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उद्यान के मालिक

लेखक: सिर्गेइ नोसव

अनुवाद: आ. चारुमति रामदास

उद्यान के मालिक

“और, ऐसा लगता है कि कल ही शाम को मैं इन कुंजों में टहल रहा था…”

 

रात, गर्माहट भरी, श्वेत रात नहीं, अगस्त वाली रात. आख़िरी (शायद, आख़िरी) ट्राम. हम खाली कम्पार्टमेंट से बाहर आते हैं, सुनसान सादोवाया पर चल पड़ते हैं, हम दोनों ने शहरी कपड़े नहीं पहने हैं – मैंने रबड़ के जूते पहने हैं, पापा पुराने स्नीकर्स में हैं, उनके कंधे पर बैकपैक है जिसमें एक बड़ा झोला पड़ा है : हमारे पास फ्लैशलाईट्स हैं – चपटी चिकनी बैटरियों वाले, जिन्हें ज़ुबान से छूना अच्छा लगता है.

उद्यान के पीछे मिखाइलोव्स्की पार्क की गहराई में मुश्किल से रोशनियाँ टिमटिमा रही हैं – दो, तीन, चार…कभी प्रकट होतीं, कभी बुझ जातीं. ये हमसे पहले आये हुए लोग हैं. रोशनियाँ देखकर पापा को जोश आ गया : मतलब हम अकेले नहीं हैं – इकट्ठा करने लायक कुछ तो है! – मतलब रेंगने वाले प्राणी सजीव हो गये हैं!…लगता है, कि हम वाकई में ख़ुशनसीब हैं – दिन में बारिश हुई थी; सब कुछ बेहद अच्छी तरह से हो रहा है. नम मिट्टी और गर्म रात – अच्छे शिकार के लिये मुख्य शर्तें हैं.

गेट बंद है, ताला लटक रहा है – रात को उद्यान  बंद हो जाता है. सादोवाया पुल की तरफ़ से घुसेंगे, जिस साल मेरा जन्म हुआ था तब से उसका नाम प्रथम सादोवाया पुल हो गया था, जिससे कि उसी समय नामकरण किये गये द्वितीय सादोवाया पुल के साथ गड़बड़ न हो जाये, मगर मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है, क्योंकि मेरे दिमाग़ में अनावश्यक बातें ठूँसी नहीं गई हैं.

मैं नौ साल का हूँ.

जालीदार नक्काशी वाली बागड़ एक गोलाकार भाग से समाप्त होती है: नुकीली सलाखें, जो एक ही बिंदु से आरंभ होती हैं, अलग-अलग कोणों से मार्सोवो फील्ड की ओर झुकती हैं. हम मुँडेर पर चढ़ जाते हैं; छड़ों को पकड़े हुए और किनारे की ढलान पर लटक कर हम उद्यान में घुसते हैं. पापा ख़ुश हैं: हमें किसी ने नहीं देखा. फ्लैशलाईट्स जलाये बिना अंधेरे में चलते हैं, जगमगाती सादोवाया से दूर. घास नम है, ये अच्छा है. उन्हें नमी पसंद है.

पापा फ्लैशलाइट जलाते हैं, हम लॉन का छोर देखते हैं : मिट्टी के छोटे-छोटे ढेर – ये निशान हैं केंचुओं की कुछ ही देर पूर्व उपस्थिति के. हाँलाकि केंचुए वहाँ नहीं हैं. “हम शोर मचाते हुए चल रहे हैं,” पापा ने कहा, “छुप गए.” मैं जानता हूँ, उनकी सुनने की ताकत ग़ज़ब की होती है. कहीं उनके कान तो नहीं होते? हम अंधेरे में कुछ दूर और चले – शांत-शांत, लगभग दबे पाँव. कुछ देर खड़े रहे, स्तब्ध. ख़ामोशी. शहर कब का सो चुका है. कहीं दूर, फन्तान्का से परे, कोई कार गुज़रती है. हमारे ऊपर पुराने पेड़ों के शिखर हैं  – हवा गुमसुम है, – लिन्डेन वृक्षों की पत्तियाँ शोर नहीं मचा रही हैं. मैं जैटी-पैविलियन की अंधेरी छाया-आकृति की ओर मुड़ता हूँ. दिन में यहाँ मेज़ों के पीछे और बेंचों पर बैठकर शतरंज खेलते हैं. ये कैसी छाया-आकृति है – मानो कोई बैठा हो? हो सकता है, शतरंज के खिलाड़ी की आँख लग गई हो?

