्व दिया कि ये क्वार्टर सरकारी है – वे, बस, ख़ुश हो गए. क्वार्टर खुला-खुला, बहुत बड़ा था, और बवण्डर की तरह उसमें भागते, खिलौने इधर-उधर फेंकते दोनों बेटे – नौ साल का आर्तेम और छह साल का डेनिस, किसी को परेशान नहीं करते, पैरों के बीच-बीच में नहीं आते, जैसा कि पहले होता था. क्वार्टर में हरेक के लिए अपनी-अपनी जगह थी…पदोन्नति, थोड़ी-बहुत ही सही, मगर मिली – समय के साथ-साथ निकलाय  मिखाइलविच  सार्जेंट से लेफ्टिनेंट की रैंक तक पहुँच गया. तनख़्वाह में से भी कुछ न कुछ बचा पाना संभव था, और सन् ’87 में उसने कार ख़रीद ली, मॉडेल-6 न सही, मॉडेल-3 ख़रीदी, सेकण्ड-हैण्ड, 40,000 कि.मी. चलाई गई, मगर, फिर भी… बुरी बात ये हुई कि काफ़ी समय तक गैरेज नहीं मिला – कार कम्पाऊण्ड में खड़ी रहती, धीरे धीरे उसमें नीचे से ज़ंग लगने लगा. मगर फिर एक तैयार गैरेज ख़रीदा गया – पक्के फ़र्श वाला, भट्टी, तहख़ाने और चौकीदार की घुमटी के साथ. बेहतरीन गैरेज था. जब “झिगूली” पूरी तरह ख़राब हो गई तो उसके कलपुर्जे बेच दिए गए, उसमें थोड़े पैस डाले गए, “मस्क्विच” 2141 ख़रीदी गई.

हाँ, अब तक तो ज़िन्दगी सहज तो नहीं रही, मगर सब मिलाकर ठीक-ठाक ही रही. ब्लैक एण्ड व्हाईट ‘रेकॉर्ड’ के बदले पहले आया रंगीन “रूबिन”, और फिर “सैमसुंग”, प्लायवुड की भारी-भरकम अलमारी के बदले – ऊँची, नाज़ुक, शेल्फ़ आई. बड़े बेटे आर्तेम ने स्कूल ख़त्म कर लिया, आठ कक्षाओं वाला नहीं, जैसे कि कभी निकलाय  मिखाइलविच  ने किया था (उसे नौकरी करनी पड़ी थी – माँ अपने चारों बच्चों को भरपेट खाना नहीं दे सकती थी), वह शिक्षा–संस्थान के इतिहास विभाग में दाख़िले की तैयारी कर रहा था; छोटे बेटे की भी स्कूल की पढ़ाई अच्छी ही चल रही थी, वह बॉक्सिंग भी सीख रहा था. बीबी शहर की सेंट्रल लाइब्रेरी में काम कर रही थी….
उस पल, जब परीकथा के भीमकाय नायक की तरह, आगे बढ़ने के लिए किसी राह को चुनना था, एल्तिशेव सोता रहा. असल में ये कोई एक पल नहीं था, बल्कि दुख भरे और साथ ही परेशानी भरे, कई परिवर्तनकारी साल थे. हाँ, निकलाय  मिखाइलविच  सो नहीं रहा था, बल्कि घटनाओं का निरीक्षण कर रहा था, उन्हें तौल रहा था, समझौता कर रहा था. उसे इस बात पर यक़ीन नहीं हो रहा था कि ज़िन्दगी में पूरी संजीदगी से परिवर्तन आ रहा है और कई लोगों को पीछे छोड़कर आगे निकल जाने का मौक़ा आ रहा है.
बाद में, कसकर मुट्ठियाँ भींचते हुए, निकलाय  मिखाइलविच  याद करता कि कैसे उसे नौकरी छोड़ देने का, “बिज़नेस करने का”, “पार्टनरशिप में काम करने का” सुझाव दिया गया था, कैसे वाक़ई में क़िस्मत बदलने के कई मौक़े एक के बाद एक आते रहे. मगर वह कोई फ़ैसला न कर सका. हो सकता है कि वह सही था – क्योंकि जिन्होंने उसे ये सुझाव दिए थे, उनमें से कई लोग अब नहीं थे, उन्हें मार डाला गया था, कईयों को जेल में बन्द कर दिया गया था, मगर कई ऐसे भी थे कि अब उन तक पहुँचना मुश्किल था – वे एक दूसरे ही स्तर पर थे. हुँ, जैसे कम्प्यूटर के किसी क्लिष्ट खेल में, जिसमें जीतने के लिए कई साल गँवाने पड़ते हैं…उनके साथ जाने से इनकार करने के कारण, उन ख़तरों को न झेलने के कारण जो वर्तमान तक पहुँचाने वाली राह पर मौजूद थे, विजेताओं के पास जाने का एल्तिशेव को अब कोई अधिकार नहीं था. अब दो ही रास्ते बचे थे, या तो अपने भाग्य से समझौता कर ले, या उनके बराबर पहुँचने की कोशिश करे, मतलब, उनका प्रतिस्पर्धी बन जाए. ये सच है कि अब वो अवसर भी लुप्त हो चुके थे जब शून्य से आरंभ करके, गिरेबान पकड़के, घूँसेबाज़ी करके, कोन्याक की एक बोतल देके – अपना काम करवा लिया जाता था. बिज़नेस शुरू करना. मगर, अब, इस उम्र में…पचास का हो गया है.

चिड़चिड़ापन धीरे-धीरे बढ़ता गया, कड़ुवाहट आती गई. चीज़ों और बढ़ते हुए बेटों के कारण, फैलती हुई बीबी के कारण सिकुड़ता हुआ क्वार्टर चिड़चिड़ाहट पैदा करता; गैस के पाईप की भनभनाहट, जो बैरेक में रहने के बाद अच्छी लगती थी, अब गुस्सा दिलाती थी; उकताहटभरी, कुंद बना देने वाली नौकरी से चिड़चिड़ाहट होती थी, जिसमें लाख कोशिश करने पर भी साधारण सी कमाई भी नहीं होती थी; रास्तों पर दौड़ती महंगी कारों से, सजी-धजी शो-केसेस से, फुटपाथों पर चलते लोगों के भड़कीले सैलाब से चिड़चिड़ाहट होती थी. और रोज़मर्रा के कामों से भी चिड़चिड़ाहट होती थी – हर रात, पलंग पर लेटना, यह जानते हुए कि नींद जल्दी नहीं आएगी, बेस्वाद खाने से चिड़चिड़ाहट होती थी, जिसे मुँह में ठूंसना, सड़े हुए दाँतों से देर तक चबाना, निगलना ज़रूरी था; जूतों के लेसों से चिड़चिड़ाहट होती थी, प्रवेशद्वार की टूटी-फूटी सीढ़ियों से चिड़चिड़ाहट  होती थी… “ये सब ऐसा ही रहेगा,” – यह बात दिमाग़ में फ़ौलाद के हथौड़े से पूरी तरह फिट कर दी गई थी, – “ऐसा ही रहेगा.” और कभी कभी अचानक एक डरावना,  सठियाया हुआ विचार भी कौंध जाता, “कहीं इससे भी ज़्यादा बुरा न हो.”

मगर कई लोग निकलाय  मिखाइलविच  से ईर्ष्या करते थे. लम्बे इंतज़ार के बाद, कड़े संघर्ष के बाद, उसे ऐसी नौकरी पाने में सफ़लता मिली, जिसमें ‘खाने-पीने’ की काफ़ी गुंजाइश थी; नशा मुक्ति केन्द्र में सेक्यूरिटी ऑफ़िसर की. शुरू में तो एल्तिशेव हर ड्यूटी पर ख़ुश हो जाता – तीन-तीन दिनों के बाद ड्यूटी लगती थी – किसी चमत्कार की उम्मीद करता…मगर नहीं, “किसी चमत्कार” की नहीं, बल्कि नशे में धुत किसी रईसज़ादे की जिसकी जेबें ठसाठस नोटों से भरी हों.

अगर नशा-मुक्ति केन्द्रों के किस्सों पर भरोसा किया जाए तो ऐसी घटनाएँ होती थीं, और तब सेक्यूरिटी ऑफ़िसर्स ख़ुद ही पल भर में अमीर बन जाते. एक ने तो इस तरीक़े से दो महीनों में “टोयोटा” के लायक पैसे कमा लिए थे….

ये बात नहीं कि एल्तिशेव की दाल नहीं गली, मगर ऊपरी कमाई बेहद कम थी, दयनीय थी, और ड्यूटी का अधिकांश समय सड़कों पे पड़े पियक्कड़ों से जूझने में ही गुज़र जाता था. आख़िर किसी ‘चमत्कार’ से उसका भरोसा ही उठ गया, आहत, अपमानित भावना से, मन मार के, ज़बर्दस्ती वह ड्यूटी पे जाता. अपने आप पर ही उसे गुस्सा आता था, हाँलाकि वह इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं था.

वो, शायद, अंतिम ड्यूटी थी जो हमेशा की तरह शुरू हुई – 24 अप्रैल सन् 2002 को शाम के क़रीब पाँच बजे, नींद पूरी करने के बाद, भरपेट खाना खाकर, मगर बेहद थकावट महसूस कर रहा, एल्तिशेव सेक्यूरिटी ऑफ़िस के दफ़्तर में पहुँचा.