“रोशनी कर”, पापा ने हौले से कहा, मैं फ्लैशलाईट जलाता हूँ, उसकी किरण को पैर के नीचे करते हुए, और जैसे मिट्टी में दबा हुआ कोई बाहर निकली हुई माँसल छोटी उँगली से ज़मीन की सतह को टटोलना चाह रहा है – और हम देखते हैं ; सचमुच के केंचुए को! पापा हौले से उसकी तरफ़ झुकते हैं, पल भर के लिये स्तब्ध हो जाते हैं और, फ़ौरन दो ऊँगलियों से पकड़ कर उसे बिल से बाहर खींचते हैं. मैं चौंक जाता हूँ : मैंने इतने लम्बे कृमि कभी नहीं देखे थे! करीब तीस सेंटीमीटर्स लम्बा, उससे कम तो नहीं था!

ये कोई सीधा-सादा मिट्टी का केंचुआ नहीं है, ये उनमें से नहीं है, जिन्हें मैं गाँव में इकट्ठा किया करता था. रात में रेंगने वाला बड़ा कृमि, वही है ये. दिन में मिट्टी के नीचे छुप जाता है, रात में ऊपर आता है, ताकि बिल से बाहर निकलकर सड़ रहे घास के छोटे-छोटे तिनके और पत्ते इकट्ठा करते हुए अपने सख़्त पकड़ वाले मुँह से काम कर सके. मिखाइलोव्स्की उद्यान  की ज़मीन में रेंगने वाले कृमि प्रचुर मात्रा में हैं. अब मैं ख़ुद ही यह देख रहा हूँ. जहाँ भी फ्लैशलाइट की रोशनी डालो, हर जगह वे नज़र आते हैं. मगर रेंगने वाले कृमि को पकड़ना इतना आसान नहीं है. जैसे ही उसे छुओ – पल भर में वह ग़ायब हो जाता है. अविश्वसनीय गति से धरती के नीचे छुप जाता है. फुर्ती से ऊँगलियों के बीच से फ़िसल जाता है. उसको पकड़ना आना चाहिये. मैं सीख रहा हूँ. अगर ठीक बिल के पास उसे न पकड़ो, तो निश्चित ही फ़िसल जायेगा. मैं सिर्फ चौथे वाले को ही ज़मीन से बाहर खींच सकता हूँ. मुझे आदत हो गई, मैं उसे पकड़ सका. बहुत बड़ा है, उससे डरने में शरम कैसी!

हम पहुँच रहे हैं. अब कोई एक दर्जन फ्लैशलाइट्स उद्यान  में भटक रहे हैं. सबकी रोशनी टिमटिमाती, बिखरी-बिखरी है – कृमि तेज़ रोशनी से डरते हैं.

दो लोग एक साथ हों तो आसान होता है : एक रोशनी डालता है, दूसरा झुकता है. पापा और मैं – सिर्फ हम ही दो हैं, बाकी लोग अकेले, अकेले हैं.

हम, शायद, मशरूम इकट्ठा करने वालों जैसे हैं, जो रात को दिन समझ बैठे हैं.

‘वे इतनी फुर्ती से ग़ायब कैसे हो सकते हैं?’ मैं कृमियों के बारे में सोचता हूँ और उन्हें समझ नहीं पाता. ये कौन सी ताकत है जो उन्हें ज़मीन के भीतर खींचती है?’