नशा-मुक्ति केन्द्र शहर के बीचोंबीच था, मगर दूर से दिखाई नहीं देता था – क्योंकि ये छोटी सी एक मंज़िला इमारत थी, छोटी-छोटी धूल भरी खिड़कियों वाली. मगर जिन्हें मालूम था कि वहाँ क्या है, वे उससे दूर ही रहने की कोशिश करते, ख़ासकर तब जब वीक-एण्ड पर वे नशे में धुत होते थे. सिर्फ मिलिशियामैन, डॉक्टर्स और यहाँ पड़े हुए लोगों के रिश्तेदार ही सीधे रास्ते से आते, लकड़ी का मोटा दरवाज़ा खोलते और उस अंधेरी, उमस भरी, डरावनी, छोटी सी दुनिया में गुम हो जाते….

ड्यूटी-रूम में मेज़ के चारों तरफ़ बैठे थे पाखोमिन, जिससे एल्तिशेव को चौबीस घंटे के लिए चार्ज लेना था, और पच्चीस साल का एक नौजवान. नौजवान सिकुड़ा-सा था, जैसे जम गया हो, चेहरे पर कड़वाहट थी.

“तू समझ ले,” हौले से, मगर ज़ोर देकर पाखोमिन कह रहा था, “कि यहाँ से तू सिर्फ जुर्माना चुकाने के बाद ही जा सकता है. हें? दो सौ चौंसठ रुबल्स. तेरे पास एक सौ बीस हैं ही. और ज़रूरत है….अं-अं …और एक सौ चवालीस की. राऊण्ड फ़िगर कर लेते हैं – एक सौ पचास की. हें?

पाखोमिन का ये बारबार का ‘हें’ निकलाय  मिखाइलविच  को गुस्सा दिला रहा था, मगर – उसने ग़ौर किया – कि इस तरह के क्लाएण्ट्स के साथ वह ख़ुद भी बारबार इसी तरह का कोई लब्ज़ इस्तेमाल करता था. जिससे बात समझ में आ जाए.
“मगर, मैं कितनी बार कह चुका हूँ,” नौजवान मिमियाया, “मेरे पास – नहीं हैं…”
“ढूँढ़,” पाखोमिन ने उसकी बात काटी. “उधार ले. रिश्तेदार हैं, पहचान वाले हैं. हम तुझे ले भी जा सकते. हें? हम ले जाएँगे.”
नौजवान ने कंधे हिला दिए. चुप रहा.

“सु-सुन,” पाखोमिन धैर्य खोने लगा. “तेरे पास ना तो पासपोर्ट है, ना ही कोई और कागज़ात. क़ानूनन – हें? – मैं तुझे तीन दिन के लिए अन्दर कर सकता हूँ. तेरी शिनाख़्त होने तक. तो?”
नौजवान ख़ामोश था.
निकलाय  मिखाइलविच  ने हाथ उठाकर घड़ी पर नज़र डाली. ड्यूटी शुरू होने में बीस मिनट थे. अभी चार्ज भी लेना था.
“सुन, विताली,” जानबूझ कर लापरवाही से, मज़ाकिया अन्दाज़ में वह पाखोमिन से बोला, “ तू उसे सेक्शन में ले जा और ठोंक दे कि भाग रहा था. सिर पे क्यों चढ़ा रहा है? रिपोर्ट लिख दे कि विरोध कर रहा था, पूरी रात यहाँ ऊधम मचा रहा था…”
पाखोमिन ने पुश्ती जोड़ी:
“ठीक है, रास्तों पे झाडू लगाने दो, बल्कि, उससे अच्छा – टॉयलेट्स की सफ़ाई करे. मैं इंतज़ाम कर दूँगा. हें?”
उसने रसीदों वाली फ़ाईल फ़ट् से बन्द कर दी और नौजवान से बोला “चल उठ, थाने चलते हैं. वहाँ रात बिताना, और कल – अदालत में.”
“अरे, वो” – नौजवान डर गया, “मैं तो…”
“अब और क्या है?” पाखोमिन ने तैश में आकर कहा. “चल, चल.”
“मेरी आण्टी है…उससे पूछ सकते हैं. मगर वो मार डालेगी.”
“किसे मार डालेगी?” एल्तिशेव चौकन्ना हो गया.

“अरे, मुझे. कि मैं यहाँ…”
“ठीक करेगी. पीना ज़रा कम चाहिए. और नशामुक्ति केन्द्र का सर्विस-चार्ज तो लगाया ही नहीं है. हें?” पाखोमिन बन्दरों के पिंजरे के पास सिगरेट पीते हुए सार्जेंट की तरफ़ मुड़ा. “सेरेग, आदरणीय महाशय को ले जा. आण्टी का घर दूर है?”
“नहीं, ज़्यादा दूर नहीं है. यहीं स्टेशन के पीछे…”
“ठीक है. एक सौ पचास रूबल्स लाएगा – तेरा सामान वापस कर देंगे और तू – आज़ाद.”
सार्जेंट नौजवान को ले गया. रास्ते पर UAZ चल पड़ी.
पाखोमिन थक कर कुर्सी की पीठ से टिक गया, हौले से आँखें मूंद लीं.

“ओ-ओह-ओह…”
“तबियत ठीक नहीं है?” जवाब मालूम होते हुए भी शिष्टाचारवश एल्तिशेव ने पूछ लिया.

“हाँ, कमज़ोरी है. एक और मुसीबत…सोना चाहता हूँ…इस बदमाश का इंतज़ार भी करना पड़ेगा.”
एल्तिशेव ने सिर हिलाया.
“लाओ, तब तक चार्ज ले लेता हूँ.”
“च-ल.”

नीचे गोदाम में गए, जहाँ असल में नशामुक्ति केन्द्र था, कोठरियों-दालानों में, टॉयलेट में, क्लोक-रूम में झाँका. सब कुछ ठीक ठाक था. वापस ऊपर ड्यूटी रूम में आए. एल्तिशेव ने रजिस्टर में दस्तख़त किए.
“ज़ब्ती वाली पिएँ?” हल्की सी ख़ुशी से पाखोमिन ने पूछा; मेज़ की दराज़ खोली. “ मस्कोव्स्काया” है,  “कोलेसो फ़ोर्तूनी”, “ज़ेम्स्काया” है. हें, कौनसी?”
“कोई भी चलेगी…”कोलेसो…”.
सीनियर ने बोतल निकाली, भाँपते हुए ढक्कन घुमाने लगा.
“ठीक ही है. आदमी भी टिपटाप था, बैग लिए था. किसी सालगिरह में गया था, बोला, सालगिरह मनाई, ज़्यादा ही पी गया.”
“डाल.”
निकलाय  मिखाइलविच  को शराब का शौक नहीं था, दारू-पार्टियों में वह नहीं जाता था, मगर क़रीब दो सौ ग्राम पीने के कभी ख़िलाफ़ भी नहीं था. वोद्का उस पर अच्छा असर डालती थी – उसे पागल नहीं बनाती थी, बल्कि भीतर की किसी चीज़ को, किसी ज़हरीली पर्त को धो देती थी.

पाखोमिन के पास कुछ ‘स्नैक्स’ भी निकल आए – सोल्मन का पैकबन्द टुकड़ा, उबले सॉसेज की गोल स्लाईस, गोश्त की टिकिया, चॉकलेट…ये सब पिछले चौबीस घंटे में यहाँ लाए गए पियक्कड़ों के पास से बरामद किया गया था.
“तो, सफ़लता के लिए.”
“हूँ, सफ़लता के लिए, कोई हर्ज नहीं है.”
प्लास्टिक के ग्लास एक दूसरे से टकराए…
पाँच बजने से कुछ मिनट पहले दो सार्जेंट और एक डॉक्टरनी आई, मोटी, उदास, मर्दों जैसे चेहरे वाली, – ये वो लोग थे जिनके साथ एल्तिशेव को अगले चौबीस घण्टे काम करना था.
पाँच बजने के कुछ देर बाद वो लड़का पैसे लेकर आया, उसे उसकी चीज़ें दे दी गईं, रसीद भी दी गई और उसे छोड़ दिया गया.
“चलो, हो गया,” बोतल और खाने पीने का सामान बैग में रखते हुए पाखोमिन ने चैन की साँस ली.  ‘गुड-लक’!

निकलाय  मिखाइलविच  मेज़ के पीछे बैठकर आसपास की चीज़ों का जायज़ा लेने लगा.

सेक्यूरिटी रूम अंधेरा, छोटा सा था, थोड़े से बल्ब उसे रोशनी से, ज़िन्दगी से नहीं भर सकते थे…दीवारें खुरदुरी, हल्के हरे रंग से पुती हुईं; जाली लगी, धूल से अटी दो खिड़कियाँ, बिल्कुल काले छेदों की तरह लगती थीं. दीवारों के साथ रखी थीं, बिना पीठ की कुछ बेंचें, प्रवेश-द्वार के बाईं ओर एक संकरा बन्दरों का पिंजरा था. ये उन पकड़े गए लोगों के लिए था जो नशे में धुत होकर आक्रामक हो जाते थे; मेज़ प्रवेश द्वार के सामने रखी है, और मिखाइल निकोलायेविच की पीठ के बिल्कुल पीछे थीं सीढ़ियाँ. जल्दी ही पियक्कड़ों को सीढ़ियों से घसीटते हुए लाएँगे, और नीचे से चीखें सुनाई देंगी – हिरासत में रखे गए पियक्कड़ों की गुर्राहट और गालियाँ. “आह, कितना ‘बोरिंग’ है ये सब,” एल्तिशेव के माथे पर बल पड़ गए.