सम्राट पावेल की परछाईं मिखाइलोव्स्की किले की खिड़की से देख रही है, मैं जानता हूँ, इसे इंजीनियर किला भी कहते हैं, मुझे सिर्फ यह पता नहीं है, कि वहाँ टेक्निकल किताबों की लाइब्रेरी है और मैं वहाँ आया करूँगा – संदर्भ पत्रिकाओं में हमारे आविष्कारों के लिये विदेशी सादृश्यताएँ ढूँढ़ने. मैं जीव विज्ञानी नहीं बनूँगा, बल्कि इंजीनियर बनूँगा, जैसे मेरे पापा जीव विज्ञानी नहीं, बल्कि इंजीनियर बने, हाँलाकि बचपन में प्रकृति प्रेमी थे, प्राणी-संग्रहालय के एक समूह में जाया करते थे, अभियानों पर जाया करते, उन्होंने पंछियों के चित्र बनाना सीखा और उन्हें मालूम है कि कृमियों को न सिर्फ छछून्दर, बल्कि लोमड़ियाँ, और बिज्जू भी खाते हैं और किन्हीं ख़ास परिस्थितियों में इन्सान भी उन्हें खाते हैं.

मेरे मम्मी-पापा इंजीनियर हैं, वे “मेलबॉक्स” में काम करते हैं, वे कुछ उपकरण, कुछ यंत्र बनाते हैं, घर में मैं ऐसे शब्द सुनता हूँ “ कैरेक्टरिस्टिक्स हटाओ”, “मेमरी तक लाओ”, उनका काम इतना गुप्त है कि मैं स्कूल में उसका ज़िक्र भी नहीं कर सकता, सिर्फ मैं ख़ुद भी नहीं जानता कि मुझे किस बात का ज़िक्र नहीं करना है.

मैं जानता हूँ, कि पावेल की हत्या में उसका अपना बेटा शामिल था. ऐसा कैसे हो सकता है, कि बेटा बाप को मार डाले? कल्पना नहीं कर सकता. मिखाइलोव्स्की उद्यान की बगल में – सिर्फ दूसरी तरफ़ से – एक और सम्राट की हत्या की गई थी. मंदिर की स्याह रूपरेखा देखता हूँ, जिसे हत्या की जगह पर बनाया गया था. कहते हैं कि “स्पास-ना-क्रोवी” (चर्च ऑफ द सवॉयर ऑन स्पिल्ड ब्लड – अनु.) को छुपाने वाले हैं. बगल में ही एक नीचा घर है, जो कभी चर्च का हुआ करता था. भूतपूर्व चर्च वाले घर के सामुदायिक फ्लैट में मेरी मम्मा बड़ी हुई – वह बारह वर्ष की थी जब चर्च पर जर्मन गोला गिरा तो था, मगर फ़टा नहीं था. अजीब बात है, युद्ध से पहले वह अक्सर उद्यान में घूमा करती थी, मगर उसने  रेंगने वाले कृमियों के अस्तित्व के बारे में कभी सुना तक नहीं था. उसे बहुत अचरज होगा, जब भरा हुआ बैग लेकर घर जायेंगे.

क्या केंचुए को दर्द होता है, जब उसे काँटे में फंसाते हैं? पापा कहते हैं : शायद, दर्द होता होगा, बस, ख़ुद केंचुआ इस बारे में नहीं जानता. तीस साल बाद नॉर्वे की सरकार “हरे” (प्रकृतिवादियों से तात्पर्य है – अनु.) सदस्यों” के आग्रह पर यही सवाल पूछेगी और इस विषय पर वैज्ञानिक शोधकार्य को वित्तीय सहायता देगी. वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पंहुचेंगे : केंचुए को दर्द नहीं होता. केंचुआ दर्द से अनभिज्ञ है. और यह, कि वह कांटे पर कुलबुलाता है – ये सब यूँ ही हो जाता है.