उसकी बगल में डॉक्टरनी बैठ गई, सफ़ेद एप्रन में, जो धो-धो के भूरा हो गया था. उसने थर्मस खोला, कप निकाला, कॉफ़ी डाली…वह कभी सरकारी बर्तनों का इस्तेमाल नहीं करती थी, इलेक्ट्रिक केटली का भी नहीं – हर चीज़ घर से लाती थी. “ कर, नफ़रत कर”. निकलाय  मिखाइलविच  को ऐसा लगा कि डॉक्टरनी अचानक त्वचा के रोग से बीमार हो गई है. ख़राश, जलन, अल्सर…

उसने मेज़ की दराज़ खोली जिसमें पाखोमिन द्वारा छोड़ी गई ‘कलेसो फोर्तूनी’ की आधी बोतल, कुछ गिलास और चॉकलेट पड़े थे.

“तो, मेरे बाज़ों, काम से पहले एक-एक घूँट हो जाए? अच्छे ग्राहक मिलने के लिए…”

रात के दस बजे तक ख़ामोशी और बोरियत रही. गश्ती पुलिस और ट्रैफ़िक पुलिस बेशक कभी-कभार नशे में धुत लोगों को पकड़ कर लाए तो थे, मगर बस, एक-एक को ही. सारे शराबी अधेड़ उम्र के थे, और, बदकिस्मती से उनके पास पैसे भी नहीं थे. वे निकलाय  मिखाइलविच  और डॉक्टरनी की मेज़ के सामने वाली कुर्सी पर लुढ़क जाते, हौले से कुछ बुदबुदाते और ये साबित करने की कोशिश करते कि वे पूरे होशो-हवास में हैं.
सार्जेंट्स उनकी जेबें टटोलते, घड़ी वालों की कलाई से घड़ी निकाल लेते. एल्तिशेव बरामद की गई चीज़ों कि सूची बनाता, उन पर किसी धारा के अंतर्गत मुकदमा ठोंकता, डॉक्टरनी उनकी मेडिकल रिपोर्ट बनाती.
फिर सार्जेंट्स उन्हें नीचे ले जाते. उन्हें कपड़े उतारने पर मजबूर करते, उन्हें कंबल देते, और वार्ड में बन्द कर देते. इसके बाद वे ड्यूटी पर लौट आते, सिगरेट फूंकते, उबासियाँ लेते.

मगर दस बजे के बाद वातावरण ख़ुशगवार हो जाता. बार-बार दरवाज़े के सामने ‘झिगूली’ और “UAZ” कारें आतीं, सेक्यूरिटी-रूम में ग्राहकों को चला कर या घसीट कर लाते. दो-तीन तो पूरी तरह धुत और पैसे वाले होते. हालाँकि उनके पास ज़्यादा पैसे तो नहीं होते, मगर फिर भी कुछ तो होते थे. इस बात से ख़ुश होते हुए कि उन्हें पकड़ते ही नहीं लूट लिया गया, एल्तिशेव सूची बनाता. किसी के “3320 रूबल्स” के बदले “1320 रूबल्स” लिखता, किसी और के “2598 रूबल्स” के बदले “598 रूबल्स” लिखता. ख़यालों में ही इस तरह ज़ब्त किए गए चार हज़ार रूबल्स को अपने लोगों में बाँटता: ख़ुद को और डॉक्टरनी को डेढ़-डेढ़ हज़ार, और सार्जेंट्स को पाँच-पाँच सौ.
बारह बजे के क़रीब एकदम छह लोगों को पकड़ कर लाए. लड़के जवान थे, ढीठ थे; बेशक, नशे में धुत, मगर, पकड़े जाने की वजह से उत्तेजित थे. एक का तो हाथ भी तोड़ना पड़ा था.
बैटमैन-क्लब के पास पकड़ा,” ट्रैफ़िक पुलिस वाले ने समझाया. “आज वहाँ कॉन्सर्ट है, सब नशे में तरबतर होंगे.”

“ले आ – ले आ,” निकलाय  मिखाइलविच  ने सिर हिलाया. “सबके लिए जगह मिल जाएगी….”

लड़कों के साथ काफ़ी मशक्कत करनी पड़ी. उन्होंने ये मानने से साफ़ इनकार कर दिया कि वे नशे में धुत हैं, कहा कि आपस में ‘बात’ कर लेते हैं, या फिर धमकियाँ देने लगे और गुण्डागर्दी करने लगे; वो, जिसका हाथ तोड़ा गया था, ये यक़ीन दिला रहा था कि वह जर्नलिस्ट है.
“अच्छा, जर्नलिस्ट हो,” अक्सर ख़ामोश रहने वाली डॉक्टरनी से रहा नहीं गया, “दस बार उठक-बैठक लगा.”
“क्या?! क्या मैं कोई गिनी-पिग हूँ?”
“ठीक है, तो फिर ‘रिपोर्ट’ लिखते हैं,” डॉक्टरनी ने पेन उठा लिया. “नाम-उपनाम-पिता का नाम?”
“ऐसे कैसे रिपोर्ट लिखेंगी?”
“इसलिए कि तेरे थोबड़े से दिखाई दे रहा है कि तुझको चढ़ गई है. ला-ला डॉक्यूमेंट्स दिखा.”
अपने आप को जर्नलिस्ट कहने वाले ने माँ-बहन की गालियाँ दी और उठक-बैठक लगाने लगा. वो झूमते हुए डगमगाने लगा. डॉक्टरनी हँसने लगी:
“देखा, और कहता है – बिल्कुल नॉर्मल हूँ.”

“वो तो मैं थक गया हूँ!…”
बड़ी मुश्किल से लड़कों को नीचे भेजा गया. उनके पास सब मिलाकर पाँच हज़ार रूबल्स निकले, मगर उसमें से कुछ हिस्सा लेने में एल्तिशेव को ख़तरा महसूस हुआ – वे इतने ज़्यादा भी पिये हुए नहीं थे. अगर कहीं शिकायत कर दी तो लेने के देने पड़ जाएँगे.

“ओह, कितनी गर्मी है,” डॉक्टरनी ने गहरी साँस छोड़ी और पैकेट से पानी की बोतल निकाली. “बिल्कुल गर्मियों का मौसम है, और वे हैं कि ‘हीटिंग’ किए जा रहे हैं…
“अगले हफ़्ते फिर से मौसम ठण्डा होने का अनुमान है,” बिना किसी उत्साह के निकलाय  मिखाइलविच  ने जवाब दिया.
इस डॉक्टरनी की साथ अक्सर उसकी ड्यूटी लग जाती थी, मगर, ऐसा भी होता था कि वे चौबीस घंटे में मुश्किल से दस वाक्य भी नहीं कहते थे. एक ही मेज़ पर बैठते, मगर जैसे कि अलग अलग बैठे हों,  अपना-अपना काम करते रहते. शिफ्ट ख़तम होने के बाद पैसे बांट लेते, अपने-अपने रास्ते चले जाते…जब एल्तिशेव की नज़र उसके चौड़े चेहरे पर, उसके मोटे-मोटे हाथों पर पड़ती, तो उसका मन घृणा से भर जाता, और बड़ी दयनीयता से वह डॉक्टरनी के पति की कल्पना करता. उसकी अनामिका पर, चमड़ी से क़रीब-क़रीब ढंक चुकी शादी की पीली अंगूठी चमकती…वो कैसे इस जैसी औरत के साथ, बेचारा…
मगर तभी अपनी बीबी की याद आ गई – वैसी ही मोटी, चेहरे पर वैसे ही पथराए-गंभीर भाव. “और, सोचो, कैसी प्यारी लड़की थी…” कब की बात है?……क़रीब तीस साल पहले की. फिर तो वक़्त बीतता गया, बीतता गया, और याद करने लायक, अचरज करने लायक कुछ नहीं बचा…समझ में ही नहीं आया कि कब उस लड़की के बदले, जिससे वह कभी दूर नहीं होता था, बगल में दिखाई देने लगा एक परिचित, आवश्यक, मगर नीरस व्यक्तित्व. बीबी.

नए, नए शराबियों को लाते रहे. गन्दे और साफ़-सुथरे, पागल-से और देखने में सामान्य प्रतीत हो रहे, आक्रामक और शांत; तिजोरी उनकी जेबों से बरामद चीज़ों से भरती गईं, ज़्यादातर बेकार और
अनुपयोगी चीज़ों से. पैसे वाले क्लाएंट्स अभी भी नहीं आए थे – बस, चिल्लर, चिल्लर ही थे. निकलाय  मिखाइलविच  मेज़ के पीछे बैठा था, अपने वाले आधे हिस्से में, बार बार हिसाब पर नज़र दौड़ाता, कि आज कितनी कमाई हुई है, किसी सुखद चमत्कार की कल्पना कर रहा था. कभी वह सड़क की ओर वाले दरवाज़े की ओर जाता, बिना किसी जोश के कड़वी “जावा” के कश लेता, अनिच्छा से घर से लाए हुए ठण्डे आलू-समोसे चबाता. एक- दो बार आधा-आधा गिलास वोद्का गटक लेता, जिससे कुछ तरो-ताज़ा महसूस कर सके. बार-बार घड़ी पर नज़र दौड़ाता.

वक़्त बेहद धीरे-धीरे गुज़र रहा था, और रात के क़रीब दो बजे, जब पकड़ कर लाए जाने वाले लोगों का सिलसिला ख़त्म हो गया, तो वह जैसे एकदम रुक गया. अब तो अगर किसी को लाएंगे भी तो बस बेचारे किसी भद्दे, बदबूदार इन्सान को जो नशे में धुत किसी फ़ेंसिंग के पास पड़ा मिलेगा. कुछ और कमाई करने की उम्मीद अब नहीं है.

डॉक्टरनी ने एक पेपरबैक किताब निकाली, प्रसन्नता से चटखारे लेते हुए पढ़ने लगी; सार्जेंट्स ने तिजोरी से चौपड़ निकाली और खेलने लगे. हुँ, सबके पास कुछ न कुछ काम है, मगर वो, निकलाय  मिखायलोविच एल्तिशेव क्या कर रहा है?..