जैसे-जैसे रात गहरी होती जाती है, उतनी ज़्यादा निडरता से केंचुए अपने बिलों से दिखाई देते हैं, उन्हें उठाना ज़्यादा आसान हो जाता है. उद्यान के दक्षिणी भाग में – वहाँ, जहाँ ग्रेनाइट की सीढ़ियाँ मिखाइलोव्स्की महल की ओर जाती हैं – ख़ास तौर से ज़्यादा हैं.

यहाँ सब कुछ मिखाइलोव्स्की है – उद्यान, किला, महल.

न जाने क्यों उन्हें पत्थरों के स्लैब के पास रहना अच्छा लगता है.

और अगर पास में पेड़ हों तो भी अच्छा लगता है.

यहाँ शाहबलूत, लिन्डन और चिनार हैं.

निर्जीव, प्राचीन शाहबलूत – हम दोनों मिलकर भी उसे हाथों से नहीं लपेट सकते, – उसके तने पर बहु-आकृति वाला कुछ खुदा है. समूची ऊँचाई पर. और उसकी ऊँचाई – तीन मंज़िलों वाले घर जितनी है. वह दिन में भी डरावना लगता है, रात को उस पर खुदे अनेक भयानक चेहरों पर फ्लैशलाइट की रोशनी न डालना ही बेहतर है.

पापा कहते हैं, कि ये सिर उनसे भी ज़्यादा उम्र के हैं. और यह भी कि कारीगर ने उनमें कोई मतलब भरा है. कोई भी इस मतलब को नहीं जानता. उद्यान के पुनर्निमाण तक निर्जीव शाहबलूत नहीं बचेगा – करीब तीस साल बाद उसके टुकड़े-टुकड़े कर दिये जायेंगे.

लेनिनग्राद में अभी तक रात को ऐतिहासिक इमारतों पर रोशनी नहीं की जाती. मीनार वाला पावेल का किला, चर्च, महल अंधेरे में खो जाते हैं. रात अमावस की है. क्या केंचुए चाँद से डरते हैं? सादोवाया पर बत्तियाँ बुझा दी जाती हैं – बिजली की बचत. कैसा होता होगा – केंचुआ होना? ज़मीन के अन्दर रहना? रात को रेंगते हुए बाहर आना?

क्यों वह केंचुआ है, और मैं इन्सान हूँ?

यह सही है. मगर क्या यह ठीक है?

पापा के ऑफिस में खूब सारे मछुआरे हैं. वे सेलिगर जा रहे हैं बुर्बोट मछली पकड़ने. बुर्बोट को केंचुए पसन्द हैं. केंचुओं से भरी बैग हमारे फ्रिज में रखी जायेगी.

रहस्य, जो मैं जानता हूँ : एक और सम्राट, ताँबे का, घोड़े के साथ – उस पर घेराबन्दी के दौरान रेत और मिट्टी डाली गई थी, – और ये यहाँ, इस उद्यान में उसके ऊपर एक ऊँचा टीला बन गया था – मैं कल्पना कर सकता हूँ कि कैसा रहा होगा वह टीला. बहुत रहस्यमय स्मारक, – शांति के समय पता नहीं था कि उसके साथ कैसा सुलूक किया जाये : वह अच्छा है या बुरा. सम्राट, बेशक, बुरा था, अलेक्सान्द्र उल्यानव उसकी हत्या करना चाहता था. मगर स्मारक, क्या वह अच्छा है? उसे क्यों बार-बार एक जगह से दूसरी जगह घसीटा जाता है? अब वह उद्यान में नहीं है, मगर मुझे पता है कि वह कहाँ है : वह भीतर वाले आँगन में है, जो बगल में ही है, मैंने देखा था. एक भारी तिरपाल से म्यूज़ियम की खिड़की को अच्छी तरह बंद किया था, मगर फिर भी एक दरार तो थी, वह वहाँ खड़ा था. ‌मतलब, घोड़ा खड़ा था. सम्राट ऊपर बैठा था – निश्चल. वह, मेरे पापा की ही तरह, परदे के पीछे, वर्गीकृत था. कई साल बीत जायेंगे, उसे अवर्गीकृत किया जायेगा और लेनिन की बख़्तरबन्द कार की जगह पर स्थापित कर दिया जायेगा, उसी कार की जगह पर, जिसकी बगल में मुझे ‘पायनियर्स’ ग्रुप में प्रवेश दिया गया था.