उसे किसी भी चीज़ में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं थी, जैसे किसी मजबूरी में, सिर्फ ड्यूटी के लिए जी रहा हो, न कि अपने आप के लिए. सातवीं कक्षा के बाद लुहार का काम सीखने लगा, फिर दो साल रेल के डिब्बे बनाने के कारखाने में काम किया. बेशक, लड़कों के साथ मिलकर पीता था, डान्स-पार्टियों में जाता था; उसके हमउम्र लोगों में से दो नौजवानों को सांस्कृतिक कार्यों में दिलचस्पी थी और वे अचानक, आसानी से कल्चरल-स्कूल में चले गए, एक और दोस्त कोम्सोमोल्स्क की राह पर निकल गया, और एक स्पोर्ट्स-मास्टर बन गया, प्रतियोगिताओं में जाने लगा. मगर एल्तिशेव आम इन्सान की तरह काम करता रहा, आम आदमी की तरह छुट्टियाँ बिताता, उन्नीस की उम्र में फ़ौज में चला गया, जब वहाँ से निकला तो मिलिशिया का प्रस्ताव मिला. वो राज़ी हो गया. पचास की उम्र आते-आते – कैप्टन बन गया. अगर मेजर बना भी, तो रिटायरमेंट के क़रीब आते-आते ही बन पाएगा…ऐसा था उसकी ज़िन्दगी का ग्राफ़.
ये भी सही था कि वो, जो आर्टिस्ट और स्पोर्ट्समैन और कोम्सोमोल बने थे – जाने कहाँ ग़ायब हो गए, खो गए, कोई भी मशहूर नहीं हो सका. मगर, शायद, ज़िन्दगी के किसी हिस्से को तो उन्होंने दिलचस्पी से और चमक-दमक से जिया था.

एल्तिशेव के भी सामने मौक़े आए, आए तो थे. मगर – वह ऊँघता रहा, उसने इनकार कर दिया, सोचने में ही बहुत देर कर दी. परिवार ने उसे जकड़ रखा था, दो लड़के थे. उनके बारे में सोचकर डरता था इसीलिए आग में नहीं कूदा. वो बड़े हो गए….बड़े ने तो कहीं भी दाख़िला नहीं लिया, ठस दिमाग़ ही रहा, पच्चीस की उम्र में भी – बच्चा ही रहा, और छोटा…. छोटे के साथ तो बहुत बुरा हुआ: झगड़े में किसी के माथे पर ज़ोरदार मुक्का मारा और उसे जोकर बना दिया. अब वो अपंग हो चुका है, और बेटे को पाँच साल के लिए जेल भेज दिया गया.

निकलाय  मिखायलोविच को मालूम था कि पड़ोसी और परिचित इस बारे में क्या फुसफुसाते हैं – ख़ुद तो पुलिसवाला है, और बेटा जेल में बैठा है – कभी-कभी ऑफ़िस में भी लोगों की व्यंग्यपूर्ण निगाहों को महसूस करता था, मगर अपने आप को रोक लेता था, कोशिश करता कि अनदेखी कर दे, दिल पे न ले. वर्ना, उसे डर था कि वो भी किसी का माथा फोड़ देगा.

जवानी के दिनों में वह ताक़तवर नहीं था, क्योंकि, शायद, उनका परिवार बेहद ग़रीब था, खाने के लाले पड़ जाते थे. मगर तीस तक पहुँचते-पहुँचते उसमें ताक़त आ गई, स्वयँ के भीतर कोई फ़ौलादी चीज़ महसूस करने लगा; ऐसे बोल्डर की तरह हो गया, जिसे अगर अपनी जगह से सरकाया जाए, तो रास्ते में पड़ी सभी चीज़ों को मसल डालता है. और जब सहकर्मी अपने मसल्स बनाने के लिए ‘जिम’ में इकट्ठा होते तो अचरज करते: “ख़ूब तन्दुरुस्त है तू, निकलाय  मिखायलोविच! जवानी में ‘डम्बेल्स’ तो नहीं करता था?” वह भी मज़ाक में कहता: “कुश्ती खेलता था, बिना किसी नियम के.”

चार बजे के क़रीब नीचे से चीख़ने की आवाज़ें आने लगीं. पहले वे बाथरूम जाना चाह रहे थे, सार्जेंट्स कुछेक को ले गए. फिर पानी के लिए चिल्लाने लगे, घर पे फोन करने के लिए, छोड़ने के लिए कहने लगे. ख़ास तौर से “बैटमैन-क्लब” से लाए गए सभी लोग शोर मचा रहे थे.

चीख़ें कुछ ज़्यादा ही बढ़ कर दरवाज़े पर खटखटाहट और हंगामे में बदल गईं: “पा-नी! पा-नी!…घर-जाने दो! घर-जाने दो!” – अब एल्तिशेव अपने आपको न रोक सका:
“चलो, उन्हें ख़ामोश करते हैं.”
तीनों – वह और सार्जेंट्स – नीचे उतरे.
“कौन घर जाना चाहता है?” कॉरीडोर के बीचोंबीच रुककर निकलाय  मिखाइलविच  ने पूछा.
“मैं! मैं!” एकदम कई कोठरियों से आवाज़ें आईं.
“ठीक है. बाहर लाओ, इयोनोव.”
भारी-भरकम ताले को खनखनाती चाबियों से खोलकर इयोनोव ने दरवाज़ा खोला, घर जाने के इच्छुक लोग बाहर निकले, और उन्हें एक छोटे से – चार स्क्वेयर मीटर्स के – कमरे में ठूंस दिया गया. इस कमरे में बड़ी-भारी हीटिंग-कॉइल थी, छत के नीचे कई तार लटक रहे थे (शायद, ये कमरा कभी कपड़े सुखाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था). उसमें केयर टेकर बाल्टियाँ और ब्रश, क्लोरीन का थैला रखता था, और कभी-कभी वहाँ काफ़ी आक्रामक – पन्द्रह दिनों की कैद वाले लोगों को रखा जाता था. मगर आज, शायद अपने बुरे मूड के कारण, या फिर इसलिए कि नाख़ुश लोगों की संख्या काफ़ी ज़्यादा थी, एल्तिशेव ने कमरा ठूँस-ठूँसकर भर दिया. चौदह लोग – याने वे सब, जो घर जाने की मांग कर रहे थे उसमें ठूंस दिए गए.
“खड़े रहो, थोड़ी देर सोच लो,” कहकर उसने धड़ाम् से दरवाज़ा बन्द कर दिया; ऊपर ड्यूटी-रूम में चला गया, कैप उतार दी, रूमाल से माथे पर आया पसीना पोंछा.

“ओह, कैसी गर्मी है,” डॉक्टरनी ने उसकी गतिविधियों को देखते हुए कहा. समर-कॉटेज जाना चाहिए, चेरीज़, बेरीज़ के पैक खोलने चाहिए. वर्ना सड़ जाएंगी.”
एल्तिशेव अप्रसन्नता से बुदबुदाया, मेज़ पे बैठ गया. उसके पास समर-कॉटेज नहीं थी; कई बार ज़मीन ख़रीदने के बारे में सोचा, मगर फिर इरादा बदलने लगा, हिसाब-किताब लगाने लगा – फ़ेंसिंग के लिए लट्ठे ख़रीदने पड़ेंगे, छोटा-मोटा घर बनाना पड़ेगा, काली मिट्टी लानी पड़ेगी – और इस शौक को किनारे रख दिया. अब उसे अफ़सोस होता है, बेशक, अभी भी देर नहीं हुई है – अब तो मुफ़्त में ज़मीन ही नहीं मिलती, सौ मीटर ज़मीन की कीमत भी ढेर सारे हज़ार रूबल्स हो गई है…

आधे घण्टे तक तो नीचे काफ़ी शांति रही (नशीली कराहों, भराई हुई माँ-बहन की गालियों की कोई फ़िकर नहीं है), मगर फिर कमरे के दरवाज़े को ज़ोर-ज़ोर से पीटा जाने लगा:
“साँस लेना मुश्किल है! खोलो, ज-ल्लादों!”

दरवाज़े की चोटें तेज़ होती गईं; एल्तिशेव से रहा नहीं गया:
“इयोनोव, वेंटिलेटर से मिरची का पाउडर अन्दर फेंक दे. आज कुछ ज़्यादा ही ऊधम मचा रहे हैं.”

सार्जेंट चला गया. एक मिनट के लिए चीख़ें थम गईं – कमरे में ठूंसे गए लोग, शायद, इस बात की उम्मीद कर रहे थे, कि अब उन्हें छोड़ दिया जाएगा, – और चीख़ें फिर से शुरू हो गईं, पहले से भी ज़्यादा तेज़, फिर वे भयानक खाँसी, विलाप में बदल गईं. जब विलाप अमानवीय आवाज़ों में परिवर्तित हो गया, तो डॉक्टरनी ने किताब पढ़ना बन्द कर दिया:
“ये क्या हो रहा है वहाँ?”
“छो—ड़,” निकलाय  मिखाइलविच  ने त्यौरियाँ चढ़ाते हुए कहा, “हो सकता है, सही बर्ताव करना सीख जाएँ…”
दस मिनट पश्चात् डॉक्टरनी की ज़िद पर दरवाज़ा खोला गया.
छोटे से कमरे से ज़हरीली गरम-गरम हवा की लपट बाहर निकली; डॉक्टरनी का दम घुटने लगा, वह लड़खड़ा गई. फर्श पर कुछ ही देर पहले के गुस्साए लोग ऐंठते हुए एक दूसरे के ऊपर गिरने लगे.

 

*****

  

 

 

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Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.
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