न जाने क्यों मैं अच्छा इंजीनियर नहीं बन सका. शब्दों को व्यवस्थित करता हूँ, और उसी से गुज़ारा करता हूँ.

और घेराबन्दी के समय यहाँ क्यारियाँ भी थीं. बारिश वाले केंचुए, उद्यान की मिट्टी को नरम बनाते हुए, ज़मीन को काफ़ी फ़ायदा पहुँचाते हैं, और सब्ज़ियाँ वे खाते नहीं हैं. हो सकता है, रेंगने वाले कृमि, जिन्हें हम इकट्ठा कर रहे हैं, उन्हींके वंशज हों, जिन्होंने घेराबन्दी के उद्यान की मिट्टी को नरम किया था.

कल्पना करता हूँ कि मैं मिट्टी को नरम बनाने वाला हूँ – बिल के भीतर. मेरे ना तो हाथ है, ना  पैर, ना आँख, ना ही कान…सिर्फ लम्बा, खूब लम्बा नंगा जिस्म है, जिससे किसी चीज़ से चिपट जाता हूँ ( “ज़मीन” शब्द मुझे मालूम नहीं है!)…मुँह, है, ज़मीन पर टिका है (मगर मैं ना तो “मुँह” जानता हूँ और ना ही “धरती”), मैं आगे की ओर लम्बा खिंचता हूँ, नुकीले सिर से कड़ी चीज़ में घुसता हूँ… मेरे पास सिर नहीं है, मगर यदि मैं इन्सान होता, और यहाँ मेरा सिर होता…और, कुछ भीतर की ओर घुसकर, शुरू करता, जिस्म को सिकोड़ते हुए, सिर फुलाना शुरू करता, जो मेरे पास नहीं है, मगर यदि होता, अगर मैं इन्सान होता…इस तरह मैं बिल की जगह को बड़ा करता हूँ. और फिर सिकुड़ जाता हूँ. और फिर लम्बा-खूब लम्बा हो जाता हूँ. मुँह को कड़ी धरती पर टिकाता हूँ….

सबसे ज़्यादा डरावनी बात ये होती, कि मैं बिल्कुल अकेला होता. ना तो मम्मी-पापा, ना ही दोस्त. कोई भी नहीं. मैं अकेला – सिकुड़ता और लम्बा होता…मिट्टी के कण और सड़े हुए टुकड़े निगलता. ..

और अगर मैं बहुत ज़्यादा बदनसीब होता अगर मेरा जन्म इन्सानों के परिवार में आदमी की तरह नहीं, बल्कि केंचुए ने मुझे केंचुए की तरह जन्म दिया होता…और अगर मैं पूरी ज़िंदगी केंचुआ ही रहता…और कोई भी न जान पाता कि यह केंचुआ – ये मैं हूँ…कोई भी नहीं, दुनिया का एक भी प्राणी नहीं!…और अगर मेरे पापा, जिनके यहाँ मैं पैदा न हुआ होता, मुझे मछली पकड़ने वाले कांटे पर फंसा देते, क्या मेरे बारे में सोचते?…उनके तो दिमाग़ में भी नहीं आता, कि कांटे पर जो है, वह मैं हूँ…कि ये मैं वहाँ कुलबुला रहा हूँ…और मैं ख़ुद भी अपने बारे में कुछ नहीं जानता (कि ये मैं हूँ, मैं भी उसे नहीं जानता!…)…तब भी, जब मैं बिल से आधा बाहर रेंग चुका होता और मुझे अच्छा लग रहा होता, मैं ना तो अपने बारे में, ना दुनिया के बारे में सोच रहा होता जिसमें मैं रहता हूँ, क्योंकि केंचुआ नहीं जानता कि सोचते कैसे हैं, वह सिर्फ जीता है…

हम, केंचुए इकट्ठा करने वाले, उद्यान में घूम रहे हैं और अनचाहे ही बड़े खाली मैदान में मिल जाते हैं (दिन में यहाँ बच्चे फ़ुटबॉल खेलते हैं). एक, जिसके पास बाल्टी है, अन्य दो को “बेलामोर” सिगरेट पेश करता है. पापा कई सालों से सिगरेट नहीं पीते हैं, – कहते हैं, कि उन्होंने सिगरेट छोड़ दी है. “”एक से नहीं”, बास्केट वाला कहता है और, पहले वाले की सिगरेट जलाकर दियासलाई बुझा देता है. फिर दूसरी दियासलाई से दूसरे की सिगरेट जलाता है, तीसरी से – ख़ुद की जलाता है. जो कुछ जमा किया है उसके बारे में विचार करते हैं और यह भी कि कौन कहाँ जायेगा. कौन बुर्बोट के लिये जायेगा, कौन कार्पव के लिये, कौन कैटफिश के लिये. इस बात पर बहस करते हैं कि बड़ी मछली को कैसे ललचाया जाये. मैं पापा के साथ पैविलियन की तरफ़ लौटता हूँ, जिसकी डिज़ाइन आर्किटेक्ट रोस्सी ने बनाई थी. मैं स्पष्ट रूप से देखता हूँ कि कुर्सी पर कोई भी नहीं सो रहा है. पापा से पूछता हूँ, कि दोनों की सिगरेट एक ही दियासलाई से क्यों नहीं जलानी चाहिये. वह जवाब देते हैं कि यह ट्रेंच का नियम है. वर्ना शार्पशूटर को प्रकाश का निशाना लगाने का समय मिल जायेगा और वह दूसरे पर गोली चला देगा.

मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि क्या वह मज़ाक कर रहे हैं. अगर यहाँ कोई शार्पशूटर होता, तो वह कहाँ बैठता? क्या महल की छत पर? सौ साल पुराने शाहबलूत की टहनी पर? चारों तरफ़ देखता हूँ, अंधेरे में नज़र गड़ाता हूँ.

नीवा से भोंपू सुनाई देता है. जहाज़ तैर रहे हैं. केंचुओं को रात के भोंपुओं की आदत हो गई है, वे उनसे नहीं डरते. दोनों किनारों से पुल उठा दिये गये हैं, मगर मुझे और पापा को परेशान होने की ज़रूरत नहीं है, – हम इस तरफ़ रहते हैं, और फ़न्तान्का पर पुल नहीं हटाए जाते.

हम बागड़ पर चढ़ते हैं, सर्कस और किले के सामने से गुज़रते हैं, खाली शहर में फन्तान्का की बगल से चलते हैं. केंचुओं से भरा हुआ बैग पापा के बैकपैक में पड़ा है.

केंचुए कई साल ज़िंदा रहते हैं. कहीं ये सच तो नहीं कि उन्हें दर्द का एहसास नहीं होता? यकीन करना मुश्किल है. इस बात कि कल्पना करना मुश्किल है, मगर, हो सकता है कि उनमें से कोई – मेरा हमउम्र हो?…

ख़ुदा, कितना अच्छा है कि मैं इन्सान हूँ!

 

********

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Charumati Ramdas

I am a retired Associate Prof of Russian. I stay in Hyderabad. Currently keep myself busy with translations of Russian works into HIndi.
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Navneet Bakshi
2 months ago

बहुत सुन्दर कल्पना है. एक बच्चे के मन में क्या विचार आते है और कैसे वह केंचुए के बारे में सोचता है. किसी किसी जगह थोड़ा व्यस्क विचार का पुट है जो शायद नौ साल के बच्चे कि सोच और समाज से परे कहा जा सकता है पर फिर भी बहुत सुन्दर कहानी सशक्त लेखन | 

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